तेलंगाना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सड़क हादसे में बेटे को खोने वाले दंपत्ति को 10 दिनों में मिलेगी सरोगेसी की अनुमति

सड़क हादसे में अपने इकलौते बेटे को खोने के लगभग 11 साल बाद, एक दंपत्ति को सरोगेसी के माध्यम से फिर से माता-पिता बनने का अधिकार मिल गया है। तेलंगाना हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा पात्रता प्रमाण पत्र देने से इंकार करने वाले आदेश को निरस्त करते हुए संबंधित राज्य प्राधिकरण को 10 दिनों के भीतर आवश्यक प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया है।

जस्टिस बी विजयसेन रेड्डी ने 22 जुलाई को यह आदेश सुनाया। अदालत ने दंपत्ति की याचिका स्वीकार करते हुए सरोगेसी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021 के तहत पात्रता और अनिवार्यता प्रमाण पत्र खारिज करने के 23 फरवरी के फैसले को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने तेलंगाना के असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (एआरटी) और सरोगेसी के अतिरिक्त निदेशक को आदेश मिलने के 10 दिनों के भीतर प्रमाण पत्र जारी करने को कहा है, बशर्ते दंपत्ति कानून के तहत अन्य आवश्यक शर्तों को पूरा करते हों।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बनाया आधार

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 9 अक्टूबर 2025 को दिए गए एक फैसले का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में सरोगेसी कानून के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए विशेष परिस्थितियों में एक दंपत्ति को राहत दी थी और धारा 4(iii)(c)(I) के तहत लागू उम्र की पाबंदी में छूट दी थी। जस्टिस रेड्डी ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट का वह कानूनी सिद्धांत इस मामले में भी पूरी तरह लागू होता है। इसके साथ ही अदालत ने बिना किसी कानूनी खर्च के याचिका का निपटारा कर दिया।

बेटे की मौत के बाद खारिज हो गई थी अर्जी

READ ALSO  इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आपराधिक अपील पर बहस करने के बजाय जमानत मांगने की प्रथा की निंदा की

मामले के विवरण के अनुसार, याचिकाकर्ता पति का पहला विवाह 1996 में हुआ था और 20 फरवरी 1997 को उनका एक बच्चा हुआ। 22 नवंबर 2008 को तलाक के बाद बच्चे की कस्टडी पिता के पास रही। इसके बाद उन्होंने 14 फरवरी 2013 को दूसरी शादी की, जिससे 17 जून 2014 को एक बेटे का जन्म हुआ। हालांकि, 6 दिसंबर 2015 को एक सड़क दुर्घटना में उस बच्चे की मृत्यु हो गई।

इस शादी से कोई संतान न रहने पर दंपत्ति ने सरोगेसी का विकल्प चुना। लेकिन सक्षम प्राधिकरण ने 23 फरवरी को उनकी अर्जी यह कहते हुए खारिज कर दी कि नियमों के तहत दूसरे बच्चे के लिए सरोगेसी की अनुमति केवल तभी दी जा सकती है जब पहला जीवित बच्चा किसी गंभीर बीमारी, लालाइलाज विकार या शारीरिक असामान्यता से ग्रस्त हो। दंपत्ति इस शर्त को पूरा नहीं करते थे, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

READ ALSO  बिना सबूत के ग्राहक को लापरवाह नहीं मान सकते बैंक: कलकत्ता हाईकोर्ट ने धोखाधड़ी वाले लेनदेन की राशि वापस करने का दिया आदेश

प्रजनन स्वायत्तता पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी

यह निर्णय देश भर में सरोगेसी कानून की सख्त पाबंदियों पर अदालतों के हालिया रुख से मेल खाता है। इससे पहले 7 जुलाई को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी 17 साल से अधिक समय से विवाहित एक दंपत्ति को राहत दी थी, जिन्हें कानूनी आयु सीमा के कारण सरोगेसी से रोका जा रहा था।

जस्टिस शेखर बी सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की पीठ ने एक दशक पहले आईवीएफ उपचार के बाद तीन भ्रूण सुरक्षित रखने वाली 50 वर्ष से अधिक उम्र की महिला के लिए आयु सीमा में ढील दी। पीठ ने कहा कि सरोगेसी कानून के तहत उम्र की पाबंदी को कड़ाई से लागू करना भारतीय संविधान के आर्टिकल 21 के तहत मिले प्रजनन स्वायत्तता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है।

READ ALSO  मजिस्ट्रेट ने प्रारंभिक जांच भी नहीं की है जो धारा 202 CrPC की एक बुनियादी आवश्यकता है: हाईकोर्ट ने मामले को मजिस्ट्रेट के पास वापस भेजा
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles