मणिपुर में भड़की जातीय हिंसा के मामलों की कानूनी कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कड़ा रुख अपनाया है। देश की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया है कि न्याय प्रक्रिया में किसी भी तरह की देरी अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने आदेश दिया कि चल रहे सभी मुकदमों की सुनवाई में तेजी लाई जाए और अगली सुनवाई तक इस संबंध में एक विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट पेश की जाए।
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि इस संवेदनशील समय में पीड़ितों के मन में देश की न्याय प्रणाली के प्रति विश्वास बहाल करना सबसे बड़ी प्राथमिकता है। इसके लिए ठोस ‘विश्वास बहाली के उपाय’ और पीड़ितों को मजबूत कानूनी प्रतिनिधित्व मिलना बेहद जरूरी है।
पीड़ितों को अपनी भाषा में कानूनी मदद: मुकदमों की प्रगति पर रिपोर्ट तलब
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानूनी पेचीदगियों के कारण पीड़ित परिवारों को किसी भी तरह की परेशानी नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और अन्य संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे पीड़ितों की काउंसलिंग और कानूनी सहायता के लिए ऐसे वकीलों (लीगल एड काउंसिल) की नियुक्ति करें जो मणिपुरी भाषा में पारंगत हों।
पीठ ने स्पष्ट किया कि फिलहाल उसका पूरा ध्यान केवल और केवल पीड़ित परिवारों को उचित कानूनी सहायता दिलाने पर केंद्रित है और वह इस चरण में किसी भी बाहरी या अप्रासंगिक मुद्दे पर विचार नहीं करेगी।
अदालत में पेश की गई प्रगति रिपोर्ट के आंकड़े इस प्रकार हैं:
- SIT की जांच: विशेष जांच दल (SIT) की रिपोर्ट के मुताबिक, अब तक 207 मामलों में आरोप पत्र (Chargesheet) दाखिल किए जा चुके हैं, जिनमें 400 से अधिक लोगों को आरोपी बनाया गया है।
- CBI की कार्रवाई: सीबीआई की ओर से पेश रिपोर्ट में बताया गया कि एजेंसी ने अब तक 20 आरोप पत्र दाखिल किए हैं, और 16 मामलों में सुनवाई (Trial) शुरू हो चुकी है।
मुख्य आरोपियों की जमानत पर कानूनी बहस
बुधवार की सुनवाई का एक बड़ा हिस्सा दो मुख्य आरोपियों— अरुण खुन्दोंगबम और नामीराकपम किरण मैतेई— को गुवाहाटी हाईकोर्ट से मिली जमानत के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा। इन दोनों पर महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म करने और उन्हें निर्वस्त्र कर घुमाने जैसे जघन्य आरोप हैं, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। सीबीआई ने हाईकोर्ट के इस जमानत आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
बता दें कि गुवाहाटी हाईकोर्ट ने 8 सितंबर 2025 को दोनों आरोपियों को यह कहते हुए जमानत दे दी थी कि वे बिना आरोप तय हुए पिछले दो साल से हिरासत में हैं, जो कि “अनुचित और लंबी नजरबंदी” है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में लिखा था:
“भले ही आरोप बेहद गंभीर और स्तब्ध करने वाले हैं, लेकिन अदालत इस बात की अनदेखी नहीं कर सकती कि बिना मुकदमे के अनिश्चितकालीन हिरासत वास्तव में सुनवाई से पहले दी जाने वाली सजा की तरह है, जिसकी कानूनन अनुमति नहीं दी जा सकती।”
पीड़ितों की ओर से पेश वकील निजाम पाशा ने इस तर्क को चुनौती दी। उन्होंने विरोधाभास की ओर इशारा करते हुए कहा कि जिस हाईकोर्ट ने 9 मई 2025 को अपराध की वीभत्सता को स्वीकार किया था, उसी कोर्ट ने महज कुछ महीनों बाद 8 सितंबर को प्रक्रियात्मक देरी का हवाला देकर आरोपियों को जमानत दे दी।
इस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और न्याय के बीच संतुलन बनाते हुए टिप्पणी की:
“चूंकि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Liberty) का मामला है, इसलिए जमानत रद्द करने के लिए बेहद ठोस और असाधारण आधार (Egregious ground) की आवश्यकता होती है। हमारा मुख्य सरोकार सच को सामने लाना है, और इसके लिए जो भी पुनर्वास उपाय जरूरी होंगे, हम उन पर विचार करेंगे…”
जमीन पर हालात अब भी “नाजुक”, राहत कार्य जारी
यह कानूनी लड़ाई एक ऐसे समय में चल रही है जब मणिपुर में हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व आईपीएस अधिकारी दत्तात्रय पडसलगिकर द्वारा सौंपी गई निगरानी रिपोर्ट का भी संज्ञान लिया। इस रिपोर्ट के अनुसार, मणिपुर में कानून-व्यवस्था की स्थिति इस वर्ष 7 और 18 अप्रैल को भी “नाजुक” बनी हुई थी, जहां हिंसा की कुछ नई घटनाएं दर्ज की गईं और राज्य पुलिस बल भारी दबाव में काम कर रहा है।
दूसरी ओर, प्रभावितों के पुनर्वास और राहत कार्यों की निगरानी जारी है। केंद्र सरकार ने अगस्त 2023 में ‘जस्टिस गीता मित्तल समिति’ का गठन किया था। मणिपुर सरकार की सिफारिश पर जनहित के इस गंभीर मुद्दे के लिए गठित इस आयोग का कार्यकाल हाल ही में बढ़ाकर 31 जुलाई तक कर दिया गया है।
मणिपुर संकट की पृष्ठभूमि
मणिपुर में जातीय संघर्ष की शुरुआत 5 मई 2025 को हुई थी, जब पहाड़ी जिलों में एक ‘आदिवासी एकजुटता मार्च’ (Tribal Solidarity March) का आयोजन किया गया था। यह प्रदर्शन मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा दिए जाने की मांग के विरोध में था। हालांकि, इससे पहले आरक्षित वन भूमि से कुकी ग्रामीणों को बेदखल किए जाने को लेकर भी तनाव पनप रहा था, जिसके कारण कई छोटे आंदोलन हुए थे।
इस हिंसक झड़प और उसके बाद भड़की हिंसा में अब तक 260 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और हजारों लोग बेघर होकर विस्थापित जीवन जीने को मजबूर हैं।
देश का ध्यान इस त्रासदी पर सबसे ज्यादा तब गया, जब 20 जुलाई 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं पर हुए यौन उत्पीड़न का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद स्वतः संज्ञान (Suo-moto cognisance) लिया था। कोर्ट ने इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए इस साल मार्च में राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को पीड़ितों के लिए विशेष कानूनी सहायता वकील नियुक्त करने का निर्देश दिया था, जिसे बुधवार के आदेश के जरिए और मजबूती दी गई है।

