कन्फर्म सीट पर दूसरे का कब्ज़ा, शिकायत के बाद भी मदद न करने पर उपभोक्ता आयोग ने रेलवे पर लगाया जुर्माना

जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (D.C.D.R.C.), भोजपुर (आरा) ने कन्फर्म टिकट होने के बावजूद खड़े होकर यात्रा करने के लिए मजबूर हुए एक यात्री के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। आयोग के अध्यक्ष कृष्ण प्रताप सिंह और सदस्य कमल किशोर सिंह की पीठ ने इस मामले में उत्तर मध्य रेलवे (North Central Railway) और रेलवे बोर्ड को ‘सेवा में कमी’ (Deficiency in Service) का दोषी पाया है। आयोग ने विपक्षी दलों को टिकट की मूल राशि 8% वार्षिक ब्याज के साथ वापस करने, साथ ही ₹20,000 मानसिक व शारीरिक उत्पीड़न के मुआवजे के रूप में और ₹15,000 मुकदमे के खर्च (Litigation Cost) के तौर पर भुगतान करने का आदेश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 2 अक्टूबर 2022 का है। शिकायतकर्ता रवि शंकर पांडेय अपने तीन दोस्तों के साथ विंध्याचल से आरा वापस लौट रहे थे। इस यात्रा के लिए उन्होंने IRCTC पोर्टल के माध्यम से ट्रेन संख्या 13202 (एलटीटी-पटना एक्सप्रेस) के B4 कोच में चार कन्फर्म सीटें (सीट संख्या 58, 62, 63 और 68) बुक की थीं, जिसके लिए उन्होंने ₹1,876.80 का भुगतान किया था।

ट्रेन अपने निर्धारित समय से लगभग एक घंटा देरी से आई। त्योहारों या भीड़ के सीजन के कारण डिब्बे में भारी भीड़ थी, जिससे शिकायतकर्ता और उनके मित्र बड़ी मुश्किल से ट्रेन के भीतर प्रवेश कर पाए। जब वे अपनी आवंटित सीटों के पास पहुंचे, तो वहां पहले से ही कुछ अज्ञात लोग बैठे हुए थे, जिन्होंने खुद को रेलवे कर्मचारी बताया। जब उनसे सीटें खाली करने को कहा गया, तो उन्होंने शिकायतकर्ताओं के साथ अभद्र व्यवहार किया।

शिकायतकर्ता ने ट्रेन में मौजूद टीटीई (TTE) और रेलवे सुरक्षा बल (RPF) के जवानों को खोजने की कोशिश की, लेकिन वे कहीं नहीं मिले। रेलवे के हेल्पलाइन नंबर 139 पर भी संपर्क नहीं हो सका। इसके बाद, शिकायतकर्ता ने भारतीय रेलवे के आधिकारिक ट्विटर हैंडल (@RailwaySeva और @RailMinIndia) पर अपनी शिकायत दर्ज कराई। वहां से मिले निर्देशों के बाद उन्होंने अपना पीएनआर (PNR) और संपर्क विवरण साझा किया, जिसके बाद उन्हें शिकायत दर्ज होने का एक एसएमएस (संदर्भ संख्या: 2022100204979) प्राप्त हुआ।

शिकायत दर्ज होने के बावजूद रेलवे प्रशासन की ओर से कोई मदद या सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली, जिसके कारण चारों यात्रियों को पूरी रात खड़े होकर सफर करना पड़ा। बक्सर स्टेशन पर जब एक टीटीई डिब्बे में आया, तो शिकायतकर्ता ने अपनी परेशानी साझा की। परंतु, मदद करने के बजाय टीटीई ने उन अवैध कब्जाधारियों का पक्ष लिया और भीड़ के सीजन का हवाला देते हुए शिकायतकर्ता को ‘मैनेज’ (एडजस्ट) करने की सलाह दी। अंततः चारों यात्रियों को आरा तक खड़े होकर ही सफर पूरा करना पड़ा। इसके बाद रवि शंकर पांडेय ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया और टिकट रिफंड (18% ब्याज के साथ), ₹50,000 मानसिक प्रताड़ना का हर्जाना और ₹30,000 कानूनी खर्च की मांग की।

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पक्षों की दलीलें

मामले की सुनवाई के दौरान विपक्षी दल संख्या 1 (उत्तर मध्य रेलवे) और विपक्षी दल संख्या 3 (रेलवे बोर्ड / रेल मंत्रालय) ने संयुक्त लिखित बयान दाखिल कर शिकायत का विरोध किया। उनकी मुख्य दलीलें इस प्रकार थीं:

