सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार के जाति आधारित जनगणना कराने के फैसले को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) को सिरे से खारिज कर दिया। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि जनगणना में जातियों को शामिल करना पूरी तरह से सरकार का नीतिगत फैसला (Policy Matter) है और न्यायपालिका इसमें दखल नहीं देगी।
अदालत ने कहा कि देश के पिछड़े वर्गों के उत्थान और उनके लिए सही कल्याणकारी नीतियां बनाने के लिए सरकार के पास उनकी सटीक आबादी के आंकड़े होना बेहद आवश्यक है।
क्या है पूरा मामला?
यह कानूनी विवाद आगामी 2027 की जनगणना से जुड़ा है, जो देश की 16वीं राष्ट्रीय जनगणना होगी। इस बार की जनगणना कई मायनों में ऐतिहासिक होने जा रही है:
- यह भारत की पहली पूर्णतः डिजिटल (Digital Census) जनगणना होगी।
- साल 1931 के बाद यह देश का पहला ऐसा राष्ट्रीय अभियान होगा, जिसमें विस्तृत रूप से जातियों की गिनती भी शामिल की जाएगी।
इस फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ता सुधाकर गुम्मुला ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर सरकार के कदम को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता सुधाकर गुम्मुला ने इस मामले में किसी वकील के बजाय खुद व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपनी दलीलें पेश कीं।
गुम्मुला का तर्क था कि सरकार के पास पहले से ही जातियों से जुड़े पर्याप्त आंकड़े और विवरण मौजूद हैं। उनका कहना था कि जब आंकड़े पहले से ही उपलब्ध हैं, तो फिर से एक नई जातिगत जनगणना कराने की कोई आवश्यकता नहीं है और इस कवायद से बचा जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और पीठ का रुख
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने याचिकाकर्ता की दलीलों से पूरी असहमति जताई।
पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि जनगणना का प्रारूप क्या हो, यह तय करना पूरी तरह से कार्यपालिका (Executive) के नीतिगत दायरे में आता है। सामाजिक कल्याण के लिए सटीक जनसांख्यिकीय डेटा के महत्व को रेखांकित करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की:
“यह पूरी तरह से नीतिगत मामला है कि जनगणना जाति आधारित होनी चाहिए या नहीं। इसमें गलत क्या है? … सरकार को यह पता होना चाहिए कि पिछड़े वर्ग में कितने लोग हैं और उनके लिए किस तरह के कल्याणकारी कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। यह नीतिगत दायरे के भीतर है।”
अदालत ने कहा कि किस प्रकार के आंकड़ों की आवश्यकता है और उन्हें कैसे जुटाया जाना है, यह तय करना पूरी तरह सरकार का विशेषाधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि नीतिगत फैसलों में न्यायिक हस्तक्षेप का कोई ठोस आधार नहीं है। इसी के साथ अदालत ने सुधाकर गुम्मुला की याचिका को खारिज कर दिया, जिससे सरकार के लिए साल 2027 की डिजिटल जनगणना में जातिगत आंकड़े जुटाने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।

