इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सितंबर 2025 में बरेली में हुई हिंसा से जुड़े मामलों में दर्ज कई एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने साथ ही पहले जारी उस अंतरिम आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसके तहत कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी पर अस्थायी रोक लगाई गई थी।
न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने 9 मार्च को आशु और अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिकाओं के समूह को खारिज कर दिया। इन याचिकाओं में बरेली हिंसा मामले में दर्ज एफआईआर को चुनौती दी गई थी।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि उसी घटना को लेकर पहले ही एक उपनिरीक्षक द्वारा एफआईआर दर्ज की जा चुकी थी। इसलिए बाद में दर्ज की गई एफआईआर उसी घटना की दूसरी एफआईआर है और कानूनन इसे रद्द किया जाना चाहिए।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि पहले दर्ज एफआईआर में घटना के केवल एक सीमित हिस्से का जिक्र है, जबकि बाद की एफआईआर में पूरे घटनाक्रम का विस्तृत विवरण दिया गया है।
अदालत ने कहा:
“उक्त एफआईआर निस्संदेह उसी घटना से संबंधित है, लेकिन उसमें घटना की समग्रता और अवैध जमावड़े द्वारा किए गए सभी कृत्यों का उल्लेख नहीं है। उसमें केवल घटना के एक पहलू का जिक्र है, जहां ड्यूटी पर मौजूद सूचक के सामने भीड़ द्वारा पत्थरबाजी की गई, एक पुलिसकर्मी का डंडा छीना गया और उसकी वर्दी फाड़ने का प्रयास किया गया। यह पूरी घटना का बहुत छोटा हिस्सा है, जबकि विवादित (वर्तमान) एफआईआर में पूरे घटनाक्रम का विस्तृत विवरण दिया गया है।”
पीठ ने आगे कहा:
“इसलिए, अपराध संख्या 1145 वर्ष 2025 को जन्म देने वाली एफआईआर के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि विवादित एफआईआर उसी घटना से संबंधित दूसरी एफआईआर है।”
याचिकाओं को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों को देखते हुए यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें अदालत एफआईआर रद्द करने के लिए हस्तक्षेप करे।
पीठ ने अपने आदेश में कहा:
“समस्त परिस्थितियों को देखते हुए हम यह नहीं पाते कि यह ऐसा मामला है जिसमें याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर वर्तमान तथा संबंधित याचिकाओं के आधार पर विवादित एफआईआर को रद्द किया जा सके।”
अदालत ने 24 नवंबर 2025 को पारित अपने उस अंतरिम आदेश को भी समाप्त कर दिया, जिसमें कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी पर रोक लगाई गई थी।
26 सितंबर 2025 को बरेली में जुमे की नमाज के बाद एक मस्जिद के बाहर बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हुए थे। यह भीड़ मौलाना तौकीर रज़ा के समर्थकों की बताई गई, जो प्रदर्शन करना चाहते थे।
प्रशासन ने उस समय शहर में चल रहे नवरात्र और उर्स कार्यक्रमों का हवाला देते हुए बीएनएसएस की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू कर दी थी और प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी।
आरोप है कि प्रदर्शन की अनुमति न मिलने के बाद भीड़ ने उग्र रूप ले लिया और पुलिस पर पत्थर और पेट्रोल बम फेंके। इस दौरान भड़काऊ नारे भी लगाए गए।
पुलिस के हस्तक्षेप के बाद हिंसा तेजी से शहर के कई इलाकों में फैल गई, जिनमें खलील तिराहा, नौमहल्ला मस्जिद, कोतवाली, एसपी सिटी कार्यालय, नोवेल्टी चौराहा, आजमनगर और श्यामगंज जैसे क्षेत्र शामिल थे। इसके बाद पुलिस ने हालात पर काबू पाने के लिए कार्रवाई की।

