बैंक द्वारा समय सीमा के भीतर चेक पेश न करना ‘सेवा में कमी’; मुआवजा ‘उचित’ होना चाहिए, अनुमानित नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ग्राहक के एजेंट के रूप में कार्य करते हुए बैंक का यह कानूनी दायित्व है कि वह चेक को उसकी वैधता अवधि (Validity Period) के भीतर भुगतान के लिए पेश करे। अदालत ने माना कि बिना किसी उचित कारण के चेक को समय सीमा के भीतर पेश न करना, जिससे चेक ‘स्टेल’ (पुराना) हो जाए, उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत ‘सेवा में कमी’ (Deficiency in Service) की श्रेणी में आता है। हालांकि, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) द्वारा दिए गए 10% मुआवजे को घटाकर चेक राशि का 6% कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला केनरा बैंक द्वारा NCDRC के 24 सितंबर, 2024 के उस आदेश के खिलाफ दायर दो अपीलों से उत्पन्न हुआ, जिसमें बैंक को सेवा में कमी का दोषी पाया गया था। शिकायतकर्ता कविता चौधरी और प्रिया चौधरी का केनरा बैंक की महारानी बाग शाखा में खाता था। 29 मई, 2018 को कविता चौधरी ने अंसल एसोटेक लिमिटेड द्वारा जारी ₹1,06,10,768 के दो चेक जमा किए।

बैंक ने शुरू में 1 जून, 2018 को राशि जमा की, लेकिन उसी दिन ‘ऑनलाइन चेक रिटर्न’ के नाम पर राशि वापस डेबिट कर ली। बाद में पता चला कि 30 और 31 मई, 2018 को बैंक हड़ताल के कारण चेक वापस आए थे। जब बैंक ने अंततः 5 जून और 11 जून, 2018 को चेक दोबारा पेश किए, तो वे ‘आउटडेटेड/स्टेल’ (अवधि पार) होने के कारण वापस हो गए, क्योंकि उनकी वैधता 2 जून, 2018 को समाप्त हो गई थी।

पक्षों के तर्क

केनरा बैंक (अपीलकर्ता): बैंक ने तर्क दिया कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स (NI) एक्ट की धारा 75A के तहत देरी के लिए छूट मिलनी चाहिए, क्योंकि हड़ताल उनके नियंत्रण से बाहर की परिस्थिति थी। बैंक का कहना था कि उन्होंने ‘उचित समय’ के भीतर चेक दोबारा पेश किए थे। इसके अलावा, बैंक ने तर्क दिया कि चूंकि चेक जारी करने वाली कंपनी परिसमापन (Liquidation) की प्रक्रिया में थी, इसलिए शिकायतकर्ताओं को कोई वास्तविक नुकसान नहीं हुआ है।

प्रतिवादी (शिकायतकर्ता): शिकायतकर्ताओं ने तर्क दिया कि बैंक ने 29 मई को ही चेक का डेटा डिजिटल रूप से कैप्चर कर लिया था। बैंक को हड़ताल खत्म होने के तुरंत बाद 1 जून या 2 जून को चेक पेश करने चाहिए थे। बैंक की लापरवाही के कारण वे चेक जारी करने वाली कंपनी के निदेशकों के खिलाफ NI एक्ट की धारा 138 के तहत आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के अपने अधिकार से वंचित हो गए।

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अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियां

पीठ ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 और 2019 के तहत ‘सेवा’ और ‘कमी’ की परिभाषाओं की समीक्षा की। अदालत ने पाया कि बैंकिंग सुविधाएं ‘सेवा’ के व्यापक दायरे में आती हैं।

बैंक के कर्तव्य पर अदालत ने टिप्पणी की:

“संग्रह (Collection) के लिए चेक प्राप्त करने वाला बैंक ग्राहक के एजेंट के रूप में कार्य करता है और निर्धारित वैधता अवधि के भीतर चेक पेश करने के लिए उचित तत्परता बरतने के दायित्व के अधीन है। किसी भी उचित स्पष्टीकरण के अभाव में, चेक के ‘स्टेल’ होने का परिणाम बैंकिंग कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाही माना जाएगा, जो सेवा में कमी का गठन करता है।”

हाईकोर्ट के फैसलों का संदर्भ देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हालांकि 30 और 31 मई को हड़ताल थी, लेकिन 1 और 2 जून को बैंक खुले थे। बैंक यह बताने में विफल रहा कि उन कार्य दिवसों पर चेक दोबारा पेश क्यों नहीं किए गए।

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NI एक्ट की धारा 138 के मुद्दे पर, कोर्ट ने अजय कुमार राधेश्याम गोयनका बनाम टूरिज्म फाइनेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड मामले का जिक्र करते हुए स्पष्ट किया कि दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) की कार्यवाही के दौरान भी धारा 138 के तहत आपराधिक कार्यवाही पर रोक नहीं लगती है। चेक पेश न करके बैंक ने शिकायतकर्ताओं के इस कानूनी उपचार की संभावना को “शुरुआत में ही खत्म” (Nipped in the bud) कर दिया।

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने सेवा में कमी के संबंध में NCDRC के निष्कर्ष को बरकरार रखा। हालांकि, मुआवजे के संबंध में अदालत ने माना कि चूंकि धारा 138 की कार्यवाही का अंतिम परिणाम अनिश्चित होता, इसलिए मुआवजा मध्यम होना चाहिए।

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अदालत ने कहा:

“टोकन मुआवजे के रूप में चेक की राशि का 10 प्रतिशत शिकायतकर्ता को हुए नुकसान की प्रकृति को सटीक रूप से नहीं दर्शाता है, क्योंकि सेवा में कमी के निष्कर्ष के बावजूद नुकसान स्वयं अनिश्चित है।”

नतीजतन, सुप्रीम कोर्ट ने NCDRC के आदेश को संशोधित करते हुए केनरा बैंक को निम्नलिखित भुगतान करने का निर्देश दिया:

  1. प्रत्येक शिकायतकर्ता को चेक राशि (₹1,06,10,768) का 6% मुआवजा
  2. शिकायत दर्ज करने की तारीख से 6% वार्षिक दर से ब्याज
  3. प्रत्येक शिकायतकर्ता को ₹50,000 की मुकदमेबाजी लागत

मामले का विवरण केस का शीर्षक: केनरा बैंक बनाम कविता चौधरी (और संबंधित अपील)

केस संख्या: सिविल अपील संख्या 2587/2025

पीठ: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां

तारीख: 15 अप्रैल, 2026

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