हनीमून मर्डर केस: क्या अरेस्ट मेमो में टाइपिंग की गलती से मिल सकती है जमानत? सुप्रीम कोर्ट बड़ी बेंच को सौंप सकता है मामला

सुप्रीम कोर्ट इस जटिल कानूनी सवाल पर विचार करने के लिए मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेजने पर विचार कर रहा है कि क्या अरेस्ट मेमो (गिरफ्तारी ज्ञापन) में हुई मामूली लिपिकीय या टाइपिंग की त्रुटि के आधार पर किसी आरोपी की गिरफ्तारी को अवैध घोषित कर उसे जमानत दी जा सकती है। कोर्ट मेघालय हाईकोर्ट के उस फैसले की समीक्षा कर रहा है, जिसके तहत अपने कारोबारी पति की हत्या की साजिश रचने की आरोपी सोनम रघुवंशी को जमानत दी गई थी।

जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने गुरुवार को मामले की सुनवाई के दौरान राज्य पुलिस को निर्देश दिया कि वे गिरफ्तारी के समय आरोपी को सौंपे गए मूल दस्तावेजों की स्पष्ट फोटोकॉपी अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें। पीठ ने मौखिक तौर पर स्पष्ट किया कि यदि बचाव पक्ष द्वारा उठाए गए तकनीकी आधार कानूनन टिकने योग्य नहीं पाए जाते हैं, तो आरोपी का जमानत आदेश रद्द कर दिया जाएगा।

अरेस्ट मेमो को लेकर कानूनी पेंच

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात की आवश्यकता जताई कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को तुरंत लिखित में आधार सौंपने की अनिवार्यता से जुड़े अलग-अलग न्यायिक फैसलों के बीच तालमेल बिठाना जरूरी है।

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब मेघालय हाईकोर्ट ने बीती 29 जून को आरोपी सोनम रघुवंशी की जमानत को बरकरार रखने का फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें निचली अदालत द्वारा दी गई जमानत को रद्द करने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट का मानना था कि पुलिस ने अरेस्ट मेमो तैयार करते समय न्यायिक सजगता का परिचय नहीं दिया, क्योंकि उन्होंने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत हत्या की सजा से जुड़ी धारा 103(1) की जगह एक गैर-मौजूद धारा 403 का उल्लेख कर दिया था। हाईकोर्ट ने इसे उचित लिखित आधार न दिए जाने के समान माना था।

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गंभीर अपराध के आगे तकनीकी गलती मामूली: सॉलिसिटर जनरल

राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि अरेस्ट मेमो में गलत धारा का दर्ज होना विशुद्ध रूप से एक टाइपिंग की भूल थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस लिपिकीय त्रुटि की वजह से अपराध की भयावहता को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। मेहता के अनुसार, आधिकारिक रिकॉर्ड साफ तौर पर दर्शाते हैं कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को हिरासत में लिए जाने के वास्तविक कारणों से अवगत करा दिया गया था।

सॉलिसिटर जनरल ने इसे पूरी योजना के तहत की गई हत्या करार दिया। उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश के इंदौर का रहने वाला यह नवविवाहित जोड़ा हनीमून मनाने मेघालय गया था। वहाँ आरोपी पत्नी ने कथित तौर पर वित्तीय लाभ हासिल करने के लिए किराए के हत्यारों के साथ मिलकर एक पहाड़ी पर अपने पति की हत्या की साजिश रची और शव को एक गहरी खाई में फेंक दिया।

मामले का घटनाक्रम

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इंदौर निवासी कारोबारी राजा रघुवंशी और उनकी पत्नी सोनम पिछले साल 23 मई को मेघालय के सोहरा इलाके में घूमने के दौरान लापता हो गए थे। इसके बाद, खोजी दलों ने 2 जून 2025 को राजा रघुवंशी का शव एक गहरी खाई से बरामद किया। पुलिस ने हत्या की साजिश में संलिप्तता के आरोप में उसी महीने सोनम रघुवंशी को गिरफ्तार कर लिया था।

इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने 27 अप्रैल को आरोपी को जमानत दे दी थी, जिसे बाद में मेघालय हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया। हाईकोर्ट के इस निर्णय के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। इससे पहले, 3 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ, जिसमें जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस शील नागू शामिल थे, ने हाईकोर्ट के जमानत आदेश पर तुरंत रोक लगाने से इनकार कर दिया था।

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