बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र के रायगढ़ स्थित मुरुड समुद्र तट पर फरवरी 2016 में 14 छात्रों की डूबने से हुई मौत के मामले में पुणे के एक कॉलेज के ट्रस्टियों, प्रभारी प्रिंसिपल, शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों के खिलाफ दर्ज FIR रद्द कर दी है। कोर्ट ने कहा कि जब छात्र बालिग हों और हादसा किसी सार्वजनिक समुद्र तट पर हुआ हो, तो उसके लिए कॉलेज प्रबंधन और कर्मचारियों को आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। सार्वजनिक समुद्र तटों पर सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है।
जस्टिस मिलिंद एन. जाधव ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत दाखिल चार आपराधिक अर्जियां स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने समुद्र तटों पर सुरक्षा उपायों के संबंध में कार्रवाई के लिए फैसले की एक प्रति राज्य के मुख्य सचिव को भेजने का भी निर्देश दिया।
क्या था मामला?
1 फरवरी 2016 को पुणे के आबेदा इनामदार सीनियर कॉलेज ऑफ आर्ट्स, साइंस एंड कॉमर्स के 116 छात्र पिकनिक मनाने मुरुड समुद्र तट गए थे। यह कॉलेज महाराष्ट्र कॉस्मोपॉलिटन एजुकेशन सोसाइटी संचालित करती है।
बीएससी (कंप्यूटर साइंस) के प्रथम, द्वितीय और तृतीय वर्ष के छात्र तीन अलग-अलग बसों में गए थे। प्रत्येक बस में दो शिक्षकों के साथ कुछ अन्य कर्मचारी भी मौजूद थे।
फैसले के अनुसार, दोपहर करीब 3:45 बजे भोजन करने के बाद तृतीय वर्ष के सभी 41 छात्र अपने दो शिक्षकों से अनुमति लेकर दोबारा समुद्र तट पर गए। शिक्षक उनके साथ नहीं गए और आराम करने के लिए वहीं रुक गए।
इस दौरान समुद्र की तेज अंदरूनी धाराओं में करीब 20 छात्र बह गए। एक छात्र ने स्थानीय लोगों की मदद से लगभग छह छात्रों को बचाया, लेकिन बचाव कार्य में शामिल उस छात्र समेत कुल 14 छात्रों की मौत हो गई।
मामले में ADR संख्या 04/2016 के तहत जांच के बाद 19 अप्रैल 2016 को, घटना के लगभग 80 दिन बाद, मुरुड पुलिस स्टेशन में FIR संख्या 24/2016 दर्ज की गई।
भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304A के साथ धारा 34 के तहत दर्ज इस FIR में कॉलेज के ट्रस्टियों, प्रभारी प्रिंसिपल, असिस्टेंट प्रोफेसरों, चपरासियों और लैब असिस्टेंट समेत 17 लोगों को आरोपी बनाया गया था। शिकायतकर्ता मृतक छात्रों में से एक के पिता हैं।
कॉलेज प्रबंधन और शिक्षकों की दलीलें
ट्रस्टियों और प्रभारी प्रिंसिपल की ओर से एडवोकेट निरंजन मुंदरगी और एडवोकेट केरल मेहता ने दलील दी कि ट्रस्टियों पर दूसरों के कार्यों के लिए परोक्ष जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती। उनके अनुसार, मामले में IPC की धारा 304A के आवश्यक तत्व भी मौजूद नहीं थे।
उन्होंने बताया कि कॉलेज ने पिकनिक के लिए छात्रों के अभिभावकों से अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) प्राप्त किए थे। अपनी दलीलों के समर्थन में उन्होंने स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल के फैसले का हवाला दिया।
शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों की ओर से एडवोकेट सिद्धेश्वर बिरादर, एडवोकेट दिनेश आर. शिंदे और एडवोकेट ओमहरी बी. फावड़े ने कहा कि प्रथम और द्वितीय वर्ष के छात्रों के साथ गए शिक्षक अपने-अपने समूहों को सुरक्षित वापस लेकर आए थे। उन्हें तृतीय वर्ष के छात्रों के साथ हुई दुर्घटना के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। सभी आवेदकों ने पर्याप्त सावधानी बरती थी।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से अपर लोक अभियोजक राजश्री वी. न्यूटन ने दलील दी कि छात्रों की मौत आवेदकों की लापरवाही का सीधा परिणाम थी। उनका कहना था कि शिक्षकों और कर्मचारियों ने छात्रों को समुद्र में जाने से नहीं रोका और ऐसे समुद्र तट पर पर्याप्त सतर्कता नहीं बरती, जहां सुरक्षा संबंधी चेतावनी संकेत मौजूद नहीं थे।
शिकायतकर्ता की ओर से एडवोकेट अभिषेक पुंगलिया ने कहा कि कॉलेज ने एकतरफा तरीके से पिकनिक की तारीख बदल दी थी। 116 छात्रों के साथ कोई डॉक्टर या तैराक नहीं भेजा गया था और कर्मचारी समुद्र तट से 500 मीटर दूर एक होटल में आराम कर रहे थे।
उन्होंने सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट का भी हवाला दिया, जिसमें UGC के सुरक्षा दिशानिर्देशों के उल्लंघन की बात कही गई थी। शिकायतकर्ता ने मामले में पूरा ट्रायल चलाने की मांग की।
