इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने स्पष्ट किया है कि केवल दस्तावेजी सबूतों के आधार पर विभागीय कार्यवाही में किसी भी सरकारी कर्मचारी को दंडित नहीं किया जा सकता। कोर्ट के अनुसार, आरोपों को साबित करने के लिए मौखिक गवाही दर्ज करना अनिवार्य है। ऐसा न करना उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1999 के साथ-साथ प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है।
जस्टिस करुणेश सिंह पवार ने यह महत्वपूर्ण फैसला मोहनलालगंज के तत्कालीन उप-जिलाधिकारी (एसडीएम) संतोष कुमार सिंह की याचिका को स्वीकार करते हुए सुनाया। इसके साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा उनके खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को पूरी तरह रद्द कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि और कार्रवाई
यह विवाद साल 2019 में भसंडा गांव में आवासीय पट्टों के आवंटन में हुई कथित अनियमितताओं से शुरू हुआ था। इस मामले में हुई विभागीय जांच के बाद, राज्य सरकार ने सितंबर 2025 में संतोष कुमार सिंह पर दंडात्मक कार्रवाई की थी। सरकार ने उनकी एक वार्षिक वेतन वृद्धि (इंक्रीमेंट) को स्थाई रूप से रोक दिया था और उनके सेवा रिकॉर्ड में एक परिनिंदा प्रविष्टि (सेंसर एंट्री) दर्ज कर दी थी। दिसंबर 2025 में इस सजा के खिलाफ सिंह की अपील को भी खारिज कर दिया गया, जिसके बाद उन्होंने अदालत का रुख किया।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता संतोष कुमार सिंह ने दलील दी कि जांच अधिकारी ने विभागीय कार्रवाई के दौरान न तो कोई मौखिक सुनवाई की और न ही गवाहों के बयान दर्ज किए। इस वजह से उन्हें गवाहों से जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) करने का कोई अवसर नहीं मिल सका, जो कि उनके बचाव के अधिकार का हनन है।
अदालत का फैसला और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने मामले की समीक्षा के बाद पाया कि विभागीय अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने बिना सोचे-विचारे और यांत्रिक तरीके से यह दंडात्मक कार्रवाई की थी। कोर्ट ने कहा कि विभाग आरोपों को साबित करने के लिए कोई भी मौखिक साक्ष्य प्रस्तुत करने में असमर्थ रहा।
इसके साथ ही, अदालत ने इस बात को भी रेखांकित किया कि फैसला लेते समय याचिकाकर्ता के बचाव और राजस्व परिषद (बोर्ड ऑफ रेवेन्यू) की अनुकूल रिपोर्ट को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। राजस्व परिषद ने अपनी राय में स्पष्ट कहा था कि संतोष कुमार सिंह ने मामले में पूरी सतर्कता बरती थी, गड़बड़ी सामने आते ही तुरंत सुधारात्मक कदम उठाए थे और उनके काम में किसी भी तरह की दुर्भावना का कोई सबूत नहीं था। हाईकोर्ट ने इस पूरी जांच प्रक्रिया को पूरा करने में लगे करीब चार साल के लंबे समय पर भी सवाल उठाया, जिसका विभाग के पास कोई तार्किक स्पष्टीकरण नहीं था।

