मौजूदा कर्ज चुकाने के लिए दिया गया चेक सुरक्षा के रूप में हो या आदाता द्वारा भरा गया हो, धारा 138 एनआई एक्ट के तहत अपराध बनेगा: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस राकेश कैंथला ने एक आपराधिक रिवीजन याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई चेक पहले से मौजूद कर्ज या देनदारी को चुकाने के लिए जारी किया जाता है, तो उस पर पराक्रम्य लिखित अधिनियम, 1881 (एनआई एक्ट) की धारा 138 के तहत आपराधिक जवाबदेही तय होगी। कोर्ट ने माना कि भले ही आरोपी यह दावा करे कि चेक केवल सुरक्षा (सिक्योरिटी) के तौर पर दिया गया था, उसे आदाता (पेयी) द्वारा भरा गया था या वह बंद हो चुके बैंक खाते का था, तब भी धारा 138 लागू होगी। हाईकोर्ट ने दोहराया कि एक बार जब आरोपी द्वारा पैसे उधार लेने और चेक पर हस्ताक्षर करने की बात स्वीकार कर ली जाती है, तो एनआई एक्ट की धारा 118(ए) और 139 के तहत शिकायतकर्ता के पक्ष में वैधानिक उपधारणाएं (कानूनी धारणाएं) उत्पन्न हो जाती हैं, जिन्हें केवल जबानी दावों के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला अम्बल खान द्वारा खुशविंदर सिंह के खिलाफ दर्ज कराई गई शिकायत से उत्पन्न हुआ था। अम्बल खान का कहना था कि खुशविंदर सिंह ने 15 जुलाई 2016 को अपनी निजी जरूरतों के लिए 1,40,000 रुपये उधार लिए थे और दो महीने में पैसे लौटाने का वादा किया था। इस देनदारी को चुकाने के लिए आरोपी ने 1,40,000 रुपये का चेक जारी किया। हालांकि, जब बैंक में चेक प्रस्तुत किया गया, तो ‘खाता बंद’ होने की टिप्पणी के साथ चेक बाउंस हो गया। शिकायतकर्ता ने पंजीकृत डाक से कानूनी नोटिस भेजा, जो आरोपी को प्राप्त हुआ, लेकिन भुगतान न करने पर शिकायत दर्ज कराई गई।

अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, नालागढ़ के समक्ष सुनवाई के दौरान, आरोपी ने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 313 के तहत दर्ज अपने बयान में 15 जुलाई 2016 को 1,40,000 रुपये उधार लेने और एक खाली हस्ताक्षरित (ब्लैंक साइन्ड) चेक देने की बात स्वीकार की। हालांकि, उसने दावा किया कि यह चेक सुरक्षा के रूप में दिया गया था और उसने 2016 में ही पैसे चुका दिए थे, लेकिन शिकायतकर्ता ने इसका दुरुपयोग किया। अपने बचाव में आरोपी ने नरेश कुमार (डीडब्ल्यू-1) को गवाह के रूप में पेश किया।

ट्रायल कोर्ट ने माना कि चूंकि कर्ज लेने और चेक जारी करने की बात स्वीकार कर ली गई थी, इसलिए धारा 118(ए) और 139 की वैधानिक उपधारणाएं लागू होती हैं। पुनर्भुगतान का कोई सबूत न मिलने पर ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को धारा 138 के तहत दोषी ठहराया और 3 महीने के साधारण कारावास के साथ 1,70,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, नालागढ़ ने 1 अप्रैल 2024 को अपील खारिज करते हुए कहा कि आरोपी द्वारा पेश किया गया समझौता 3,00,000 रुपये के किसी अन्य लेनदेन से संबंधित था और भले ही चेक सुरक्षा के रूप में दिया गया हो, डिफ़ॉल्ट होने पर शिकायतकर्ता को उसे बैंक में पेश करने का अधिकार था।

पक्षों की दलीलें

हाईकोर्ट में रिवीजन याचिका दायर कर याचिकाकर्ता-आरोपी खुशविंदर सिंह के वकील के.एस. चंदेल ने तर्क दिया कि कानूनी नोटिस (जिसमें एक साल की अवधि का उल्लेख था) और शिकायत (जिसमें दो महीने का उल्लेख था) के बीच विसंगति थी। उन्होंने कहा कि जमीन और मकान गिरवी रखे गए थे और सुरक्षा चेक सौंपे गए थे, जिनका शिकायतकर्ता ने गलत इस्तेमाल किया और खुद विवरण भरा। इसके अलावा, उन्होंने तर्क दिया कि बैंक रिटर्न मेमो पर कोई मोहर या हस्ताक्षर नहीं थे, किसी बैंक अधिकारी की जांच नहीं की गई थी, और 20,000 रुपये से अधिक नकद देना आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 269एसएस का उल्लंघन था।

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इसके जवाब में शिकायतकर्ता अम्बल खान के वकील दिनेश भनोट ने तर्क दिया कि दोनों निचली अदालतों ने एनआई एक्ट की धारा 118(ए) और 139 के तहत वैधानिक उपधारणाओं को सही ढंग से लागू किया, क्योंकि कर्ज लेने और चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार किए गए थे। उन्होंने कहा कि आरोपी ने पुनर्भुगतान साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया, जिससे कानूनी उपधारणा खंडित नहीं होती।

कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी निष्कर्ष

धारा 397 सीआरपीसी के तहत रिवीजन अधिकार क्षेत्र के दायरे पर चर्चा करते हुए, जस्टिस राकेश कैंथला ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने रेखांकित किया कि रीविज़नरी शक्ति बहुत सीमित है और इसका उद्देश्य केवल स्पष्ट त्रुटियों, अधिकार क्षेत्र की कमियों या गैर-कानूनी निष्कर्षों को सुधारना है, न कि साक्ष्यों का पुनः मूल्यांकन करना।

