केरल हाईकोर्ट ने डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी को विकलांगता पेंशन देने के आदेश को सही ठहराया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का हवाला देकर सशस्त्र बलों के जवानों को उनके डिसेबिलिटी पेंशन अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस के. नटराजन और जस्टिस जॉनसन जॉन की पीठ ने कोच्चि आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए 16 जुलाई को अपना निर्णय दिया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि संविधान के तहत सशस्त्र बलों में अनुशासन और कर्तव्यों के बेहतर निर्वहन के लिए जवानों के कुछ अधिकारों पर रोक लगाने का प्रावधान है। ऐसी स्थिति में, बीमारियों को केवल निजी जीवनशैली से जोड़कर पेंशन के दावों को खारिज करना स्वीकार्य नहीं है।
अदालत ने कहा कि देश के जवानों का मनोबल बनाए रखना सरकार और समाज की मुख्य जिम्मेदारी है। सैनिक राष्ट्र के लिए अपनी जान तक जोखिम में डालते हैं, इसलिए उनके अधिकारों की उपेक्षा नहीं की जा सकती।
सेना में भर्ती के समय स्वास्थ्य संबंधी रिकॉर्ड न होना बड़ा आधार
सैन्य चिकित्सा नियमों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के सेना में भर्ती होते समय किसी बीमारी का कोई मेडिकल रिकॉर्ड दर्ज नहीं था, तो यह माना जाएगा कि वह बीमारी सेवा के दौरान ही उत्पन्न हुई है। जब तक कि यह साबित करने वाले पुख्ता दस्तावेज न हों कि बीमारी सेवा से पहले से मौजूद थी और शुरुआती जांच में पकड़ी नहीं जा सकी, तब तक अधिकारी को डिसेबिलिटी पेंशन पाने का पूरा अधिकार है।
हाईकोर्ट ने 12 जनवरी 2024 के कोच्चि ट्रिब्यूनल के निर्देश को बरकरार रखा, जिसमें सैन्य अधिकारियों को एक मेडिकल बोर्ड गठित करने का आदेश दिया गया था। यह बोर्ड अधिकारी की दोनों बीमारियों—डायबिटीज और हाइपरटेंशन—की संयुक्त विकलांगता दर (कंपोजिट डिग्री ऑफ डिसेबिलिटी) का आकलन करेगा और उसके आधार पर संशोधित पेंशन भुगतान आदेश जारी करेगा।
अनुच्छेद 226 का दायरा और वकीलों के तर्क
मामले की सुनवाई के दौरान अधिकारियों का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ पैनल अधिवक्ता एम. एस. किरण ने दलील दी कि ट्रिब्यूनल को मेडिकल बोर्ड की राय के खिलाफ आदेश नहीं देना चाहिए था। उन्होंने कहा कि अधिकारी की बीमारियां सैन्य सेवा के कारण न तो उत्पन्न हुई थीं और न ही उससे बढ़ी थीं।
इसके विपरीत, अधिकारी का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता रतीश बी. ने तर्क दिया कि जब कोई व्यक्ति पूर्ण स्वस्थ स्थिति में सेना में शामिल होता है, तो सेवा से मुक्त होते समय उसके स्वास्थ्य में आई किसी भी गिरावट को सैन्य सेवा का ही परिणाम माना जाना चाहिए। जवान पर इसे साबित करने का अतिरिक्त बोझ नहीं डाला जा सकता।
हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों को स्पष्ट करते हुए कहा कि इसका उपयोग केवल गंभीर अन्याय को रोकने के लिए किया जाता है, न कि ट्रिब्यूनल के हर प्रशासनिक आदेश या निष्कर्ष में हस्तक्षेप करने के लिए।

