हवाई सफर करने वालों के लिए एक राहत भरी खबर है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार से हवाई किरायों को तर्कसंगत बनाने और यात्रियों को राहत देने के लिए कदम उठाने को कहा है। कोर्ट ने एक ही रूट पर अलग-अलग एयरलाइंस के किरायों में भारी अंतर पर गहरी चिंता जताई।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा, “किरायों में इस विसंगति को दूर कर लोगों को कुछ राहत देने की कोशिश करें।” पीठ ने उदाहरण देते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि एक ही दिन में, एक ही रूट पर, एक एयरलाइन इकोनॉमी क्लास के लिए ₹8,000 वसूल रही है, जबकि दूसरी एयरलाइन ₹18,000 ले रही है।
जस्टिस मेहता ने किरायों में ‘तर्कसंगतता’ (rationalisation) की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके जवाब में, केंद्र का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने माना कि यह एक समस्या है। उन्होंने अदालत को आश्वस्त किया कि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है और इस पर विचार कर रही है। उन्होंने बताया कि जनवरी 2025 में लागू हुए नए ‘भारतीय वायुयान अधिनियम 2024’ (Bharatiya Vayuyan Adhiniyam of 2024) के तहत नए नियम बनाए जा रहे हैं और इसके लिए विचार-विमर्श की प्रक्रिया जारी है।
यह टिप्पणियां सामाजिक कार्यकर्ता एस. लक्ष्मीनारायणन की याचिका पर सुनवाई के दौरान की गईं। इस याचिका में नागरिक उड्डयन क्षेत्र में पारदर्शिता और यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत और स्वतंत्र नियामक (regulator) बनाने की मांग की गई है। साथ ही, निजी एयरलाइंस द्वारा वसूले जाने वाले ‘अप्रत्याशित’ और ‘मनमाने’ किरायों तथा अन्य शुल्कों (ancillary charges) को नियंत्रित करने के लिए दिशानिर्देश जारी करने की अपील की गई है।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रवींद्र श्रीवास्तव ने तर्क दिया कि ‘विमान अधिनियम 1937’ (Aircraft Act of 1937) के तहत पहले से ही नियम मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पुराने नियमों के तहत नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) के पास यह शक्ति है कि यदि कोई एयरलाइन अत्यधिक या ‘शिकारी’ (predatory) किराया वसूलती है, तो वह हस्तक्षेप कर सकता है और निर्देश जारी कर सकता है। श्रीवास्तव ने आरोप लगाया, “नियम हैं, शक्तियां हैं, लेकिन उन शक्तियों का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है।”
सॉलिसिटर जनरल मेहता ने सहमति व्यक्त की कि पुराने नियम मौजूद हैं, लेकिन नए कानून के तहत नए नियम तैयार किए जा रहे हैं। अदालत ने याचिकाकर्ता को केंद्र के हलफनामे का जवाब देने का निर्देश दिया और अगली सुनवाई 13 जुलाई तय की।
हवाई किरायों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का यह रुख नया नहीं है। इससे पहले:
- जनवरी: कोर्ट ने त्योहारों के दौरान किरायों में होने वाली भारी वृद्धि को ‘शोषण’ (exploitation) करार दिया था और कहा था कि वह इन ‘अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव’ में हस्तक्षेप करेगा।
- फरवरी: केंद्र ने कोर्ट को बताया था कि नागरिक उड्डयन मंत्रालय याचिका में उठाए गए मुद्दों पर सक्रियता से विचार कर रहा है।
- अप्रैल: कोर्ट ने इस मामले में हलफनामा दायर करने में देरी के लिए केंद्र सरकार को फटकार लगाई थी।
याचिका में कई अन्य गंभीर मुद्दे भी उठाए गए हैं:
- सामान की सीमा घटना: निजी एयरलाइंस ने बिना किसी उचित कारण के इकोनॉमी क्लास के यात्रियों के लिए फ्री चेक-इन बैगेज की सीमा 25 किलो से घटाकर 15 किलो कर दी है। याचिका के अनुसार, जो पहले टिकट का हिस्सा था, उसे अब कमाई का जरिया बना लिया गया है।
- छुपे हुए शुल्क: वर्तमान में किसी भी प्राधिकरण के पास किरायों या अन्य शुल्कों की समीक्षा करने या उन्हें सीमित करने का अधिकार नहीं है, जिससे एयरलाइंस छुपे हुए शुल्कों के माध्यम से उपभोक्ताओं का शोषण करती हैं।
- डायनेमिक प्राइसिंग: मांग के आधार पर किराया तय करने (dynamic pricing) के एयरलाइंस के मनमाने एल्गोरिदम, और त्योहारी सीजन या खराब मौसम के दौरान किरायों में अचानक वृद्धि का सबसे ज्यादा असर गरीबों और अंतिम समय में यात्रा करने वालों पर पड़ता है।
याचिका में कहा गया है कि सरकार की यह निष्क्रियता नागरिकों के समानता, आवाजाही की स्वतंत्रता और गरिमा के साथ जीवन जीने के मौलिक अधिकारों का हनन करती है, इसलिए तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