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सीआरपीसी की धारा 313 के तहत दर्ज बयानों पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी द्वारा दिए गए जवाबों का उपयोग अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों को बल देने के लिए किया जा सकता है। वैधानिक उपधारणाओं के खंडन के संबंध में कोर्ट ने सुमेती विज बनाम पैरामाउंट टेक फैब इंडस्ट्रीज मामले का हवाला देते हुए टिप्पणी की:

“सीआरपीसी की धारा 313 के तहत दर्ज आरोपी का बयान बचाव का स्वतंत्र साक्ष्य नहीं है, बल्कि यह आरोपी को उसके खिलाफ पेश किए गए परिस्थितियों को स्पष्ट करने का अवसर मात्र है। इसलिए, यह मानने के लिए कोई साक्ष्य मौजूद नहीं है कि चेक प्रतिफल के बिना जारी किए गए थे।”

चेक के केवल सुरक्षा के रूप में दिए जाने के तर्क को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के सम्पल्ली सत्यनारायण राव बनाम इंडियन रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी लिमिटेड और श्रीपति सिंह बनाम झारखंड राज्य मामलों पर भरोसा जताया। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी मौजूदा वित्तीय लेनदेन के लिए सुरक्षा के रूप में चेक जारी किया गया है और नियत तिथि तक कर्ज नहीं चुकाया जाता है, तो ऐसा चेक बैंक में पेश करने योग्य हो जाता है। कोर्ट ने सम्पल्ली सत्यनारायण राव मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को उद्धृत किया:

“यदि चेक जारी करने की तिथि पर कोई देनदारी या कर्ज मौजूद है या राशि कानूनी रूप से वसूल योग्य हो चुकी है, तो यह धारा लागू होगी, अन्यथा नहीं।”

कोर्ट ने श्रीपति सिंह मामले से भी उद्धृत किया:

“वित्तीय लेनदेन के तहत सुरक्षा के रूप में जारी चेक को हर परिस्थिति में बेकार कागज का टुकड़ा नहीं माना जा सकता। ‘सुरक्षा’ का वास्तविक अर्थ सुरक्षित होने की स्थिति है, और ऋण के लिए दी गई सुरक्षा भुगतान के वादे के रूप में गिरवी रखी गई चीज होती है।”

शिकायतकर्ता द्वारा चेक का विवरण भरे जाने के तर्क का जवाब देते हुए हाईकोर्ट ने बीर सिंह बनाम मुकेश कुमार और ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स बनाम प्रबोध कुमार तिवारी का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि खाली हस्ताक्षरित चेक सौंपना पेयी को मौजूदा कर्ज की वसूली के लिए राशि भरने का अधिकार देता है। बीर सिंह मामले को उद्धृत करते हुए कोर्ट ने कहा:

“एनआई एक्ट के प्रावधानों, विशेष रूप से धारा 20, 87 और 139 के अर्थ से स्पष्ट है कि जो व्यक्ति चेक पर हस्ताक्षर करके पेयी को सौंपता है, वह तब तक उत्तरदायी रहता है जब तक कि वह यह साबित करने के लिए साक्ष्य न पेश करे कि चेक किसी कर्ज या देनदारी के निपटारे के लिए जारी नहीं किया गया था। यह अप्रासंगिक है कि चेक किसी अन्य व्यक्ति द्वारा भरा गया हो, यदि चेक पर दराज (ड्रॉअर) के हस्ताक्षर हैं।”

आयकर अधिनियम की धारा 269एसएस के उल्लंघन के तर्क पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नकद लेनदेन के इस प्रावधान का उल्लंघन करने पर धारा 271डी के तहत जुर्माना तो लग सकता है, लेकिन यह एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत लेनदेन को अमान्य या गैर-कानूनी नहीं बनाता।

‘खाता बंद’ होने के कारण चेक बाउंस के संबंध में कोर्ट ने एनईपीसी माइकॉन लिमिटेड बनाम मैग्मा लीजिंग लिमिटेड का हवाला दिया और कहा कि बंद खाते से जारी चेक भी धारा 138 के दायरे में आता है। कोर्ट ने उद्धृत किया:

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“‘खाते में पर्याप्त राशि न होने’ की अभिव्यक्ति का ही एक रूप ‘खाता बंद होना’ है।”

सजा और मुआवजे पर विचार करते हुए कोर्ट ने कहा कि धारा 138 का दंडात्मक प्रावधान लोगों को लापरवाही से बिना इरादे के चेक जारी करने से रोकने के लिए है। कलामणि टेक्स्ट बनाम पी. बालासुब्रमण्यम मामले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने माना कि 3 महीने की साधारण कैद और 1,70,000 रुपये का मुआवजा (जिसमें 4 साल के ब्याज नुकसान के 30,000 रुपये शामिल हैं) पूरी तरह से संतुलित और उचित है।

अंतिम निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि एनआई एक्ट की धारा 138 के सभी आवश्यक घटक पूरे होते हैं और निचली अदालतों के फैसलों में कोई अवैधता या त्रुटि नहीं है। इसके परिणामस्वरूप, आपराधिक रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया गया और आरोपी की सजा व मुआवजे के आदेश की पुष्टि की गई।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: खुशविंदर सिंह बनाम अम्बल खान
वाद संख्या: आपराधिक रिवीजन संख्या 554/2024
पीठ: जस्टिस राकेश कैंथला
निर्णय की तिथि: 27.07.2026

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