झारखंड हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी पत्नी पर अपने पति के विवाहेतर संबंध को स्वीकार करने और दूसरी महिला को ‘छोटी बहन’ मानकर उसके साथ रहने का दबाव डालना अत्यंत गंभीर मानसिक क्रूरता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी को ऐसी परिस्थितियों में वैवाहिक जीवन जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की डिवीजन बेंच ने फैमिली कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए पत्नी को हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(i-a) के तहत तलाक की डिक्री प्रदान की।
हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन करने के बजाय उन्हें अलग-अलग हिस्सों में देखा और क्रूरता के आरोपों पर गलत निष्कर्ष निकाला।
पति के विवाहेतर संबंध और मारपीट के आरोपों से जुड़ा विवाद
मामले में पति और पत्नी दोनों चिकित्सा पेशे से जुड़े हैं। उनका विवाह 24 फरवरी 2018 को झारखंड के हजारीबाग जिले के चरही में हुआ था। विवाह के बाद दोनों धनबाद में साथ रहने लगे।
दंपति की कोई संतान नहीं है और दोनों 5 सितंबर 2019 से अलग रह रहे हैं।
पत्नी का आरोप था कि उसके पति का एक विधवा महिला के साथ विवाहेतर संबंध था। परिवार के हस्तक्षेप के बाद पति ने एक बॉन्ड लिखकर यह संबंध समाप्त करने का आश्वासन दिया था।
हालांकि, पत्नी के अनुसार पति ने इसके बावजूद संबंध जारी रखा और उसके साथ बार-बार मारपीट की।
पत्नी ने आरोप लगाया कि पति ने उसे पोछे के डंडे और झाड़ू से पीटा, जिसके कारण उसे स्लिप डिस्क और चोट से संबंधित ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी स्वास्थ्य समस्याएं हुईं।
पति ने इन आरोपों से इनकार किया। उसने दावा किया कि पत्नी द्वारा प्रस्तुत मेडिकल दस्तावेज विश्वसनीय नहीं हैं और उन्हें उसके पिता के स्वामित्व वाले नर्सिंग होम से प्राप्त किया गया था।
फैमिली कोर्ट ने खारिज कर दी थी तलाक की याचिका
पति ने 18 जनवरी 2022 को वैवाहिक सहवास की पुनर्स्थापना (Restitution of Conjugal Rights) के लिए मुकदमा दाखिल किया था।
पत्नी के अदालत में उपस्थित नहीं होने के कारण 17 जनवरी 2023 को इस मामले में पति के पक्ष में एकतरफा डिक्री पारित कर दी गई।
इस बीच पत्नी ने 5 अप्रैल 2022 को क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका दाखिल की थी।
हजारीबाग फैमिली कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने 17 नवंबर 2023 को यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि पत्नी क्रूरता के आरोप साबित नहीं कर सकी।
इसके बाद पत्नी ने फैमिली कोर्ट के फैसले को झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी।
पत्नी ने कहा, फैमिली कोर्ट ने महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी की
पत्नी की ओर से अधिवक्ता अभिषेक ठाकुर और प्रत्युष नवनीत ने दलील दी कि फैमिली कोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया।
उन्होंने कहा कि पत्नी, उसके पिता और चाचा की गवाही को बिना किसी ठोस कारण के नजरअंदाज कर दिया गया।
इसके अलावा चरही थाना केस नंबर 64/2019 में दर्ज FIR पर भी उचित विचार नहीं किया गया।
अधिवक्ताओं ने यह भी बताया कि फैमिली कोर्ट ने स्वयं स्वीकार किया था कि पति-पत्नी 5 सितंबर 2019 से अलग रह रहे हैं।
दूसरी ओर, पति की तरफ से अधिवक्ता सौमित्र बरुआई ने फैमिली कोर्ट के फैसले का समर्थन किया।
उन्होंने कहा कि पत्नी के मेडिकल दस्तावेज उसके पिता के नर्सिंग होम से प्राप्त किए गए थे। साथ ही पत्नी ने वैवाहिक सहवास की पुनर्स्थापना वाले मुकदमे का विरोध नहीं किया और इसके बजाय तलाक की याचिका दाखिल कर दी।
प्रेमिका को ‘छोटी बहन’ मानने का दबाव मानसिक क्रूरता का गंभीर रूप
झारखंड हाईकोर्ट ने पत्नी की गवाही और अन्य साक्ष्यों की जांच करते हुए पाया कि वैवाहिक जीवन में लगातार क्रूरता के आरोप सामने आए थे।
