यूपी पंचायत चुनाव को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा कदम उठाया है। हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही राज्य निर्वाचन आयोग से भी पूछा गया है कि प्रदेश में पंचायत चुनाव कराने की संभावित समय-सीमा और तैयारी क्या है।
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति ए. के. चौधरी की अवकाशकालीन पीठ ने यह निर्देश बुधवार को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जारी किए। इस याचिका में सरकार के उस फैसले पर सवाल उठाए गए हैं जिसके तहत कार्यकाल समाप्त होने के बाद ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक बना दिया गया था। इस मामले में अब अगली सुनवाई 10 जुलाई को होगी।
कार्यकाल बढ़ाने के सरकारी फैसले को चुनौती
यह जनहित याचिका स्थानीय वकील ओम प्रकाश प्रजापति ने दायर की है। याचिका में सरकार के 25 मई के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसके तहत पांच साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक का प्रभार दे दिया गया था। इन ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो गया था।
याचिकाकर्ता का कहना है कि उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम की धारा 12 के मुताबिक, ग्राम प्रधान का कार्यकाल शपथ लेने की तारीख से केवल पांच साल के लिए ही सीमित होता है। चुनाव समय पर न कराकर और फिर निवर्तमान प्रधानों को ही प्रशासक नियुक्त करके सरकार ने एक तरह से उनके कार्यकाल को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया है, जो पूरी तरह से गैर-कानूनी है।
पुरानी परंपरा का पालन करने की मांग
याचिका में दलील दी गई है कि अगर तय समय पर चुनाव कराना संभव नहीं था, तो सरकार को पुरानी परंपरा अपनानी चाहिए थी। निवर्तमान ग्राम प्रधानों के हाथ में दोबारा सत्ता सौंपने के बजाय सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) या किसी अन्य सरकारी अधिकारी को प्रशासक नियुक्त किया जाना चाहिए था।
सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया। इसके साथ ही राज्य निर्वाचन आयोग को आदेश दिया कि वह पंचायत चुनाव कराने की वर्तमान स्थिति और संभावित कार्यक्रम की जानकारी कोर्ट को सौंपे।

