झारखंड हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि मानसिक प्रताड़ना और दहेज की मांग झेल रही किसी भी महिला को उसके आत्मसम्मान और गरिमा की कीमत पर दांपत्य जीवन बहाल करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें 27 वर्षीय एक महिला को अपने पति के पास लौटने का निर्देश दिया गया था।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने 23 सितंबर को दिए अपने आदेश में स्पष्ट किया कि महिला के पास अपने पति से अलग रहने का पर्याप्त और उचित आधार मौजूद था। अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर दर्ज साक्ष्य गर्भावस्था के दौरान महिला से 10 लाख रुपये के दहेज की बार-बार मांग और मानसिक उत्पीड़न को साबित करते हैं। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने सितंबर 2022 में पति के पक्ष में दिए गए दांपत्य अधिकारों की बहाली (रेस्टीट्यूशन ऑफ कॉन्जुगल राइट्स) के आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया।
दांपत्य अधिकार और आत्मसम्मान पर अदालत का दृष्टिकोण
पीठ ने स्पष्ट किया कि दांपत्य अधिकार केवल कानूनी प्रावधानों की देन नहीं हैं, बल्कि यह अधिकार वैवाहिक संस्था के मूल स्वरूप में ही स्वाभाविक रूप से निहित हैं। हालांकि, अदालत ने रेखांकित किया कि फैमिली कोर्ट का यह प्राथमिक दायित्व है कि वह प्रस्तुत साक्ष्यों की जांच कर यह तय करे कि दोनों पक्ष शांति और आत्मसम्मान के साथ एक साथ रह सकते हैं या नहीं।
न्यायाधीशों ने कहा कि यदि कोई पक्ष साक्ष्यों के जरिए यह साबित कर देता है कि मानसिक प्रताड़ना और आत्मसम्मान से समझौते के बिना साथ रहना संभव नहीं है, तो अदालतें जबरन साथ रहने का आदेश नहीं दे सकतीं। हाईकोर्ट ने यह भी जोड़ा कि केवल शारीरिक हिंसा या मारपीट ही नहीं, बल्कि यदि वैवाहिक परिस्थितियां ऐसी बन जाएं जहां पत्नी के लिए गरिमा और मान-सम्मान के साथ रहना नामुमकिन हो, तो वह अलग रहने और भरण-पोषण पाने की पूरी हकदार है।
वैवाहिक विवाद और प्रताड़ना के आरोप
इस ईसाई दंपती का विवाह वर्ष 2018 में हुआ था और शादी के बाद वे केवल तीन महीने ही साथ रहे। पति का आरोप था कि पत्नी झगड़ा करती थी, उसने साथ रहने से मना कर दिया और मायके में रहने की जिद करने लगी। पति के मुताबिक, अगस्त 2019 में जब वह पांच महीने की गर्भवती थी, तब वह ससुराल छोड़कर चली गई। इसके बाद दिसंबर 2019 में उसने एक बेटी को जन्म दिया।
दूसरी तरफ, महिला ने अदालत के समक्ष अपनी बात रखते हुए कहा कि शादी के तुरंत बाद से ही 10 लाख रुपये के दहेज के लिए उसका मानसिक उत्पीड़न शुरू हो गया था। गर्भावस्था के दौरान बढ़े दबाव के चलते उसे ससुराल छोड़ना पड़ा। बाद में उसने क्रूरता की कानूनी शिकायत दर्ज कराई और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से मिली धमकियों व गाली-गलौज की जानकारी भी दी। इसके जवाब में पति ने फैमिली कोर्ट में दांपत्य अधिकारों की बहाली की याचिका दायर कर दी थी।
फैमिली कोर्ट के फैसले में खामियां
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के सितंबर 2022 के फैसले की समीक्षा करते हुए कहा कि निचली अदालत ने केवल पति के दावों पर ध्यान केंद्रित किया और यह गलत निष्कर्ष निकाला कि पत्नी दहेज की मांग साबित करने में नाकाम रही। खंडपीठ के अनुसार, फैमिली कोर्ट ने उन जरूरी बयानों और साक्ष्यों की अनदेखी की, जो गर्भावस्था के दौरान महिला को बेसहारा छोड़ने, पैसों की मांग और दुर्व्यवहार को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।
अदालत ने इस तथ्य को भी ध्यान में रखा कि दंपती वर्ष 2019 से ही अलग रह रहा है। ऐसी स्थिति में कई वर्षों की दूरी के बाद वैवाहिक जीवन को दोबारा बहाल करने का निर्देश देना न तो न्यायसंगत है और न ही व्यावहारिक।
इस मामले में हाईकोर्ट में महिला की ओर से एडवोकेट मुकेश कुमार ने पैरवी की, जबकि पति का पक्ष एडवोकेट सर्वेश्वरी कुमारी ने रखा।

