इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि मकान मालिक और किरायेदार के बीच हुआ ‘एग्रीमेंट टू सेल’ (बिक्री का इकरारनामा) अपने आप में पुरानी किरायेदारी को समाप्त नहीं करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक किरायेदारी का स्पष्ट या विवक्षित (इंप्लाइड) समर्पण न हो, तब तक किरायेदार का कब्जा ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 की धारा 53-ए के तहत ‘पार्ट परफॉर्मेंस’ में तब्दील नहीं होता। जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने किरायेदार की पुनरीक्षण याचिका (रिवीजन पिटीशन) खारिज करते हुए यह भी निर्णय दिया कि बेदखली के नोटिस में समय-बाधित (टाइम-बार्ड) बकाये की मांग शामिल होने मात्र से किरायेदारी समाप्त करने का नोटिस अमान्य नहीं हो जाता।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद कानपुर नगर स्थित एक व्यावसायिक दुकान से जुड़ा है। मकान मालिक ने किरायेदार के खिलाफ बेदखली और अन्य अनुतोष के लिए एस.सी.सी. वाद संख्या 109/2019 दायर किया था। वाद में आरोप लगाया गया कि किरायेदार ने 1 जनवरी 2003 से 31 अगस्त 2019 तक का किराया नहीं दिया है। दुकान का मासिक किराया 3,000 रुपये था, जिसके कारण यह परिसर यूपी एक्ट संख्या 13/1972 के दायरे से बाहर था। मकान मालिक ने 1 सितंबर 2019 को नोटिस जारी कर किरायेदारी समाप्त कर दी थी। वाद की सुनवाई के दौरान मूल वादी (मकान मालिक) की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनके कानूनी वारिसों को रिकॉर्ड पर लाया गया।
प्रतिवादी किरायेदारों ने 26 सितंबर 2022 को लिखित बयान (रिटन स्टेटमेंट) दाखिल कर वाद का विरोध किया। उनका मुख्य बचाव यह था कि 24 दिसंबर 2002 को 1,10,000 रुपये के कुल प्रतिफल पर एग्रीमेंट टू सेल निष्पादित होने के बाद मकान मालिक और किरायेदार का संबंध समाप्त हो चुका था। उन्होंने दावा किया कि पूरी रकम चुका दी गई थी और उसी दिन एक अलग ‘पजेशन लेटर’ (कब्जा पत्र) निष्पादित कर दुकान का कब्जा उन्हें ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 53-ए के तहत पार्ट परफॉर्मेंस में सौंप दिया गया था। इसलिए, किरायेदारी के आधार पर बेदखली का वाद चलने योग्य नहीं है।
लघु वाद न्यायालय/अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, कोर्ट संख्या 18, कानपुर नगर ने 14 मई 2026 को मकान मालिक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बेदखली की डिक्री पारित कर दी। इस फैसले के खिलाफ किरायेदारों ने प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 25 के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिवीजन याचिका दाखिल की।
पक्षों की दलीलें
पुनरीक्षणकर्ताओं (किरायेदारों) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अतुल दयाल और अधिवक्ता पदमाकर पांडे ने दलील दी कि निचली अदालत ने रजिस्टर्ड एग्रीमेंट टू सेल, उसी दिन के कब्जा पत्र और पूरी बिक्री राशि के भुगतान के संचयी प्रभाव को सही ढंग से नहीं समझा। उन्होंने तर्क दिया कि 24 दिसंबर 2002 के बाद उनका कब्जा किरायेदारी के अधीन न रहकर इकरारनामे के पार्ट परफॉर्मेंस के तहत हो गया था। अपने तर्क के समर्थन में उन्होंने हाईकोर्ट के हबीब खान बनाम 12वें एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज एवं अन्य फैसले का हवाला दिया।