पीठ ने कहा कि पत्नी ने बार-बार शारीरिक हिंसा किए जाने और पति द्वारा आश्वासन देने के बावजूद विवाहेतर संबंध जारी रखने की बात कही थी।
कोर्ट ने विशेष रूप से पति के उस व्यवहार पर ध्यान दिया, जिसमें वह पत्नी से अपने विवाहेतर संबंध को स्वीकार करने और दूसरी महिला को छोटी बहन मानकर साथ रहने के लिए कहता था।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा व्यवहार:
“अत्यंत गंभीर प्रकार की मानसिक क्रूरता के समान होगा।”
पीठ ने माना कि किसी पत्नी से अपने पति के विवाहेतर संबंध को स्वीकार करने की अपेक्षा करना और उसे दूसरी महिला के साथ रहने के लिए मजबूर करना उसके मानसिक और भावनात्मक कल्याण पर गंभीर प्रभाव डालता है।
पिता के नर्सिंग होम से मेडिकल रिकॉर्ड मिलने भर से वह अविश्वसनीय नहीं हो जाता
हाईकोर्ट ने पाया कि पत्नी के आरोपों का समर्थन उसके पिता, चाचा और भाई की गवाही से भी होता है।
इसके अलावा दर्ज FIR से भी उसके आरोपों को समर्थन मिलता था।
पीठ ने फैमिली कोर्ट द्वारा मेडिकल दस्तावेजों को खारिज करने के आधार को स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने कहा:
“स्थापित कानूनी सिद्धांत यह है कि मेडिकल दस्तावेज किस स्रोत से प्राप्त हुए हैं, केवल इस आधार पर उन्हें स्वतः अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता, जब तक उनमें विशिष्ट कमियां प्रदर्शित न की जाएं।”
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस कारण से मेडिकल रिकॉर्ड को खारिज करना उचित नहीं था कि वह पत्नी के पिता के नर्सिंग होम से प्राप्त हुआ था।
फैमिली कोर्ट ने साक्ष्यों का टुकड़ों में मूल्यांकन किया: हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के साक्ष्यों के मूल्यांकन के तरीके पर भी सवाल उठाए।
पीठ ने कहा:
“फैमिली कोर्ट ने साक्ष्यों का टुकड़ों में मूल्यांकन किया है और संभावनाओं की प्रबलता के सिद्धांत की अनदेखी की है।”
हाईकोर्ट ने माना कि इस त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण के कारण फैमिली कोर्ट का निष्कर्ष विकृत (Perverse) था।
कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवादों में उपलब्ध साक्ष्यों को समग्र रूप से देखते हुए संभावनाओं की प्रबलता के सिद्धांत के आधार पर निर्णय किया जाना चाहिए।
लंबे समय तक अलग रहना भी मानसिक क्रूरता का आधार
हाईकोर्ट ने इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना कि पति-पत्नी सितंबर 2019 से अलग रह रहे थे।
पीठ ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने इस स्वीकार किए गए तथ्य पर उचित विचार नहीं किया।
कोर्ट ने Samar Ghosh v. Jaya Ghosh (2007) 4 SCC 511 के फैसले का उल्लेख किया, जिसमें लंबे समय तक वैवाहिक अलगाव को मानसिक क्रूरता माना गया था।
हाईकोर्ट ने पाया कि दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से अलगाव था और पत्नी स्पष्ट रूप से पति के साथ वैवाहिक जीवन दोबारा शुरू नहीं करना चाहती थी।
इन परिस्थितियों में कोर्ट ने माना कि वैवाहिक संबंध इस हद तक टूट चुका है कि उसे फिर से बहाल करना संभव नहीं है।
पीठ ने कहा:
“साथ रहने की इच्छा व्यक्त करने वाला प्रतिवादी पति का दावा, अपीलकर्ता पत्नी के क्रूरता से मुक्त जीवन जीने के अधिकार पर हावी नहीं हो सकता।”
हाईकोर्ट ने तलाक मंजूर किया, गुजारा भत्ता मांगने की भी छूट
झारखंड हाईकोर्ट ने पत्नी की अपील स्वीकार करते हुए हजारीबाग फैमिली कोर्ट का 17 नवंबर 2023 का फैसला रद्द कर दिया।
पीठ ने 24 फरवरी 2018 को संपन्न विवाह को तलाक की डिक्री के माध्यम से समाप्त कर दिया।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने पत्नी को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत स्थायी गुजारा भत्ता (Alimony) के लिए फैमिली कोर्ट में आवेदन करने की स्वतंत्रता भी दी।
केस नंबर: F.A. No. 82 of 2024