बालिग छात्र अपने आचरण के परिणाम समझने में सक्षम: हाईकोर्ट
कोर्ट ने पाया कि आपराधिक अर्जी संख्या 493/2016 में शामिल ट्रस्टी पिकनिक के दौरान मौजूद ही नहीं थे। ऐसा कोई साक्ष्य नहीं था जिससे यह साबित हो कि उनकी किसी लापरवाही का छात्रों की मौत से सीधा या निकट संबंध था।
इसी तरह, प्रथम और द्वितीय वर्ष के छात्रों के साथ गए शिक्षकों को केवल इसलिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता कि वे उसी कॉलेज या विभाग से जुड़े थे।
तृतीय वर्ष के छात्रों के साथ गए शिक्षकों की जिम्मेदारी पर विचार करते हुए कोर्ट ने कहा कि बीएससी के तीसरे वर्ष में पढ़ने वाले छात्रों से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे अपने आचरण के परिणामों को समझते हों।
कोर्ट ने कहा, “14 छात्रों की मौत का प्रत्यक्ष कारण समुद्र के पानी में डूबना था, न कि आवेदकों की ओर से किया गया कोई प्रत्यक्ष लापरवाहीपूर्ण कार्य या उनकी लापरवाही।”
कोर्ट ने पिकनिक की तारीख बदलने से संबंधित शिकायतकर्ता की दलील भी अस्वीकार्य पाई।
जस्टिस जाधव ने कहा कि उन्हें ऐसा कोई पूर्व फैसला नहीं मिला जिसमें पीड़ितों के बालिग होने की स्थिति में परोक्ष जिम्मेदारी का प्रश्न उठाया गया हो।
कोर्ट ने टिप्पणी की, “जब छात्र बालिग हों और उनकी उम्र 18 वर्ष से अधिक हो, और वह भी किसी सार्वजनिक स्थान तथा सार्वजनिक समुद्र तट पर हों, तो मेरी राय में आपराधिक मंशा (mens rea) के अभाव में यह केवल एक दुर्घटना का मामला होगा।”
सार्वजनिक समुद्र तटों पर सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य सरकार की
कोर्ट ने एम.एस. ग्रेवाल बनाम दीप चंद सूद, जैकब मैथ्यू बनाम स्टेट ऑफ पंजाब और मेल्विन कुमार बनाम के.एस. हरिशा के फैसलों पर भरोसा किया।
मेल्विन कुमार मामले में संपत्ति या परिसर के नियंत्रण और उससे जुड़ी जिम्मेदारी के सिद्धांत को लागू करते हुए कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक समुद्र तट पर सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।
कोर्ट ने कहा, “सार्वजनिक समुद्र तट पर पर्याप्त जीवनरक्षक सुविधाएं, चेतावनियां, संकेतक, लाइफगार्ड आदि उपलब्ध नहीं कराने के कारण संबंधित दुर्घटना के लिए राज्य सरकार जिम्मेदार होगी।”
जस्टिस जाधव ने निष्कर्ष निकाला कि आवेदकों को “उनके प्रत्यक्ष नियंत्रण या कार्यक्षेत्र से बाहर हुई किसी अप्रत्याशित घटना के लिए आपराधिक रूप से लापरवाह नहीं ठहराया जा सकता।”
कोर्ट ने यह भी पाया कि आवेदकों की ओर से गंभीर या उच्च स्तर की लापरवाही साबित करने वाली कोई सामग्री रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं थी।
समुद्र तटों पर सुरक्षा बढ़ाने के लिए निर्देश
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पर्यटन मंत्रालय के माध्यम से भीड़भाड़ वाले समुद्र तटों का खाका तैयार करने और अंग्रेजी तथा मराठी में चेतावनी संकेतक लगाने के लिए एक समान नीति बनाने को कहा।
इन संकेतकों पर समुद्र से जुड़े खतरों और हाई टाइड के समय की जानकारी प्रदर्शित की जानी चाहिए।
कोर्ट ने राज्य सरकार को लाइफगार्ड और उनके नियमित प्रशिक्षण, वॉच टावर, सुरक्षा ग्रिल, तैराकी के लिए सुरक्षित क्षेत्रों का सीमांकन, हाई टाइड के दौरान लाल झंडे, गश्ती वाहनों और विशेषज्ञ एजेंसियों की सहायता के लिए धन आवंटित करने का निर्देश भी दिया।
कोर्ट ने रायगढ़ के एक समुद्र तट पर हाल में हुई एक अन्य घटना का उल्लेख किया, जिसमें एक कोचिंग संस्थान के आठ छात्र समुद्र की लहरों में बह गए थे।
इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की, “हम हर दुर्घटना के बाद केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं दे सकते।”
FIR रद्द करने का आदेश
इन निष्कर्षों के आधार पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने सभी चार आपराधिक अर्जियां स्वीकार कर लीं और मुरुड पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR संख्या 24/2016 को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने समुद्र तटों पर सुरक्षा संबंधी निर्देशों पर आवश्यक कार्रवाई के लिए फैसले की प्रति राज्य के मुख्य सचिव को भेजने का भी आदेश दिया।
केस टाइटल: पी.ए. इनामदार एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य (संबंधित अर्जियों सहित)
केस नंबर: आपराधिक अर्जी संख्या 493/2016 सहित आपराधिक अर्जी संख्या 568, 569 और 975/2016
बेंच: जस्टिस मिलिंद एन. जाधव
फैसले की तारीख: 22 अक्टूबर 2026