किरायेदारों ने 1 सितंबर 2019 के नोटिस की वैधता को भी चुनौती दी और कहा कि इसमें 16 वर्षों से अधिक समय का किराया मांगा गया था, जिसका बड़ा हिस्सा मियाद कानून (लिमिटेशन) के तहत बाधित था, जिससे नोटिस और वाद का कारण दोनों दूषित हो गए। उन्होंने यह भी कहा कि लिखित बयान दाखिल करने से पहले उन्होंने विरोध दर्ज कराते हुए राशि जमा कर दी थी, जिससे डिफ़ॉल्ट का निष्कर्ष खारिज हो जाता है।
दूसरी तरफ, प्रतिवादियों (मकान मालिक के वारिसों) की ओर से अधिवक्ता कुणाल शाह ने निचली अदालत के आदेश का समर्थन किया। उन्होंने बताया कि रजिस्टर्ड एग्रीमेंट टू सेल में स्पष्ट रूप से दर्ज था कि कब्जा सौंपा नहीं गया है और इसे बैनामा (सेल डीड) निष्पादित होने के समय सौंपा जाएगा। उन्होंने तर्क दिया कि यह रजिस्टर्ड शर्त किरायेदारों के दावे का खंडन करती है और इसे एक गैर-पंजीकृत व विवादित कब्जा पत्र से नहीं बदला जा सकता, जिसके गवाहों का भी परीक्षण नहीं कराया गया।
उन्होंने चंद्रकांत शंकरराव मछाले बनाम पारुबाई भैरू मोहिते और एस. शक्तिवेल बनाम एम. वेणुगोपाल पिल्लई का हवाला देते हुए कहा कि रजिस्टर्ड दस्तावेज की शर्तों को किसी अपंजीकृत दस्तावेज से रद्द या संशोधित नहीं किया जा सकता। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—नाजिम शेख हसन बनाम नासिर मुश्ताक शेख एवं अन्य, एच.के. शर्मा बनाम राम लाल, और वय्येती श्रीनिवासराव बनाम गैनेदी जगज्योति, साथ ही हाईकोर्ट के काशी नाथ मेहरोत्रा बनाम रूप नारायण चौधरी फैसले का हवाला देते हुए दलील दी कि मात्र कब्जा जारी रहने से धारा 53-ए का लाभ नहीं मिल सकता। नोटिस पर उन्होंने खादी ग्राम उद्योग ट्रस्ट, एल.एम. जोशी, भगवानदास अगरवाला, और बी.आर. ट्रेडिंग कंपनी का हवाला देते हुए कहा कि टाइम-बार्ड किराये की मांग से नोटिस अवैध नहीं होता।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने मुख्य कानूनी प्रश्नों पर विचार किया: क्या एक किरायेदार, एग्रीमेंट टू सेल करने के बाद, किरायेदारी के स्वतंत्र निर्धारण के बिना अपने कब्जे का स्वरूप धारा 53-ए के तहत बदल सकता है? और क्या कालबाधित किराये की मांग से बेदखली का नोटिस अमान्य हो जाता है?
एग्रीमेंट टू सेल और मौजूदा किरायेदारी के संबंध पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“जहाँ कोई व्यक्ति पहले से ही किरायेदार के रूप में अचल संपत्ति पर काबिज है और बाद में मकान मालिक से संपत्ति खरीदने का इकरारनामा करता है, तो मात्र एग्रीमेंट टू सेल के निष्पादन से मौजूदा किरायेदारी समाप्त नहीं होती और न ही किरायेदार का कब्जा इकरारनामे के पार्ट परफॉर्मेंस में कब्जे के रूप में परिवर्तित होता है। इस तरह के बदलाव को मान्यता देने के लिए ठोस सामग्री होनी चाहिए जो यह दर्शाए कि इसके बाद कब्जा एग्रीमेंट टू सेल के संदर्भ में था और पहले से मौजूद किरायेदारी को कानून के अनुसार स्पष्ट या विवक्षित रूप से समर्पित या समाप्त कर दिया गया था। केवल प्रतिफल का भुगतान और भौतिक कब्जे का बने रहना पर्याप्त नहीं है।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि भौतिक कब्जा पहले से ही लगातार बना हुआ था, जबकि कानून कब्जे के विधिक (ज्यूरिडिकल) आधार में बदलाव का प्रमाण मांगता है:
“एक ही पक्षों के बीच दो लेन-देन का अस्तित्व—एक किरायेदारी का सृजन और दूसरा भविष्य में बिक्री की परिकल्पना—कानूनी रूप से असंगत नहीं है। दोनों तब तक एक साथ अस्तित्व में रह सकते हैं जब तक कि बाद का लेन-देन, अपनी शर्तों या पक्षों के स्पष्ट आचरण से, यह प्रदर्शित न कर दे कि पहले वाला समर्पित या अन्यथा समाप्त कर दिया गया है।”
