कमाऊ पत्नी नहीं दे सकती दोहरी वित्तीय मार: बॉम्बे हाईकोर्ट ने अंतरिम मेंटेनेंस घटाकर आधा किया

बॉम्बे हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के वित्तीय विवाद से जुड़े एक मामले में स्पष्ट किया है कि यदि दोनों जीवनसाथी कमाते हैं, तो समानता का दावा अपनी सुविधा के अनुसार नहीं किया जा सकता। अदालत ने एक 41 वर्षीय चार्टर्ड अकाउंटेंट की अर्जी पर सुनवाई करते हुए उसकी पत्नी के लिए तय 50,000 रुपये प्रति माह के अंतरिम मेंटेनेंस को घटाकर 25,000 रुपये कर दिया। अदालत के अनुसार, जो पत्नी घर की किस्तों में योगदान दिए बिना महंगे इलाके में रहने की जिद करती है, वह पति पर अकेले सारा आर्थिक बोझ नहीं डाल सकती।

जस्टिस एम. एम. साठये ने 24 जुलाई को जारी अपने आदेश में कहा कि अगर कोई पत्नी मुंबई के अंधेरी जैसे महंगे इलाके में रहने की उम्मीद करती है और उसकी ईएमआई अपनी जेब से नहीं भरती, तो वह पति से भारी-भरकम मेंटेनेंस की मांग नहीं कर सकती। अदालत ने टिप्पणी की कि जब जीवनशैली को बनाए रखने की बात आती है, तो दोनों पक्षों को उसमें योगदान देना चाहिए।

आय में गिरावट और संपत्ति की ईएमआई का संकट

READ ALSO  Road Rage Death Case: Bombay High Court Grants Pre-Arrest Bail to Woman Citing Recent Childbirth

मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता पति मुंबई में एक अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी में था और उसने अंधेरी तथा पनवेल में दो फ्लैट खरीदने के लिए बैंक से होम लोन लिया था। कोविड-19 महामारी के दौरान उसकी नौकरी चली गई, जिसके बाद उसकी कमाई घट गई। वित्तीय तंगी के कारण वह अपने गृहनगर मध्य प्रदेश लौट गया और वहां स्वतंत्र रूप से सीए का काम शुरू किया।

पति का पक्ष रख रहीं अधिवक्ता पुष्पा गनेड़ीवाल ने अदालत को बताया कि उनका मुवक्किल अंधेरी वाले फ्लैट के लिए लगभग 60,000 रुपये और पनवेल वाले फ्लैट के लिए 40,000 रुपये की मासिक किस्त खुद चुका रहा है। इसके अलावा उसे मध्य प्रदेश में अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल भी करनी होती है। आय कम होने और मेंटेनेंस का बकाया बढ़ने के कारण वह भारी आर्थिक दबाव में है।

संपत्ति की बिक्री और स्थानांतरण पर असहमति

पति ने अदालत के समक्ष प्रस्ताव रखा था कि यदि उसकी पत्नी और 12 से 13 वर्ष का बेटा पनवेल वाले फ्लैट में स्थानांतरित हो जाते हैं, तो वह अंधेरी वाले महंगे फ्लैट को बेचकर बकाया मेंटेनेंस चुका सकता है और अन्य खर्चों का निपटारा कर सकता है। इस व्यवस्था के तहत वह हर महीने 25,000 रुपये देने को तैयार था। हालांकि, पत्नी ने पनवेल या मध्य प्रदेश जाने से इनकार कर दिया।

पत्नी और बच्चे की ओर से पेश अधिवक्ता अक्षय शेट्टी ने तर्क दिया कि पति ने अंधेरी स्थित वैवाहिक घर को अपनी मर्जी से छोड़ा था। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति घटती कमाई के बीच अपने मासिक दायित्वों और अदालती आदेशों को पूरा करने के लिए अपनी संपत्ति बेचना चाहता है, तो उस अनुरोध में कोई गलती नहीं निकाली जा सकती।

पारिवारिक अदालत के फैसले पर सवाल और साझा जिम्मेदारियां

READ ALSO  हाईकोर्ट ने कहा "मरे हुए घोड़े को कोड़े मारने से कोई सार्थक उद्देश्य पूरा नहीं होता"; गैर-समायोजित पत्नी से पति को तलाक दिया

हाईकोर्ट ने पाया कि पत्नी एमबीए डिग्री धारक है और जनवरी 2025 में पारिवारिक अदालत द्वारा जारी पिछले आदेश के समय उसकी मासिक आय कम से कम 15,000 रुपये थी। अदालत ने टिप्पणी की कि महामारी का असर देश भर के व्यवसायों और पेशों पर पड़ा है और पति को इससे अलग नहीं देखा जा सकता।

अदालत ने पारिवारिक अदालत के उस निष्कर्ष को भी खारिज कर दिया, जिसमें बिना किसी ठोस गणना या आंकड़ों के पति की मासिक आय 1 लाख से 1.5 लाख रुपये मानी गई थी।

READ ALSO  बॉम्बे हाईकोर्ट ने मध्यस्थता अवार्ड के क्रियान्वयन पर रोक लगाई, अवार्ड राशि जमा करने का आदेश दिया

बच्चे के पालन-पोषण पर हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि यदि दोनों माता-पिता कमाते हैं और बच्चे को बेहतर शिक्षा देना चाहते हैं, तो दोनों को शैक्षणिक खर्च उठाना चाहिए। अदालत ने कहा कि बच्चे के स्कूल, उसके स्थान और फीस संरचना से जुड़े फैसले दोनों माता-पिता द्वारा मिलकर लिए जाने चाहिए, न कि एकतरफा फैसला लेकर दूसरे पर पूरा आर्थिक बोझ डाला जाए।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles