केरल हाईकोर्ट में ‘द केरला स्टोरी 2’ विवाद: निर्माता बोले– रिलीज़ रोकने की याचिकाएँ समयपूर्व, CBFC ही एकमात्र प्राधिकरण

केरल हाईकोर्ट में ‘द केरला स्टोरी 2 – गोज़ बियॉन्ड’ के निर्माता विपुल अमृतलाल शाह ने फिल्म की रिलीज़ पर रोक लगाने की मांग करने वाली याचिकाओं को “समयपूर्व, भ्रमित और विचारणीय नहीं” बताया है। उनका कहना है कि सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के तहत फिल्म को प्रमाणित करने का अधिकार केवल केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) को है और अदालत उसकी सामग्री का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकती।

न्यायमूर्ति बेच्चू कुरियन थॉमस ने बुधवार को कहा कि याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई दोपहर 3 बजे की जाएगी।

निर्माता ने अपने हलफनामे में कहा कि हाईकोर्ट की पर्यवेक्षणीय अधिकारिता CBFC के विशेषज्ञ निर्णय के स्थान पर स्वयं फिल्म की सामग्री का मूल्यांकन करने तक विस्तृत नहीं है। उन्होंने याचिकाओं में लगाए गए आरोपों से इनकार करते हुए उन्हें “कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग” बताया।

पहले याचिकाकर्ता के संबंध में उन्होंने कहा कि याचिका “दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य और आर्थिक लाभ प्राप्त करने के इरादे” से दायर की गई है।

हलफनामे में कहा गया कि फिल्म के टीज़र याचिका दायर होने से 16 दिन पहले जारी हो चुके थे और केवल दो मिनट के टीज़र के आधार पर, पूरी फिल्म देखे बिना, प्रमाणित फिल्म की रिलीज़ पर रोक नहीं लगाई जा सकती।

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निर्माता ने यह भी कहा कि बिना किसी प्रथमदृष्टया कानूनी त्रुटि पाए, केवल टीज़र के आधार पर पूर्व-प्रतिबंध लगाने से निर्माता, प्रदर्शकों और वितरकों को “भारी और अपूरणीय आर्थिक क्षति” होगी। उनके अनुसार फिल्म भारत और विदेशों में 1,800 से अधिक सिनेमाघरों में रिलीज़ के लिए निर्धारित है।

फिल्म के शीर्षक को लेकर हलफनामे में कहा गया कि “गोज़ बियॉन्ड” शब्द यह स्पष्ट संकेत देता है कि कहानी केवल केरल तक सीमित नहीं है और शीर्षक में प्रयुक्त “द” शब्द पहली फिल्म के संदर्भ में है।

निर्माता ने यह भी कहा कि यदि किसी प्रकार की कानून-व्यवस्था की आशंका है तो उसे नियंत्रित करना राज्य का दायित्व है, न कि प्रमाणित फिल्म की रिलीज़ रोकना। उनके अनुसार, यदि विरोध या हिंसा की आशंका के आधार पर फिल्म रोकी जाती है तो CBFC की प्रमाणन प्रक्रिया और अभिव्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता निरर्थक हो जाएगी।

तीन अलग-अलग याचिकाओं में फिल्म को दिए गए CBFC प्रमाणपत्र को रद्द करने की मांग की गई है। फिल्म 27 फरवरी को रिलीज़ के लिए निर्धारित है।

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कन्नूर के श्रीदेव नंबूदरी द्वारा दायर याचिका में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, CBFC और निर्माता को पक्षकार बनाया गया है। याचिका में प्रमाणपत्र रद्द करने के साथ-साथ फिल्म के शीर्षक पर पुनर्विचार और कुछ संशोधन की मांग की गई है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि CBFC ने सिनेमैटोग्राफ अधिनियम के प्रावधानों का पालन किए बिना प्रमाणन दिया। याचिका के अनुसार टीज़र और ट्रेलर में कई राज्यों की महिलाओं से जुड़ी कथाएँ दिखाते हुए सामग्री को ‘द केरला स्टोरी’ नाम से प्रस्तुत किया गया है, जिससे आतंकवाद, जबरन धर्मांतरण और जनसांख्यिकीय साजिश जैसे आरोपों को केवल केरल से जोड़ा गया है।

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याचिका में कहा गया है कि ऐसा चित्रण पूरे राज्य की छवि को धूमिल कर सकता है, सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है और सांप्रदायिक व क्षेत्रीय तनाव पैदा कर सकता है।

मंगलवार को हाईकोर्ट ने मौखिक रूप से कहा था कि टीज़र और ट्रेलर केरल जैसे सांप्रदायिक सौहार्द वाले राज्य को गलत तरीके से प्रस्तुत करते प्रतीत होते हैं और राज्य का नाम इस्तेमाल कर “सच्ची घटनाओं” का दावा करने से तनाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

मामले पर विस्तृत सुनवाई जारी रहेगी।

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