अदालत ने एच.के. शर्मा और आर. कांतिमथी बनाम बीट्रिस जेवियर के अंतर का विश्लेषण किया। अदालत ने पाया कि आर. कांतिमथी मामले में समझौते में स्पष्ट रूप से कब्जे के समर्पण का उल्लेख था, जबकि वर्तमान मामले में रजिस्टर्ड एग्रीमेंट में स्पष्ट लिखा था कि कब्जा बैनामे के समय दिया जाएगा।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि जिस अपंजीकृत कब्जा पत्र पर किरायेदार भरोसा कर रहे थे, वह विवादित था और उसके गवाहों को परीक्षित नहीं कराया गया। साक्ष्य अधिनियम की धारा 92 और एस. शक्तिवेल फैसले के तहत रजिस्टर्ड दस्तावेज की शर्तों को ऐसे असत्यापित दस्तावेज से बदला नहीं जा सकता। इसके अतिरिक्त, अदालत ने गौर किया कि किरायेदारों ने खुद 2016 से किराया जमा करने के टेंडर रिकॉर्ड पर रखे थे—यह आचरण उनके इस दावे के पूरी तरह उलट था कि उनकी किरायेदारी 2002 में ही समाप्त हो चुकी थी।
1 सितंबर 2019 के बेदखली नोटिस पर विचार करते हुए अदालत ने बकाये की कानूनी वसूली और किरायेदारी समाप्त करने की मंशा के बीच अंतर स्पष्ट किया:
“यह सिद्धांत लंबे समय से मान्य है कि लिमिटेशन आमतौर पर केवल कानूनी उपचार को रोकता है, वह मूल अधिकार या ऋण को समाप्त नहीं करता।”
खादी ग्राम उद्योग ट्रस्ट, बॉम्बे डाइंग, और भगवानदास अगरवाला मामलों का संदर्भ देते हुए अदालत ने कहा:
“नोटिस का अर्थ इस प्रकार निकाला जाना चाहिए जिससे लेन-देन प्रभावी हो सके, जो कि ‘उत् रेस मैजिस वैलिएट क्वॉम पेरियट’ (दस्तावेज को निरर्थक करने के बजाय प्रभावी बनाना) के सिद्धांत के अनुरूप है। इसलिए अदालत को नोटिस की व्यावहारिक व सामान्य समझ के साथ जांच करनी चाहिए और यह देखना चाहिए कि क्या उसका सार किरायेदारी समाप्त करने के इरादे को पर्याप्त रूप से व्यक्त करता है।”
हाईकोर्ट ने माना कि कालबाधित राशि की मांग वसूली के वाद को प्रभावित कर सकती है, लेकिन इससे किरायेदारी समाप्त करने का कृत्य अमान्य नहीं होता:
“मांगी गई राशि का कुछ हिस्सा लिमिटेशन कानून के तहत कानूनी रूप से वसूलने योग्य न पाए जाने मात्र से नोटिस में निहित किरायेदारी समाप्त करने का अलग और स्पष्ट कृत्य समाप्त नहीं हो सकता।”
प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम की धारा 25 के तहत पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार के दायरे पर अदालत ने टिप्पणी की:
“प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 25 के तहत क्षेत्राधिकार पर्यवेक्षी प्रकृति का है और इसका उद्देश्य साक्ष्यों के पुनर्मूल्यांकन का दूसरा अवसर प्रदान करना नहीं है, मानो रिवीजन अदालत अपीलीय क्षेत्राधिकार का प्रयोग कर रही हो।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत के निष्कर्षों में कोई क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि, विकृति या भौतिक अनियमितता नहीं है। अदालत ने माना कि एग्रीमेंट टू सेल के बावजूद मकान मालिक और किरायेदार का संबंध बना रहा, किरायेदारी वैध रूप से समाप्त की गई थी और किराये के भुगतान में डिफ़ॉल्ट भी सही साबित हुआ था।
इन आधारों के साथ हाईकोर्ट ने किरायेदारों की पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया और लघु वाद न्यायालय/अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, कोर्ट संख्या 18, कानपुर नगर के 14 मई 2026 के बेदखली आदेश व डिक्री को बरकरार रखा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: राजेश कुमार चौरसिया और 2 अन्य बनाम सुरेश कपूर और 3 अन्य
वाद संख्या: एस.सी.सी. पुनरीक्षण संख्या – 85/2026
पीठ: जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव
निर्णय की तिथि: 7 सितंबर 2026

