दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: ‘ओपन जेल’ के लिए रणनीति तैयार करे प्रशासन, पात्र कैदियों की पहचान के निर्देश

जेल सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को शहर के अधिकारियों को ‘ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशंस’ (OCI) यानी खुली जेलों पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को लागू करने के लिए एक ठोस रणनीति तैयार करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने उन कैदियों की पहचान करने को कहा है जिन्हें पारंपरिक बंद कालकोठरियों से इन सुधारात्मक वातावरणों में स्थानांतरित किया जा सकता है। अदालत ने जोर देकर कहा कि कैदियों का सामाजिक पुनर्वास कोई ‘आकांक्षा’ नहीं बल्कि एक ‘संवैधानिक आवश्यकता’ है।

चीफ जस्टिस डी के उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की पीठ ने इस मुद्दे पर एक जनहित याचिका (PIL) दर्ज करते हुए दिल्ली सरकार से जवाब मांगा है। हाईकोर्ट ने सरकार को दो महीने का समय देते हुए एक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें 26 फरवरी को पारित सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन के लिए उठाए गए कदमों का विवरण देना होगा।

अदालत ने गृह सचिव को एक निगरानी समिति (Monitoring Committee) गठित करने का निर्देश दिया। इस समिति की अध्यक्षता दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (DSLSA) के कार्यकारी अध्यक्ष या उनके नामित व्यक्ति करेंगे। यह समिति दिल्ली में खुली जेलों के प्रबंधन, विस्तार और कार्यप्रणाली की निगरानी के लिए जिम्मेदार होगी।

सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी करते हुए पीठ ने मामले की गंभीरता पर जोर दिया:

“कृपया गृह सचिव को सूचित करें कि उन्हें समिति का गठन करना चाहिए। वह समिति बैठक करे और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करने के लिए विशिष्ट रणनीतियां तैयार करे। साथ ही वर्तमान स्थिति का आकलन किया जाए। आपको उन कैदियों की पहचान करनी होगी जिन्हें खुली जेल में स्थानांतरित किया जा सकता है। ये सभी कार्य पूरे होने चाहिए। हम आपको दो महीने का समय दे रहे हैं।”

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अदालत ने इस मामले में सहायता के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद निगम को ‘एमिकस क्यूरी’ (न्याय मित्र) नियुक्त किया है और DSLSA से स्टेटस रिपोर्ट भी मांगी है।

ओपन और सेमी-ओपन जेल दंडात्मक न्याय के बजाय सुधारात्मक न्याय की अवधारणा पर आधारित हैं। पारंपरिक ‘बंद’ जेलों के विपरीत, ये संस्थान दोषियों को दिन के दौरान आजीविका कमाने के लिए परिसर से बाहर जाने और शाम को वापस लौटने की अनुमति देते हैं। इस अवधारणा के पीछे मुख्य उद्देश्य हैं:

  • मानसिक दबाव कम करना: लंबे समय तक बंद रहने से कैदियों को रिहाई के बाद सामान्य जीवन जीने में कठिनाई होती है।
  • पुनर्वास को बढ़ावा: काम के अवसर मिलने से कैदियों का समाज के साथ संपर्क बना रहता है।
  • मानवीय गरिमा का सम्मान: सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी टिप्पणी की थी कि आत्म-सम्मान और सामाजिक एकीकरण जेल प्रणाली के भीतर संवैधानिक आवश्यकताएं हैं।
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हाईकोर्ट की यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के 26 फरवरी के उस ऐतिहासिक फैसले के बाद आई है, जिसमें सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जेलों में बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए समयबद्ध कदम उठाने का निर्देश दिया गया था। इसमें मौजूदा रिक्तियों को भरना और बंद जेलों के भीतर ही खुली बैरकें बनाना शामिल है।

निगरानी समिति अब उन व्यवस्थागत बाधाओं की पहचान करेगी जिन्होंने इन सुविधाओं के विस्तार को रोका है। हाईकोर्ट ने इस मामले में केंद्र, दिल्ली सरकार, जेल अधिकारियों और DSLSA को पक्षकार बनाया है ताकि एक समन्वित प्रयास सुनिश्चित किया जा सके। मामले की अगली सुनवाई जुलाई में होगी।

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