झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 की धारा 12 के तहत किसी संस्थान को मुख्य नियोक्ता (प्रिंसिपल एंप्लॉयर) के रूप में तभी उत्तरदायी ठहराया जा सकता है, जब ठेके पर दिया गया काम उसके नियमित व्यापार या व्यवसाय का हिस्सा हो। रांची लेबर कोर्ट के आदेशों में संशोधन करते हुए जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी ने निर्णय दिया कि झारखंड स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन (जेएससीए) को तीन इलेक्ट्रिकल तकनीशियनों की दुखद मौत के लिए मुख्य नियोक्ता के रूप में जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। हाईकोर्ट ने माना कि चूंकि जेएससीए का मुख्य काम क्रिकेट का प्रबंधन और प्रशासन करना है, इसलिए बिजली का रखरखाव उसका मुख्य व्यापार या व्यवसाय नहीं है। कोर्ट ने मैसर्स वेलमोंट स्ट्रक्चर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को मुख्य नियोक्ता और उप-ठेकेदार गुलाब खान को तत्काल नियोक्ता घोषित किया। इसके साथ ही जेएससीए को पहले से जमा की गई मुआवजे की राशि वसूलने की छूट दी गई है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद 7 सितंबर 2016 को रांची के धुर्वा क्रिकेट स्टेडियम में हुए एक घातक हादसे से जुड़ा है। तीन इलेक्ट्रिकल तकनीशियनों—मो. इफ्तिखार (21), मो. शहबाज अंसारी उर्फ शहजादा खान (22), और अलीम अंसारी (23)—को स्टेडियम में फ्लडलाइट्स की मरम्मत का काम सौंपा गया था। मरम्मत कार्य के लिए उन्हें एक ट्रॉली के जरिए लगभग 60 मीटर की ऊंचाई पर ले जाया गया था।
काम के दौरान अचानक ट्रॉली टूट गई, जिससे तीनों तकनीशियन सीधे जमीन पर गिर पड़े और उनकी मौके पर ही मौत हो गई। इस हादसे के बाद धुर्वा थाने में आईपीसी की धारा 304/34 और श्रम सुरक्षा अधिनियम की धारा 56 के तहत मामला दर्ज किया गया। पुलिस चार्जशीट में उप-ठेकेदार गुलाब खान और वेलमोंट स्ट्रक्चर्स के सहायक परियोजना प्रबंधक समीउल्लाह को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया गया था।
मृतक श्रमिकों के परिजनों ने रांची लेबर कोर्ट के कमिश्नर के समक्ष तीन अलग-अलग मुआवजे के दावे दायर किए। शुरुआत में ये दावे केवल वेलमोंट स्ट्रक्चर्स और गुलाब खान के खिलाफ थे, लेकिन 23 दिसंबर 2021 को जेएससीए को भी इसमें पक्षकार बना दिया गया। जेएससीए के कोर्ट में उपस्थित न होने के कारण उनके खिलाफ एकतरफा (एक्स-पार्टी) कार्यवाही की गई।
2 मार्च 2023 को लेबर कोर्ट ने मृतकों के परिवारों को क्रमशः 15,67,639 रुपये और 15,67,583 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। लेबर कोर्ट ने जेएससीए को मुख्य नियोक्ता मानते हुए इस राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया और उसे वेलमोंट स्ट्रक्चर्स तथा गुलाब खान से इसे वसूलने का अधिकार दिया। जेएससीए ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। हालांकि, अपील लंबित रहने के दौरान जेएससीए मुआवजे की राशि जमा कर चुका था, जिसे पीड़ितों के परिवारों ने निकाल लिया था। दूसरी ओर, वेलमोंट स्ट्रक्चर्स ने भी क्रॉस-अपील दायर कर मृतक श्रमिकों के साथ नियोक्ता और कर्मचारी के संबंध होने से इनकार किया था।
विभिन्न पक्षों के तर्क
जेएससीए के वकील निपुण बक्शी ने दलील दी कि जेएससीए और मृतक तकनीशियनों के बीच प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार का कोई संबंध नहीं था। उन्होंने बताया कि स्वयं याचिकाकर्ताओं ने भी अपने दावों और बयानों में यही कहा था कि मृतकों को वेलमोंट स्ट्रक्चर्स की ओर से गुलाब खान ने काम पर रखा था। उन्होंने आगे कहा कि जेएससीए केवल क्रिकेट गतिविधियों के संचालन के लिए काम करता है, इसलिए बिजली के उपकरणों की मरम्मत और रखरखाव उसका सामान्य व्यवसाय नहीं है। इस आधार पर जेएससीए को अधिनियम की धारा 12 के तहत जिम्मेदार नहीं माना जा सकता।
वेलमोंट स्ट्रक्चर्स की ओर से पेश वकील इंद्रजीत सिन्हा ने तर्क दिया कि कंपनी ने केवल उपकरणों की आपूर्ति की थी और इंस्टॉलेशन की निगरानी की थी, जबकि समझौते के अनुसार श्रमिकों की व्यवस्था करना जेएससीए की जिम्मेदारी थी। उन्होंने वेतन भुगतान का कोई लिखित दस्तावेज न होने का हवाला देते हुए दावा किया कि श्रमिकों और कंपनी के बीच कोई नियोक्ता-कर्मचारी संबंध नहीं था। इसके अतिरिक्त, वेलमोंट और गुलाब खान के वकीलों ने यह भी दलील दी कि उनके प्रतिनिधियों को आपराधिक मामले में पहले ही बरी किया जा चुका है, जो उन्हें इस दीवानी दायित्व से भी मुक्त करता है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने एफआईआर, पुलिस चार्जशीट और गवाहों के बयानों सहित रिकॉर्ड पर मौजूद सभी साक्ष्यों की गहन समीक्षा की। कोर्ट ने पाया कि मृतक के परिजनों और अन्य गवाहों ने स्पष्ट रूप से गवाही दी थी कि तकनीशियन वेलमोंट स्ट्रक्चर्स के निर्देशों के तहत काम कर रहे थे और कंपनी उन्हें 10,000 रुपये मासिक वेतन और 100 रुपये दैनिक भत्ता देती थी।
आपराधिक मामले में बरी होने के तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इससे दीवानी मुआवजे का दायित्व समाप्त नहीं होता। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“आपराधिक मामलों में संभावनाओं की प्रबलता नागरिक और मुआवजा मामलों की तुलना में भिन्न होती है।”
इसके बाद हाईकोर्ट ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम की धारा 12, विशेष रूप से इसकी उप-धारा (3) के कानूनी ढांचे का विश्लेषण किया। कोर्ट ने कहा कि मुख्य नियोक्ता केवल तभी उत्तरदायी होता है जब किया जा रहा काम उसके नियमित व्यवसाय का हिस्सा हो। कानून की इस बारीकी को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“अधिनियम की धारा 12 की उप-धारा (3) के आलोक में यह स्पष्ट होता है कि भले ही काम मुख्य नियोक्ता के सामान्य उद्देश्यों के दायरे में हो, लेकिन वह तब तक उत्तरदायी नहीं है जब तक कि वह काम उसके व्यापार या व्यवसाय का हिस्सा न हो।”
इस सिद्धांत को वर्तमान विवाद पर लागू करते हुए कोर्ट ने पाया:
“दिए गए तथ्यों में, बिजली के उपकरणों की स्थापना और अन्य विद्युत कार्य जेएससीए का व्यापार और व्यवसाय नहीं है, जो क्रिकेट के प्रबंधन और प्रशासन के लिए एक निकाय है। दूसरी ओर, मैसर्स वेलमोंट स्ट्रक्चर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड सीधे मरम्मत और रखरखाव के लिए बिजली के उपकरणों की आपूर्ति में शामिल है, और इसलिए, दुर्घटना का कारण बनने वाला काम निश्चित रूप से मैसर्स वेलमोंट स्ट्रक्चर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड का सामान्य व्यापार और व्यवसाय है।”
कोर्ट का निर्णय
इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने रांची लेबर कोर्ट के 2 मार्च 2023 के आदेशों में संशोधन किया। कोर्ट ने आधिकारिक तौर पर मैसर्स वेलमोंट स्ट्रक्चर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को मुख्य नियोक्ता और गुलाब खान को तत्काल नियोक्ता घोषित किया।
हाईकोर्ट ने जेएससीए की अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया और वेलमोंट की अपीलों को खारिज कर दिया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कोर्ट ने जेएससीए को यह स्वतंत्रता दी कि वह लेबर कोर्ट के समक्ष लंबित अपने वसूली मामलों को आगे बढ़ाए और अधिनियम की धारा 12 के तहत क्षतिपूर्ति प्रावधानों के अनुसार, अपनी जमा की गई पूरी मुआवजा राशि वेलमोंट स्ट्रक्चर्स और गुलाब खान से वसूल करे।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: द प्रेसिडेंट, झारखंड स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन बनाम मैजुल हक व अन्य
वाद संख्या: एम.ए. संख्या 192/2023
पीठ: जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी
निर्णय की तिथि: 2 जुलाई, 2026

