टेंडर प्रक्रिया में शामिल होना अनुबंध के अधिकार की गारंटी नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक टेंडर प्रक्रिया को रद्द किए जाने के खिलाफ दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल टेंडर में भाग लेना या न्यूनतम बोलीदाता (L-1) घोषित होना, किसी भी व्यक्ति को अनुबंध प्राप्त करने का निहित या लागू करने योग्य अधिकार प्रदान नहीं करता है, जब तक कि कोई अंतिम समझौता न हो जाए। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि निविदा प्राधिकारी को जनहित में लिए गए नीतिगत निर्णय के आधार पर प्रक्रिया को रद्द करने का पूर्ण अधिकार है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, ‘मैसर्स ग्लोबल सर्विसेज’ ने नगर पालिका परिषद, जांजगीर-नैला द्वारा 17 नवंबर, 2025 को 95 मैनपावर कर्मियों की सेवाओं के लिए जारी टेंडर में भाग लिया था। तकनीकी रूप से पात्र पाए जाने के बाद, 30 जनवरी, 2026 को वित्तीय बोलियां खोली गईं, जिसमें याचिकाकर्ता सबसे कम बोली लगाने वाला (L-1) बनकर उभरा।

हालांकि, L-1 घोषित होने के बावजूद याचिकाकर्ता को कार्य आदेश (work order) जारी नहीं किया गया। इसके बजाय, 17 मार्च, 2026 को अधिकारियों ने टेंडर प्रक्रिया को ही रद्द कर दिया। इस रद्दीकरण का मुख्य आधार शासन के नए निर्देश थे, जिनमें राज्य ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल के बजाय ‘गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस’ (GeM) पोर्टल के माध्यम से खरीद अनिवार्य कर दी गई थी।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता के तर्क: याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि टेंडर रद्द करना मनमाना और अवैध है, क्योंकि प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी और उन्हें L-1 घोषित किया जा चुका था। उन्होंने दलील दी कि प्रशासन उन निर्देशों को पिछली तारीख से लागू करने की कोशिश कर रहा है जो टेंडर शुरू होने के बाद जारी किए गए थे। याचिकाकर्ता ने “उचित अपेक्षा” (legitimate expectation) का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने काम की तैयारी में काफी संसाधन लगा दिए थे। इस दौरान सुबोध कुमार सिंह राठौर बनाम मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं अन्य जैसे मामलों का संदर्भ दिया गया।

उत्तरदाताओं (शासन) के तर्क: नगर पालिका परिषद और राज्य सरकार की ओर से वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि केवल L-1 होने से कोई कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता। उन्होंने तर्क दिया कि टेंडर रद्द करने का निर्णय पारदर्शिता सुनिश्चित करने और नई खरीद नीति (GeM पोर्टल) के अनुपालन के लिए लिया गया था। अधिकारियों के पास कार्य आदेश जारी होने से पहले किसी भी स्तर पर टेंडर रद्द करने का विवेकपूर्ण अधिकार सुरक्षित है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने अवलोकन किया कि टेंडर मामलों में न्यायिक समीक्षा केवल निर्णय लेने की प्रक्रिया तक सीमित है, न कि निर्णय की खूबियों पर। मास्टर मरीन सर्विसेज (P) Ltd. और टाटा सेलुलर बनाम भारत संघ जैसे मामलों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने दोहराया कि जब तक कोई अंतिम अनुबंध अस्तित्व में नहीं आता, तब तक बोलीदाता को कोई अधिकार नहीं मिलता।

“उचित अपेक्षा” और नीति के पिछली तारीख से लागू होने के सवाल पर हाईकोर्ट ने कहा:

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“उचित अपेक्षा (Legitimate expectation) वैधानिक नीति के विरुद्ध काम नहीं कर सकती और न ही यह जनहित में टेंडर प्रक्रिया को संशोधित या रद्द करने की प्राधिकारी की शक्ति को रोक सकती है।”

बेंच ने पाया कि अधिकारियों ने किसी “मनमाने या अकारण” तरीके से काम नहीं किया, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए GeM पोर्टल का उपयोग करने के नीतिगत निर्णय का पालन किया। कोर्ट ने नोट किया:

“GeM पोर्टल को अपनाने की नीति खरीद प्रथाओं को सुव्यवस्थित करने के लिए एक संस्थागत सुधार उपाय है। एक बार ऐसी नीति लागू हो जाने के बाद, अधिकारियों को संशोधित ढांचे का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए चल रही प्रक्रियाओं को उसके अनुरूप करने का पूरा अधिकार है।”

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि 17 मार्च, 2026 का टेंडर रद्दीकरण आदेश किसी भी अवैधता या प्रक्रियात्मक अनुचितता से ग्रस्त नहीं है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई कानूनी अधिकार साबित नहीं कर पाया जिसके आधार पर ‘मैंडेमस’ (परमादेश) रिट जारी की जा सके।

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याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“औपचारिक कार्य आदेश जारी न होने या अनुबंध निष्पादित न होने की स्थिति में, उत्तरदाताओं पर कोई बाध्यकारी कानूनी दायित्व नहीं थोपा जा सकता। परिणामस्वरूप, याचिकाकर्ता के पक्ष में अनुबंध देने के लिए कोई निर्देश जारी नहीं किया जा सकता है।”

केस विवरण ब्लॉक:

  • केस टाइटल: मैसर्स ग्लोबल सर्विसेज बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य
  • केस नंबर: WPC No. 1714 of 2026
  • बेंच: माननीय श्री रमेश सिन्हा, चीफ जस्टिस एवं माननीय श्री रवींद्र कुमार अग्रवाल, जज
  • तारीख: 13 अप्रैल, 2026

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