उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2014 में एक विवाद के बाद सेवामुक्त किए गए छह परिवीक्षाधीन (प्रोबेशनर) न्यायिक अधिकारियों की तत्काल बहाली के आदेश में संशोधन कर दिया है। शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की फुल कोर्ट (प्रशासनिक पीठ) को निर्देश दिया है कि वह अधिकारियों के संपूर्ण सेवा रिकॉर्ड का समग्र मूल्यांकन कर यह तय करे कि उन्होंने अपना प्रोबेशन सफलतापूर्वक पूरा किया था या नहीं।
पुनर्बहाली का निर्णय नई प्रशासनिक समीक्षा पर निर्भर
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि इन अधिकारियों की सेवा में बहाली का कोई भी दावा उच्च न्यायालय के इस नए प्रशासनिक फैसले पर ही निर्भर करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय से इस मामले को प्राथमिकता के आधार पर, अधिमानतः छह सप्ताह के भीतर, सुलझाने का अनुरोध किया है।
पीठ ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि किसी भी प्रोबेशनर की उपयुक्तता का आकलन केवल 2014 के घटनाक्रम पर तैयार रजिस्ट्रार की एकल रिपोर्ट तक सीमित नहीं होना चाहिए। उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा नियमावली के नियम 24 और 25 की भावना के अनुसार, निर्णय लेते समय उस अवधि के दौरान उपलब्ध पूरे सेवा रिकॉर्ड और सभी प्रासंगिक सामग्रियों पर विचार करना आवश्यक है।
मामले की पृष्ठभूमि और पूर्व निर्णय
यह विवाद 2014 में प्रशिक्षु न्यायाधीशों के एक रात्रिभोज के दौरान हुई बहस से शुरू हुआ था, जिसके बाद छह प्रोबेशनर अधिकारियों को सेवा से हटा दिया गया था।
इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक फुल बेंच ने इन बर्खास्तगी आदेशों को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि यह कार्रवाई दंडात्मक और कलंकित करने वाली थी। फुल बेंच का मानना था कि अधिकारियों के कुल प्रदर्शन का आंकलन करने के बजाय केवल डिनर पार्टी की घटना को आधार बनाया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत था। इसके आधार पर फुल बेंच ने उनकी तुरंत बहाली के निर्देश दिए थे।
प्रशासनिक अधिकारों पर हाईकोर्ट का तर्क
इलाहाबाद हाईकोर्टने अपनी ही फुल बेंच के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट की ओर से तर्क दिया गया कि फुल बेंच ने प्रोबेशन के दौरान सेवा समाप्ति (नियम 24) और सेवा पुष्टि (नियम 25) के प्रावधानों का गलत अर्थ निकाला, जिससे अयोग्य प्रशिक्षुओं को हटाने का प्रशासनिक अधिकार सीमित हो गया।
हाईकोर्ट का यह भी कहना था कि शुरुआती बर्खास्तगी आदेश सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा थे और इनसे अधिकारियों के करियर पर कोई स्थायी दाग नहीं लगता था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि प्रशासनिक अधिकारों का प्रयोग करते समय केवल एक रिपोर्ट के बजाय संपूर्ण रिकॉर्ड को आधार बनाया जाना चाहिए।

