इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल इस आधार पर किसी आपराधिक कार्यवाही या प्राथमिकी (FIR) को रद्द नहीं किया जा सकता कि वह पहले से चल रहे विवाद के कारण ‘जवाबी या प्रतिशोध की कार्रवाई’ (Counterblast) के रूप में दर्ज कराई गई है। कोर्ट ने कहा कि यदि मामले में ऐसे तथ्य मौजूद हैं जिनकी सत्यता की जांच केवल ट्रायल (मुकदमे) के दौरान ही संभव है, तो अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
जस्टिस तेज प्रताप तिवारी की एकल पीठ ने दहेज प्रताड़ना, क्रूरता और अमानत में खयानत (स्त्रीधन हड़पने) के एक मामले में सास गीता सिंघल और एक अन्य आरोपी की याचिका को खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि धारा 482 CrPC के तहत सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट तथ्यों की गहराई में जाकर ‘मिनी-ट्रायल’ (लघु विचारण) नहीं चला सकता।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद हर्षा सिंघल (विपक्षी संख्या 2) और अखिल सिंघल के बीच वैवाहिक कलह से जुड़ा है, जिनकी शादी 2 फरवरी 2012 को हुई थी।
शिकायतकर्ता महिला का आरोप है कि शादी के बाद से ही ससुराल वालों ने अतिरिक्त दहेज के रूप में ₹5,00,000 नगद और 50 वर्ग गज ज़मीन की मांग को लेकर उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। महिला द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों के अनुसार:
- उसे बेरहमी से पीटा गया, प्रताड़ित किया गया और उसकी सहमति के बिना अप्राकृतिक शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया।
- एक विवाद के दौरान उस पर तेजाब (एसिड) फेंकने का प्रयास भी किया गया।
- उसकी सास गीता सिंघल (याचिकाकर्ता नंबर 1) ने उसका सारा ‘स्त्रीधन’ और अन्य कीमती सामान अपने पास रख लिया और वापस नहीं किया।
- अंततः उसे ससुराल से निकाल दिया गया और उसके बच्चों से भी मिलने नहीं दिया गया।
इन आरोपों के आधार पर गाजियाबाद के टीला मोड़ थाने में केस क्राइम नंबर 578/2021 दर्ज किया गया था। जांच के बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की, जिस पर संज्ञान लेते हुए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) गाजियाबाद की अदालत में मुकदमा नंबर 20633/2022 (U.P. राज्य बनाम अखिल सिंघल व अन्य) लंबित है। इस मामले में आईपीसी की धारा 498A, 323, 504, 506, 406 और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत आरोप लगाए गए हैं।
सास गीता सिंघल और अन्य ने इसी पूरी आपराधिक कार्यवाही, चार्जशीट (24 मार्च 2022) और संज्ञान आदेश (16 मई 2022) को रद्द कराने के लिए हाई कोर्ट में धारा 482 के तहत याचिका दायर की थी।
ससुराल पक्ष (याचिकाकर्ताओं) की दलीलें
याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत के सामने दलील दी कि शिकायतकर्ता के आरोप पूरी तरह झूठे, बेबुनियाद और केवल वैवाहिक कलह का नतीजा हैं। उनकी मुख्य दलीलें इस प्रकार थीं:
- शिकायतकर्ता का आचरण: मुकदमे के दौरान निचली अदालत द्वारा 14 बार समन जारी किए जाने के बावजूद शिकायतकर्ता महिला लगभग तीन साल तक कोर्ट में पेश नहीं हुई। वह केवल गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी होने के बाद ही उपस्थित हुई।
- देरी से दर्ज FIR और जवाबी कार्रवाई: यह एफआईआर अत्यधिक और अकारण देरी से दर्ज कराई गई है। यह पूरी तरह से एक “दुर्भावनापूर्ण जवाबी कार्रवाई (Counterblast)” है, क्योंकि ससुराल पक्ष ने पहले ही महिला के खिलाफ तलाक की याचिका (HMA No. 421/2021) और एक आपराधिक शिकायत (Complaint Case No. 905/2021) दर्ज कराई हुई थी।
