सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के तीन पुलिसकर्मियों को दी गई अग्रिम जमानत रद्द कर दी है। इन अधिकारियों पर आरोप है कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए एक यात्री और उसकी नाबालिग बेटी को मानसिक दबाव में डाला तथा उनके सामान में सोने की छड़ मिलने के बाद उनसे धन की उगाही की। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने आरोपों की गंभीरता और कानून लागू करने वाले अधिकारियों के मामलों में अग्रिम जमानत से जुड़े सिद्धांतों पर उचित विचार नहीं किया।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत आरोपित अधिकारियों को अग्रिम जमानत दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो इससे पुलिस बल की विश्वसनीयता और जनता का भरोसा गंभीर रूप से प्रभावित होगा तथा मामले में हिरासत में पूछताछ आवश्यक हो सकती है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 17 अगस्त 2025 को मुंबई सेंट्रल रेलवे पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर संख्या 451/2025 से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, शिकायतकर्ता अपनी बेटी के साथ हापा दुरंतो एक्सप्रेस से यात्रा कर रहा था। इसी दौरान रेलवे पुलिस की एंटी-सबोटाज यूनिट से जुड़े पुलिसकर्मियों ने उसके सामान की तलाशी ली।
तलाशी के दौरान 14 ग्राम की एक सोने की छड़ और 31,900 रुपये नकद बरामद हुए। आरोप है कि संतोषजनक स्पष्टीकरण दिए जाने के बावजूद पुलिसकर्मी शिकायतकर्ता, उसकी नाबालिग बेटी और उसके बहनोई को एक कमरे में ले गए, जहां उन्हें डराया-धमकाया गया और कथित रूप से सोने की छड़ वापस करने तथा आगे कार्रवाई से बचाने के बदले नकदी देने के लिए मजबूर किया गया।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने आरोपित अधिकारियों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद हाईकोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज, एफआईआर दर्ज कराने में हुई देरी तथा अधिकारियों की पूर्व सेवा रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए उन्हें अग्रिम जमानत दे दी।
सुप्रीम कोर्ट में पक्षों की दलीलें
राज्य की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि तलाशी और जब्ती से संबंधित दिशानिर्देशों के अनुसार पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग आवश्यक थी। उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता और उसके साथ मौजूद लोगों को ऐसे बंद कमरे में ले जाया गया जहां कोई कैमरा नहीं था। राज्य का कहना था कि कमरे के भीतर बिताया गया समय भले ही कम था, लेकिन आरोपित दबाव और धन उगाही की शिकायत को विश्वसनीय बनाने के लिए पर्याप्त था।
राज्य ने यह भी बताया कि विभागीय जांच के बाद तीनों अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है। राज्य का तर्क था कि भले ही आपराधिक मुकदमे में आरोप सिद्ध करने का मानदंड संदेह से परे प्रमाण हो, लेकिन विभागीय जांच में सामने आए निष्कर्ष हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता को दर्शाते हैं और ऐसे में अग्रिम जमानत देना उचित नहीं था।
दूसरी ओर, अधिकारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि आरोप पूरी तरह मनगढ़ंत हैं और राज्य अनावश्यक रूप से उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है जिन्होंने 20 वर्षों से अधिक समय तक बेदाग सेवा दी है। उन्होंने शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी पर भी जोर दिया और कहा कि शिकायतकर्ता को केवल इसलिए सबोटाज रूम में ले जाया गया क्योंकि उसके सामान में सोने की छड़ मिली थी और उसके संबंध में कोई दस्तावेज तत्काल उपलब्ध नहीं थे। उन्होंने यह भी कहा कि सोने की छड़ वापस कर दी गई थी, जिससे उगाही का आरोप कमजोर पड़ता है।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने उस सीसीटीवी फुटेज का अवलोकन किया जिस पर हाईकोर्ट ने भरोसा किया था और उसके निष्कर्षों से असहमति जताई। पीठ ने पाया कि तलाशी के बाद शिकायतकर्ता, एक अन्य वयस्क और बच्ची को एक कमरे में ले जाया गया और कुछ मिनट बाद वे बाहर आए।
