सामाजिक सुरक्षा और जन कल्याण से जुड़े कानूनों पर एक बड़ा और संवेदनशील फैसला सुनाते हुए केरल उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार की याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने सैन्य सेवा के बाद मानसिक बीमारी ‘सिज़ोफ्रेनिया’ का शिकार हुए एक दिवंगत सैनिक की विधवा को दिव्यांगता पेंशन (Disability Pension) देने के फैसले को बरकरार रखा है।
जस्टिस के. नटराजन और जस्टिस जॉनसन जॉन की खंडपीठ ने 26 मई को दिए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि जब भी जन कल्याणकारी कानूनों की व्याख्या की बात आती है, तो अदालत और प्रशासन को नागरिकों के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
जनहित में हो कानून की व्याख्या: हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
अदालत ने कहा कि सामाजिक सुरक्षा से जुड़े अधिनियमों का मुख्य उद्देश्य लोगों को राहत देना होता है। यदि किसी कानून के दो अर्थ निकलते हों—एक जो नागरिक को लाभ पहुंचाता हो और दूसरा जो लाभ को रोकता हो—तो हमेशा लाभ पहुंचाने वाले पक्ष को ही अपनाया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने टिप्पणी की:
“यह पूरी तरह से स्थापित कानून है कि सामाजिक सुरक्षा से जुड़े कानूनों की व्याख्या हमेशा उदार और हितकारी तरीके से की जानी चाहिए। इसके शब्दों को सबसे व्यापक संभव अर्थ दिया जाना चाहिए जिसकी भाषा अनुमति देती है।”
अदालत ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि संबंधित सैनिक ने स्वेच्छा से नौकरी नहीं छोड़ी थी, बल्कि सेना के मेडिकल बोर्ड की सलाह पर उन्हें अस्वस्थ मानकर सेवामुक्त (Invalided Out) किया गया था। ऐसी स्थिति में, सरकार को यह साबित करना होगा कि सैनिक की दिव्यांगता का सेना की नौकरी से कोई संबंध नहीं था।
आधी सदी पुराना कानूनी संघर्ष
यह मामला भारतीय सेना के एक जवान के परिवार की दशकों लंबी कानूनी लड़ाई से जुड़ा है।
- अगस्त 1973: सैनिक को पूर्ण रूप से स्वस्थ पाकर भारतीय सेना में शामिल किया गया था।
- जुलाई 1979: मानसिक बीमारी (सिज़ोफ्रेनिया) के कारण उन्हें सेवामुक्त कर दिया गया।
- पेंशन की अस्वीकृति: सेना और रक्षा मंत्रालय दोनों ने उनके दिव्यांगता पेंशन के दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह बीमारी सैन्य सेवा के कारण नहीं हुई थी।
- 1994: सैनिक का निधन हो गया।
लंबी प्रतीक्षा के बाद, दिवंगत सैनिक की विधवा ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) का रुख किया। न्यायाधिकरण ने विधवा के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि सैन्य मेडिकल बोर्ड यह बताने में पूरी तरह विफल रहा कि सैनिक की बीमारी को ‘जन्मजात’ या ‘संवैधानिक’ क्यों माना गया। इस आधार पर ट्रिब्यूनल ने दो साल के लिए 60 प्रतिशत दिव्यांगता पेंशन देने का आदेश दिया।
केंद्र सरकार ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। सरकारी वकील वैद्यनाथन एस. ने तर्क दिया कि न्यायाधिकरण ने मेडिकल बोर्ड की विशेषज्ञ राय को दरकिनार कर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है।
दूसरी तरफ, विधवा की पैरवी कर रही अधिवक्ता रति वर्मा ने दलील दी कि सैन्य नियमों के तहत यदि कोई व्यक्ति पूरी तरह स्वस्थ होकर सेवा में आता है, तो सेवा के दौरान हुई किसी भी बीमारी को सैन्य परिस्थितियों से ही जुड़ा माना जाएगा, जब तक कि विभाग इसके विपरीत ठोस सबूत पेश न करे।
मेडिकल बोर्ड की दलीलों पर नियम भारी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ‘रेगुलेशंस फॉर मेडिकल सर्विसेज फॉर आर्म्ड फोर्सेज, 1983’ के नियम 423(सी) का हवाला दिया। इस नियम के अनुसार:
- यदि भर्ती के समय किसी बीमारी का कोई उल्लेख नहीं था, तो सेवामुक्ति या मृत्यु का कारण बनने वाली बीमारी को आमतौर पर सैन्य सेवा के दौरान ही उत्पन्न माना जाएगा।
- इसमें छूट केवल तभी मिल सकती है जब चिकित्सा विशेषज्ञ वैज्ञानिक रूप से यह साबित कर दें कि यह बीमारी भर्ती के समय की जांच में पकड़ में नहीं आ सकती थी।
चूंकि सेना का मेडिकल बोर्ड सैनिक के सिज़ोफ्रेनिया को जन्मजात बताने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं दे सका, इसलिए अदालत ने ट्रिब्यूनल के फैसले को सही माना और सरकार की याचिका खारिज कर दी।
हाल के दिनों में केंद्र सरकार को लगे अन्य झटके
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब हाल ही में देश की अन्य अदालतों ने भी पूर्व सैनिकों के पेंशन से जुड़े मामलों में केंद्र सरकार की याचिकाओं को नामंजूर किया है:
- पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट (8 मई): जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस दीपक मनचंदा की पीठ ने केंद्र की एक याचिका को खारिज करते हुए फैसला दिया कि यदि कोई जवान सैन्य सेवा के दौरान आई दिव्यांगता के कारण सेवामुक्त होता है, तो वह पेंशन के ‘सर्विस एलिमेंट’ का हकदार है। भले ही उसने न्यूनतम 15 वर्ष की सेवा पूरी न की हो (इस मामले में जवान ने केवल 9 वर्ष की सेवा की थी)।
- केरल हाईकोर्ट का समीक्षा याचिका खारिज करना (20 मई): जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन और जस्टिस मुरली कृष्ण एस. की खंडपीठ ने एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी को 20 प्रतिशत दिव्यांगता पेंशन देने के आदेश के खिलाफ केंद्र की समीक्षा याचिका खारिज कर दी। अदालत ने सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि पुनर्विचार याचिका का उपयोग किसी पुराने फैसले को दोबारा चुनौती देने या अपील के मुखौटे के रूप में नहीं किया जा सकता।