- मेडिकल साक्ष्य में विरोधाभास: मेडिकल जांच रिपोर्ट दर्शाती है कि शिकायतकर्ता महिला ही हमलावर थी। याचिकाकर्ता नंबर 2 को चोटें आई थीं, जबकि कथित पीड़ित महिला के शरीर पर “शून्य चोटें” थीं। वकील ने सुप्रीम कोर्ट के अचिन गुप्ता बनाम हरियाणा राज्य (2024) मामले का हवाला देते हुए कहा कि जब आरोप पूरी तरह से असंभव प्रतीत हों, तो कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए।
- अस्पष्ट आरोप: एफआईआर में मारपीट, पांच लाख रुपये की मांग या तेजाब फेंकने की धमकी की कोई विशिष्ट तारीख, समय या महीना नहीं बताया गया है। आरोप बेहद सामान्य और काल्पनिक हैं।
- घर से निकाले जाने का झूठा दावा: महिला का दावा है कि उसे 16 नवंबर 2020 को घर से निकाला गया था, लेकिन उसके अपने हाथ से लिखे 28 फरवरी 2020 के एक पत्र से यह बात झूठी साबित होती है। इस पत्र में उसने खुद लिखा था कि वह अपनी मर्जी से ससुराल और अपने दोनों बच्चों को छोड़कर एक नई जिंदगी शुरू करने जा रही है।
- धारा 406 और 498A के तत्वों का अभाव: स्त्रीधन सौंपने या उसके गबन का कोई स्पष्ट विवरण नहीं है। मंजू राम कलिता बनाम असम राज्य (2019) और विनोद कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) के फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर प्रताड़ना का मामला नहीं बनता।
राज्य सरकार और शिकायतकर्ता (बहू) का पक्ष
सरकारी वकील (A.G.A.) और शिकायतकर्ता महिला के वकील ने याचिका का पुरजोर विरोध किया और निम्नलिखित बातें कहीं:
- संज्ञेय अपराध का प्रकटीकरण: प्राथमिकी (FIR) में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध को दर्शाते हैं। इसके अलावा पुलिस जांच के दौरान पीड़िता के बयान और अन्य जुटाए गए सबूत आरोपों का समर्थन करते हैं।
- देरी का तार्किक कारण: वैवाहिक मामलों में शिकायत दर्ज करने में देरी होना स्वाभाविक है क्योंकि महिला हमेशा अपने घर और वैवाहिक संबंधों को बचाने का अंतिम समय तक प्रयास करती है।
- स्पष्ट आरोप: याचिकाकर्ताओं के खिलाफ दहेज की मांग, शारीरिक-मानसिक क्रूरता और स्त्रीधन को गैरकानूनी रूप से रोके रखने के विशिष्ट आरोप हैं, जो आईपीसी की धारा 406 और 498A के तहत अपराध की श्रेणी में आते हैं।
हाई कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों और सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों का विस्तार से विश्लेषण किया।
1. जवाबी कार्रवाई (Counterblast) और तथ्यात्मक विवाद
ससुराल पक्ष के इस तर्क पर कि यह केस बदले की भावना से किया गया है, कोर्ट ने व्यवस्था दी:
“हालांकि, केवल इसलिए कि वर्तमान कार्यवाही उपरोक्त मामलों के प्रतिशोध (काउंटरब्लास्ट) के रूप में प्रतीत हो सकती है, यह अपने आप में एफआईआर को रद्द करने का पर्याप्त आधार नहीं होगा, विशेष रूप से तब जब तथ्यों और सबूतों से जुड़े कुछ विवादित प्रश्नों की जांच अभी भी मुकदमे के दौरान की जानी बाकी है।”
जस्टिस तिवारी ने स्पष्ट किया कि आरोपी को लगी चोटें वास्तव में शिकायतकर्ता ने पहुंचाई थीं या नहीं, यह पूरी तरह से मुकदमे के दौरान सबूतों के आधार पर तय होने वाला तथ्य है।
2. दस्तावेजों की प्रामाणिकता की जांच
महिला द्वारा स्वेच्छा से घर छोड़ने वाले कथित पत्र (हैंडरिटन नोट) को लेकर कोर्ट ने कहा:
“हालांकि, उक्त हस्तलिखित नोट साक्ष्य का हिस्सा है और इस चरण पर इसकी प्रामाणिकता, वास्तविकता और साक्ष्य मूल्य की निर्णायक रूप से जांच नहीं की जा सकती, क्योंकि यह सवाल कि क्या इसे वास्तव में शिकायतकर्ता/प्रतिवादी द्वारा लिखा गया था या नहीं, एक विवादित तथ्य है जिसके लिए मुकदमे के दौरान साक्ष्य के मूल्यांकन की आवश्यकता है।”
3. धारा 482 के अधिकार क्षेत्र की सीमाएं और ‘मिनी-ट्रायल’ पर रोक
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले सीबीआई बनाम आर्यन सिंह (2023) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि धारा 482 के तहत हाई कोर्ट कोई समानांतर जांच या मिनी-ट्रायल नहीं चला सकता। जस्टिस तिवारी ने लिखा:
“रद्द करने (Quashing) के चरण में, न्यायालय को मिनी ट्रायल चलाने की आवश्यकता नहीं है, इस प्रकार रद्द करने के संबंध में धारा 482 Cr.P.C के तहत अधिकार क्षेत्र सीमित है क्योंकि न्यायालय को केवल यह विचार करना है कि आवेदक के खिलाफ आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है या नहीं…”
अदालत ने दक्षाबेन बनाम गुजरात राज्य (2022) और ओडिशा राज्य बनाम प्रतिमा मोहंती (2022) मामलों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने दोहराया कि धारा 482 के तहत अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग बेहद सावधानी और असाधारण मामलों में ही किया जाना चाहिए। जांच पूरी होने और चार्जशीट दाखिल होने के बाद आमतौर पर एफआईआर रद्द नहीं की जानी चाहिए।
कोर्ट ने ओमप्रकाश कृष्णैया नायर बनाम महाराष्ट्र राज्य (1999) मामले की इस अहम पंक्ति को भी उद्धृत किया:
“मामला ‘सच हो सकता है’ (May be true) और ‘सच होना ही चाहिए’ (Must be true) के बीच अनिवार्य रूप से एक लंबी दूरी होती है, और इस पूरी दूरी को कानूनी, विश्वसनीय और अचूक साक्ष्यों द्वारा तय किया जाना चाहिए।”
अदालत का अंतिम फैसला
हाई कोर्ट ने यह भी संज्ञान में लिया कि पूर्व में 14 नवंबर 2025 को याचिका संख्या 4269/2025 (हर्षा सिंघल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य) में दिए गए आदेश के तहत संबंधित ट्रायल कोर्ट को पहले ही इस मामले का फैसला अधिमानतः (preferably) तीन महीने के भीतर करने का निर्देश दिया जा चुका है।
अदालत ने यह स्पष्ट करते हुए कि प्री-ट्रायल स्टेज पर अभियोजन पक्ष को अपने आरोप साबित करने की आवश्यकता नहीं होती, अपना निर्णय सुनाया:
“उपरोक्त कानून, कारणों और चर्चाओं के आलोक में, यह न्यायालय पाता है कि वर्तमान मामला इस स्तर पर किसी भी हस्तक्षेप की मांग नहीं करता है क्योंकि आरोपों की जांच किया जाना आवश्यक है। यह वह चरण नहीं है जहां अभियोजन/जांच एजेंसी को आरोपों को साबित करना आवश्यक हो। आरोपों को अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर मुकदमे के दौरान साबित किया जाना आवश्यक है। इसलिए, तत्काल आवेदन खारिज किए जाने योग्य है।”
इन टिप्पणियों के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट ने याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया। फैसले के अंत में कोर्ट ने रिसर्च एसोसिएट सुश्री कृतांशी श्रीवास्तव की बहुमूल्य सहायता की सराहना की।
मामले का विवरण:
- केस का शीर्षक: श्रीमती गीता सिंघल और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस नंबर: Application U/s 482 No. 9674 of 2024
- पीठ: न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी
- फैसले की तारीख: 29 मई 2026