कोर्ट ने कहा:
“हमें आश्चर्य है कि हाईकोर्ट ने यह कहा कि उनमें किसी प्रकार की परेशानी के संकेत नहीं थे, जबकि फुटेज में उनके चेहरे के भाव स्पष्ट रूप से दिखाई ही नहीं दे रहे हैं। हम यह भी देखते हैं कि दोनों वयस्क आगे बढ़ रहे थे, जिनमें से एक व्यक्ति हाथों से बेचैनी के साथ इशारे कर रहा था, जबकि बच्ची पीछे चल रही थी। यह स्पष्ट रूप से तनाव और परेशानी का संकेत है।”
पीठ ने यह भी कहा कि बंद कमरे में बिताया गया समय इतना था कि शिकायत में वर्णित घटनाएं घटित हो सकती थीं, हालांकि इन आरोपों को अंततः आपराधिक मुकदमे में साबित करना होगा।
अधिकारियों के इस तर्क पर कि उनकी पहचान-पत्र स्पष्ट रूप से प्रदर्शित थे, कोर्ट ने कहा कि आम नागरिकों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे वर्दीधारी अधिकारियों के पहचान-पत्रों पर लिखे नामों को याद रखें।
कोर्ट ने कहा:
“नाम पट्टिका या पहचान-पत्र पर लिखे छोटे अक्षरों को पढ़ने के लिए किसी हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अपनी गर्दन उठाकर देखने की कोशिश करनी पड़ेगी, जिसे वर्दीधारी कर्मचारी टकराव की कार्रवाई के रूप में ले सकते हैं।”
सोने की छड़ लौटाना आरोपियों के पक्ष में नहीं गया
कोर्ट ने इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया कि सोने की छड़ वापस कर देने से उगाही का आरोप कमजोर हो जाता है। पीठ ने कहा कि अधिकारियों का यह दावा नहीं था कि सोने की वैधता साबित करने वाले दस्तावेज उनके सामने पेश किए गए थे। उनका केवल यह कहना था कि शिकायतकर्ता की पहचान सामने आने के बाद उसे छोड़ दिया गया।
कोर्ट ने कहा कि यदि वास्तव में अधिकारियों को सोने की छड़ के संबंध में संदेह था, तो उन्हें कानून के अनुसार सक्षम प्राधिकारियों को सूचित कर कार्रवाई करनी चाहिए थी। शिकायतकर्ता को उसकी पहचान सामने आने के बाद छोड़ देना अभियोजन के आरोपों को कमजोर करने के बजाय उन्हें बल देता है।
एसओपी के उल्लंघन और बच्ची के प्रति असंवेदनशीलता पर चिंता
पीठ ने मूल्यवान वस्तुओं की तलाशी से संबंधित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर का भी उल्लेख किया। इन प्रक्रियाओं के अनुसार ज्वेलर्स एसोसिएशन द्वारा जारी पहचान-पत्र और संबंधित दस्तावेजों का सत्यापन किया जाना आवश्यक था तथा पूरी प्रक्रिया का उचित रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए था।
कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता को ऐसे कमरे में ले जाया गया जहां सीसीटीवी नहीं था। इसके अलावा, मुंबई रेलवे कमिश्नरेट के तलाशी रजिस्टर में शिकायतकर्ता का नाम भी दर्ज नहीं था।
इस संदर्भ में कोर्ट ने कहा:
“एक और बात जिसने हमें काफी विचलित किया, वह यह है कि हिरासत में लिए गए व्यक्तियों के साथ मौजूद बच्ची के प्रति पुलिसकर्मियों ने पूरी तरह असंवेदनशील रवैया अपनाया।”
फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए आरोपित अधिकारियों को दी गई अग्रिम जमानत समाप्त कर दी और राज्य की अपील स्वीकार कर ली।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके सभी निष्कर्ष प्रथम दृष्टया हैं और केवल इस प्रश्न तक सीमित हैं कि मामले के तथ्यों में अग्रिम जमानत दी जानी चाहिए थी या नहीं। इन टिप्पणियों का आपराधिक मुकदमे की सुनवाई पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
पीठ ने कहा कि यदि इस प्रकार के आरोप सही सिद्ध होते हैं तो इससे पुलिस बल की साख को गंभीर क्षति पहुंचेगी और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस पर जनता द्वारा किया जाने वाला भरोसा कमजोर होगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: महाराष्ट्र राज्य बनाम राहुल दत्ता भोसले एवं अन्य
वाद संख्या: विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक) संख्या 1760 वर्ष 2026 से उत्पन्न आपराधिक अपील
पीठ: जस्टिस संजय कुमार एवं जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 27 मई 2026

