राज्यसभा में सदानंदन मास्टर का मनोनयन रहेगा बरकरार, दिल्ली हाईकोर्ट ने राष्ट्रपति के ‘संवैधानिक विशेषाधिकार’ को सही ठहराया

दिल्ली उच्च न्यायालय ने राज्यसभा में भाजपा नेता सी. सदानंदन मास्टर के मनोनयन (Nomination) को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान राष्ट्रपति को उच्च सदन में सदस्यों को मनोनीत करने का व्यापक विवेकाधिकार देता है, और न्यायपालिका इस तरह के फैसलों की अपीलीय समीक्षा नहीं कर सकती।

यह अहम फैसला मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने सुनाया। पीठ ने जोर देकर कहा कि संविधान का अनुच्छेद 80(3) राष्ट्रपति को साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले 12 सदस्यों को उच्च सदन के लिए मनोनीत करने का अधिकार देता है।

राष्ट्रपति के ‘व्यापक विवेकाधिकार’ का अदालती बचाव

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि संविधान में इस्तेमाल किए गए शब्द “विशेष ज्ञान” और “व्याहारिक अनुभव” मूल्यांकन पर आधारित हैं। अदालत ने कहा कि एक बार जब राष्ट्रपति इस संवैधानिक विवेक का उपयोग कर लेते हैं, तो न्यायपालिका इसमें तब तक हस्तक्षेप नहीं करेगी जब तक कि मनोनीत सदस्य का संविधान में उल्लेखित श्रेणियों (साहित्य, कला, विज्ञान, समाज सेवा) से कोई संबंध ही न हो।

खंडपीठ ने कहा, “एक बार जब संवैधानिक विशेषाधिकार का प्रयोग कर लिया जाता है, तो यह अदालत तब तक उस निर्णय की समीक्षा नहीं कर सकती जब तक कि मनोनयन का अनुच्छेद 80(3) की श्रेणियों के साथ कोई तर्कसंगत संबंध (Nexus) ही न दिखाई दे।”

याचिकाकर्ता के आरोप क्या थे?

यह कानूनी चुनौती वकील सुभाष थीककडन द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि 12 जुलाई 2025 को किया गया सदानंदन मास्टर का मनोनयन “पूरी तरह से राजनीतिक संबद्धता” पर आधारित था।

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याचिकाकर्ता का तर्क था कि सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भाजपा के केरल प्रदेश उपाध्यक्ष रह चुके सदानंदन मास्टर के पास ऐसा कोई राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त विशेष ज्ञान, शैक्षणिक उत्कृष्टता या समाज सेवा, साहित्य, कला या विज्ञान में कोई बड़ा योगदान नहीं है, जो उन्हें इस पद के योग्य बनाए।

राजनीतिक पृष्ठभूमि मनोनयन में बाधा नहीं: हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के दावों को पूरी तरह से “काल्पनिक”, “अटकलों पर आधारित” और “तथ्यहीन” बताते हुए खारिज कर दिया।

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अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई ठोस सबूत पेश करने में पूरी तरह असमर्थ रहा जिससे यह साबित हो सके कि सदानंदन मास्टर अयोग्य हैं या वे संसदीय चर्चाओं को समृद्ध नहीं कर सकते। इसके अलावा, अदालत ने स्पष्ट किया कि सक्रिय राजनीति में होना या पूर्व में चुनाव लड़ना किसी व्यक्ति को राज्यसभा के लिए मनोनीत होने से अयोग्य नहीं बनाता है।

पीठ ने टिप्पणी की, “अनुच्छेद 80(3) में निर्दिष्ट श्रेणियां काफी व्यापक हैं और ये किसी ऐसे व्यक्ति को बाहर नहीं करती हैं जिसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि हो, बशर्ते वह व्यक्ति समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखता हो।”

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सदानंदन मास्टर के खिलाफ लगाए गए आरोपों को “अपुष्ट और निराधार” बताते हुए अदालत ने याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया। केंद्र सरकार ने भी शुरुआत से ही इस याचिका की विचारणीयता (maintainability) पर आपत्ति जताई थी।

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