राजस्थान हाईकोर्ट ने पूर्व अधिकारी की रोकी गई पूरी पेंशन बहाल की, कहा- बिना दुर्भावना के लिया गया गलत निर्णय कदाचार नहीं

राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत एक सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी की शत-प्रतिशत पेंशन स्थायी रूप से रोक दी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना किसी भ्रष्टाचार या बेईमानी की नीयत के लिया गया कोई गलत अर्द्ध-न्यायिक (क्वासी-जुडिशियल) फैसला कदाचार की श्रेणी में नहीं आता। जस्टिस मुकेश राजपुरोहित की पीठ ने राजस्थान प्रशासनिक सेवा (आरएएस) के पूर्व अधिकारी की याचिका स्वीकार करते हुए यह निर्णय सुनाया।

अर्जित पेंशन वैधानिक अधिकार, खैरात नहीं

अदालत ने कहा कि पेंशन कोई खैरात या अनुकंपा नहीं, बल्कि कर्मचारी द्वारा अपनी सेवा के दौरान अर्जित किया गया एक मूल्यवान वैधानिक अधिकार है। क्षेत्राधिकार के कथित गलत इस्तेमाल के आधार पर किसी पूर्व कर्मचारी को उसकी पूरी सेवानिवृत्ति सुविधाओं से वंचित करना पूरी तरह से मनमाना और गैर-कानूनी है।

23 साल पुराना भूमि मामला

यह विवाद चूरू में ‘प्रशासन गांवों के संग अभियान’ के प्रभारी और समेकित बाल विकास सेवाएं (आईसीडीएस) के उप निदेशक के रूप में अधिकारी की तैनाती से जुड़ा है। अधिकारी ने 10 जनवरी 2002 को एक अर्द्ध-न्यायिक आदेश जारी कर चरागाह भूमि पर खेती के अधिकार दिए थे। राज्य सरकार का आरोप था कि अधिकारी ने राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 के प्रावधानों का उल्लंघन कर अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया और गंभीर लापरवाही बरती।

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याचिकाकर्ता अधिकारी का पक्ष था कि उन्होंने राजस्व रिकॉर्ड, पटवारी की रिपोर्ट, नियमितीकरण समिति की सिफारिशों और संबंधित तहसीलदार के लिखित बयान का अध्ययन करने के बाद ही यह आदेश पारित किया था। इस आदेश के खिलाफ कोई अपील या समीक्षा याचिका भी दायर नहीं की गई थी, जिससे यह निर्णय अंतिम रूप ले चुका था।

अनुशासनिक कार्रवाई में 15 साल की देरी

हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार द्वारा की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई में हुई भारी देरी को भी रेखांकित किया। सरकार ने 10 जनवरी 2002 के आदेश के संबंध में अधिकारी को उनकी सेवानिवृत्ति के दिन, यानी 30 अगस्त 2017 को आरोप पत्र (चार्जशीट) थमाया। इस 15 साल के विलंब का सरकार के पास कोई तार्किक या संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं था।

इसके बाद विभागीय जांच प्रक्रिया चलती रही और 30 अप्रैल 2025 को राज्य अधिकारियों ने अधिकारी की पूरी पेंशन स्थायी रूप से रोकने का दंड सुना दिया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि घटना के 23 साल बाद और सेवानिवृत्ति के लगभग आठ साल बाद सजा तय करना याचिकाकर्ता के अधिकारों का गंभीर हनन है और यह पूरी प्रक्रिया की वैधता को कमजोर करता है।

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जांच प्रक्रिया की कमियां और सरकार का पक्ष

सेवानिवृत्त अधिकारी ने विभागीय जांच की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि जांच के दौरान उन्हें महत्वपूर्ण दस्तावेज मुहैया नहीं कराए गए, उनका अपना बयान दर्ज नहीं किया गया और मुख्य गवाह तत्कालीन तहसीलदार से भी पूछताछ नहीं की गई। इसके बावजूद जांच में आरोपों को सही मान लिया गया।

राज्य सरकार की ओर से सहायक महाधिवक्ता नितेश माथुर ने दलील दी कि कार्रवाई राजस्थान सिविल सर्विसेज (पेंशन) रूल्स, 1996 के तहत नियमानुसार शुरू की गई थी। उन्होंने तर्क दिया कि अधिकारी का कृत्य केवल एक सामान्य न्यायिक त्रुटि नहीं बल्कि गंभीर लापरवाही थी। भ्रष्टाचार या व्यक्तिगत लाभ का प्रमाण न होने से प्रशासनिक कदाचार कम नहीं हो जाता। सरकार का यह भी दावा था कि अधिकारी को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया गया था।

हाईकोर्ट का अंतिम फैसला

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सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि यदि किसी अर्द्ध-न्यायिक फैसले में कोई गलती पाई भी जाती है, तो उसे सीधे तौर पर दंडात्मक कार्रवाई योग्य कदाचार नहीं माना जा सकता। जब तक कि इसमें कोई दुराशय, भ्रष्टाचार या बेईमानी साबित न हो, प्रशासनिक त्रुटियों के आधार पर किसी कर्मचारी के अर्जित पेंशन अधिकारों को पूरी तरह से छीना नहीं जा सकता।

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