इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश में गैर-सरकारी संगठनों (NGO) द्वारा संचालित बाल सुधार गृहों को फंड जारी न करने पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि प्रशासनिक औपचारिकताएं और लालफीताशाही बच्चों के जीवन, भोजन, इलाज और कल्याण जैसे बुनियादी अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकतीं।
जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने केंद्र और राज्य सरकार को स्पष्ट अल्टीमेटम दिया है कि वे 29 मई तक इन बाल गृहों को तत्काल अंतरिम वित्तीय सहायता देने के लिए ठोस कार्ययोजना पेश करें, अन्यथा अदालत स्वयं आवश्यक आदेश पारित करने के लिए बाध्य होगी।
फंड की किल्लत से संकट में सैकड़ों मासूमों का जीवन
हाईकोर्ट का यह हस्तक्षेप साल 2008 में अनूप गुप्ता द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान आया है।
मामले में अदालत की मदद कर रहे न्यायमित्र (एमिकस क्यूरी) अपूर्वा तिवारी ने कोर्ट के सामने एक गंभीर संकट की ओर ध्यान खींचा। उन्होंने बताया कि नया वित्तीय वर्ष (2026-27) शुरू हुए करीब दो महीने बीत चुके हैं, लेकिन सरकार की महत्वाकांक्षी ‘मिशन वात्सल्य’ योजना के तहत चल रहे बाल गृहों को अब तक कोई वित्तीय सहायता नहीं मिली है।
अपूर्वा तिवारी ने ‘दृष्टि सामाजिक संस्थान’ का उदाहरण देते हुए कोर्ट को बताया कि इस एनजीओ द्वारा संचालित बाल गृहों में 200 से अधिक बच्चे रह रहे हैं। इस संस्थान का मासिक परिचालन खर्च करीब 80 लाख रुपये है, लेकिन अप्रैल महीने से सरकार की ओर से एक पैसा भी जारी नहीं किया गया है।
सरकारी प्रक्रिया बनाम संवैधानिक जिम्मेदारी
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने फंड रोकने के पीछे तकनीकी और प्रशासनिक अड़चनों का हवाला दिया। सरकारी पक्ष ने दलील दी कि राज्य में लागू की गई नई वित्तीय प्रणाली यानी एसएनए स्पर्श (SNA Sparsh) मैकेनिज्म की वजह से यह देरी हुई है। अधिकारियों ने बताया कि प्रोजेक्ट अप्रूवल बोर्ड (PAB) की बैठक बीती 12 मई को हो चुकी है, लेकिन इस बैठक के आधिकारिक मिनट्स (कार्यवृत्त) अभी जारी नहीं हुए हैं, जिसके चलते फंड जारी करना संभव नहीं हो पा रहा है।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुईं महिला कल्याण विभाग की प्रमुख सचिव मनीषा त्रिघाटिया ने अदालत को बताया कि विभाग स्थापित नियमों और सरकारी प्रक्रियाओं से बंधा हुआ है और उनसे परे जाकर फंड जारी नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट की पीठ ने इस तर्क पर सख्त प्रतिक्रिया दी और अधिकारी के रुख को “असंवेदनशील” और “अड़ियल” करार दिया।
अदालत ने सरकारी कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि नया वित्तीय वर्ष शुरू होने के बाद मई के मध्य में बोर्ड की बैठक होती है और फिर मिनट्स तैयार करने में ही पूरा एक महीना लगा दिया जाता है, तो इसका मतलब है कि बाल सुधार गृहों को साल की पहली तिमाही बिना किसी सरकारी मदद के गुजारनी होगी।
खंडपीठ ने अधिकारियों से तीखा सवाल पूछा, “इस तीन महीने के अंतराल में बच्चों के भोजन, आकस्मिक इलाज और रोज़मर्रा की ज़रूरतों का खर्च कौन उठाएगा?” इस सवाल पर अदालत में मौजूद सरकारी अधिकारियों के पास कोई जवाब नहीं था।
अदालत ने सरकार को याद दिलाया कि भारतीय संविधान और किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत बच्चों के कल्याण की रक्षा करना राज्य का एक अनिवार्य संवैधानिक दायित्व है।
अब आगे क्या?
हाईकोर्ट ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को आपसी समन्वय के साथ काम करने और शुक्रवार, 29 मई तक एक संयुक्त प्रस्ताव अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने का सख्त निर्देश दिया है। इस प्रस्ताव में प्रदेश में संचालित सभी सात एनजीओ-संचालित बाल गृहों को तुरंत अंतरिम वित्तीय राहत पहुंचाने का पूरा ब्योरा होना चाहिए।
इसके साथ ही, अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह अगली सुनवाई की तारीख पर यह भी स्पष्ट करे कि इस पूरे चालू वित्तीय वर्ष के दौरान इन सातों बाल गृहों को कुल कितना बजट आवंटित किया जाना प्रस्तावित है।