  • यह शिकायत निराधार है और इसका कोई कानूनी आधार नहीं है।
  • सीटों पर अनधिकृत कब्जे का यह मामला ‘कानून-व्यवस्था’ से जुड़ा है, जो राज्य सरकार की राजकीय रेलवे पुलिस (GRP) के अधिकार क्षेत्र में आता है, न कि रेलवे प्रशासन के।
  • रेलवे प्रशासन ने शिकायत मिलते ही तुरंत कार्रवाई की थी और यात्रियों को सीटें उपलब्ध करा दी गई थीं।
  • रेलवे की सेवा में कोई कमी नहीं रही है और न ही यात्रियों को कोई मानसिक या आर्थिक क्षति हुई है।
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अपनी दलीलों के समर्थन में रेलवे ने दिल्ली उच्च न्यायालय के एक फैसले (W.P. 8892/2015) की प्रति, रेलवे बोर्ड के सर्कुलर पत्र (पत्र संख्या 2001/L.C/Misc. II और पत्र संख्या 2014/L.C/Misc/12) और शपथ पत्र पेश किए।

वहीं, विपक्षी दल संख्या 2 (पूर्व मध्य रेलवे) ने अपनी दलील में कहा कि चूंकि यात्रियों की यात्रा विंध्याचल से आरा के बीच की थी जो उत्तर मध्य रेलवे क्षेत्र के अंतर्गत आता है, इसलिए इस मामले में उनकी कोई भूमिका नहीं है और उनका नाम इस मुकदमे से हटा दिया जाना चाहिए।

शिकायतकर्ता ने अपने दावों को साबित करने के लिए निम्नलिखित दस्तावेज साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किए:

  • प्रिंटेड रेलवे टिकट की छायाप्रति (प्रदर्श 1)
  • ट्विटर पर की गई शिकायतों की प्रति (प्रदर्श 2)
  • रेलवे से प्राप्त संदेशों की प्रतियां (प्रदर्श 3)
  • साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B के प्रमाण पत्र के साथ संबंधित तस्वीरें (प्रदर्श 4)
  • लिखित बहस और शपथ पत्र

आयोग का विश्लेषण और टिप्पणी

आयोग ने दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का बारीकी से अध्ययन किया। आयोग ने पाया कि शिकायतकर्ता ने ₹1,876.80 का भुगतान कर चार कन्फर्म सीटें खरीदी थीं, इसलिए वह कानूनन एक ‘उपभोक्ता’ की श्रेणी में आता है। साक्ष्यों से यह स्पष्ट था कि डिजिटल और अन्य माध्यमों से बार-बार शिकायत करने के बावजूद रेलवे प्रशासन यात्रियों को उनकी कन्फर्म सीटों पर बिठाने में पूरी तरह नाकाम रहा।

इस लापरवाही पर कड़ी टिप्पणी करते हुए आयोग ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा:

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“यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता को अपने तीन मित्रों के साथ मानसिक, शारीरिक और आर्थिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा और यह विपक्षी संख्या 1 और 3 द्वारा सेवा में कोताही (कमी) को दर्शाता है। इसलिए शिकायतकर्ता अपनी शिकायतों के निवारण का हकदार है।”

आयोग का अंतिम निर्णय

भोजपुर, आरा के उपभोक्ता आयोग ने शिकायत को स्वीकार करते हुए उत्तर मध्य रेलवे (O.P. No. 1) और रेलवे बोर्ड (O.P. No. 3) को सेवा में कमी का उत्तरदायी माना। आयोग ने निम्नलिखित आदेश जारी किए:

  1. विपक्षी दल संख्या 1 और 3 को आदेश दिया जाता है कि वे शिकायतकर्ता को टिकट की बुकिंग राशि ₹1,876.80 रुपये 8% वार्षिक ब्याज के साथ वापस करें।
  2. विपक्षी दल संख्या 1 और 3 को मानसिक, शारीरिक और आर्थिक उत्पीड़न के एवज में ₹20,000 का मुआवजा शिकायतकर्ता को देना होगा।
  3. विपक्षी दल संख्या 1 और 3 मुकदमे के खर्च के रूप में ₹15,000 का भुगतान करेंगे।

आयोग ने विपक्षी दलों को इस आदेश का पालन करने के लिए 60 दिनों का समय दिया है। यदि तय समय सीमा के भीतर इस राशि का भुगतान नहीं किया जाता है, तो शिकायतकर्ता कानून की प्रक्रिया के माध्यम से 10% वार्षिक ब्याज दर के साथ इस राशि को वसूलने का हकदार होगा।

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