आदेश की आधिकारिक तामील अनिवार्य नहीं, जानकारी होना ही अवमानना कार्रवाई के लिए काफी: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की एक डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस शुभेंदु सामंत शामिल हैं, ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी पक्ष को अन्य स्रोतों से अदालत के निषेधात्मक आदेश की जानकारी या सूचना थी, तो अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए उस आदेश की आधिकारिक तामील (ऑफिशियल सर्विस) होना अनिवार्य शर्त नहीं है। स्टेटस को (यथास्थिति) के आदेश के बावजूद अतिक्रमण हटाने के नाम पर निर्माण ध्वस्त करने वाले एक ग्राम पंचायत सचिव की अवमानना अपील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने उसकी दो महीने की नागरिक कैद की सजा को बरकरार रखा और उसे एक सप्ताह के भीतर रजिस्ट्रार (न्यायिक) के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला नेल्लोर सुधाकर और अन्य द्वारा दायर रिट याचिका संख्या 7251/2018 से शुरू हुआ था। याचिकाकर्ताओं ने एसपीएसआर नेल्लोर जिले के मुथुकुरु मंडल स्थित ब्रह्मदेवम ग्राम पंचायत के सचिव द्वारा जारी 26 फरवरी 2018 के एक नोटिस को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें सार्वजनिक सड़क से कथित अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया गया था।

8 मार्च 2018 को हाईकोर्ट ने उस नोटिस को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि इसे कारण बताओ नोटिस माना जाए। अदालत ने ग्राम पंचायत के स्थायी वकील के इस आश्वासन को दर्ज किया कि वह याचिकाकर्ताओं को तीन दिनों के भीतर सर्वेक्षण रिपोर्ट प्रदान करेंगे। याचिकाकर्ताओं को सर्वेक्षण रिपोर्ट मिलने के दो सप्ताह के भीतर अपना स्पष्टीकरण दाखिल करने का समय दिया गया था और ग्राम पंचायत को निर्देश दिया गया था कि जब तक इस पर निर्णय लेकर सूचित न किया जाए, तब तक यथास्थिति बनाए रखी जाए।

इस स्पष्ट आदेश के बावजूद, 19 मार्च 2018 को ग्राम पंचायत सचिव ने पुलिस सुरक्षा के साथ याचिकाकर्ताओं की चारदीवारी को ध्वस्त कर दिया। इसके बाद अवमानना याचिका (अवमानना मामला संख्या 827/2018) दायर की गई। 16 अक्टूबर 2025 के आदेश द्वारा एकल पीठ ने पंचायत सचिव को अवमानना का दोषी पाया और उन्हें दो महीने की नागरिक कैद की सजा सुनाई, साथ ही संपत्ति का पुनर्निर्माण कर नुकसान की भरपाई करने और प्रत्येक याचिकाकर्ता को 10,000 रुपये का जुर्माना देने का आदेश दिया। सचिव ने इस फैसले को चुनौती देते हुए अवमानना अपील संख्या 4/2025 दायर की थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (पंचायत सचिव) की ओर से पेश हुए अतिरिक्त अधिवक्ता जनरल श्री ई. सांबशिव प्रताप ने तर्क दिया कि अदालत के आदेश का कोई जानबूझकर उल्लंघन नहीं किया गया था। उन्होंने कहा कि 8 मार्च 2018 का आदेश आधिकारिक रूप से कूरियर द्वारा 1 अप्रैल 2018 को प्राप्त हुआ था, जबकि तोड़फोड़ की कार्रवाई 19 मार्च 2018 को ही हो चुकी थी। उनका दावा था कि जैसे ही याचिकाकर्ताओं ने मौखिक रूप से यथास्थिति के आदेश के बारे में सूचित किया, तोड़फोड़ रोक दी गई थी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं ने 8 मार्च 2018 को एक प्रतिनिधित्व सौंपकर 15 मार्च 2018 तक स्वेच्छा से अतिक्रमण हटाने का वादा किया था। इसके अलावा, अपीलकर्ता ने एकल पीठ के निर्देशों का अनुपालन करते हुए चारदीवारी का पुनर्निर्माण करा दिया था और प्रत्येक याचिकाकर्ता को 10,000 रुपये का भुगतान भी कर दिया था।

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उत्तरदाताओं (रिट याचिकाकर्ताओं) के वकील श्री माधवराव नल्लूरी ने तर्क दिया कि 8 मार्च 2018 को जब यथास्थिति का आदेश पारित किया गया था, तब ग्राम पंचायत का प्रतिनिधित्व उसके स्थायी वकील द्वारा किया जा रहा था, जिसका सीधा अर्थ है कि अधिकारी को अदालत के निर्देशों की पूरी जानकारी थी। उन्होंने ध्यान दिलाया कि ग्राम पंचायत ने 12 मार्च 2018 को सर्वेक्षण स्केच प्रस्तुत किया था, जिससे याचिकाकर्ताओं को अपना स्पष्टीकरण देने के लिए 26 मार्च 2018 तक का समय मिला था। दो सप्ताह के समय की समाप्ति से पहले ही 19 मार्च 2018 को तोड़फोड़ करना अदालत के आदेश का जानबूझकर किया गया उल्लंघन था।

अदालत का विश्लेषण

डिवीजन बेंच ने इस प्रश्न का परीक्षण किया कि क्या अवमानना सिद्ध करने के लिए अदालत के आदेश की औपचारिक तामील आवश्यक है या केवल जानकारी या पूर्व सूचना होना ही पर्याप्त है।

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नोटिस के मुद्दे पर बेंच ने नोट किया कि 8 मार्च 2018 को सुनवाई के दौरान ग्राम पंचायत के स्थायी वकील उपस्थित थे। बेंच ने माना कि 12 मार्च 2018 को याचिकाकर्ताओं को सर्वेक्षण स्केच सौंपना अदालत में दिए गए आश्वासन के तहत ही किया गया था, जिससे यह निर्विवाद रूप से साबित होता है कि पंचायत सचिव को 19 मार्च 2018 को हुई तोड़फोड़ से पहले ही आदेश की जानकारी थी।

द अलीगढ़ म्यूनिसिपल बोर्ड बनाम एक्का टांगा मजदूर यूनियन मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“किसी निषेधात्मक आदेश के उल्लंघन के लिए अदालत की अवमानना की कार्यवाही करने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि आदेश की आधिकारिक तामील उस पक्ष पर की गई हो जिसके खिलाफ यह आदेश दिया गया है, यदि यह साबित हो जाता है कि उसे किसी अन्य स्रोत से आदेश की सूचना थी और वह जानता था कि इसे लागू किया जाना है। आधिकारिक संचार कोई पूर्व शर्त नहीं है, बशर्ते उसे दिए गए आदेश की प्रामाणिकता पर संदेह करने का कोई वैध कारण न हो।”

अदालत ने होशियार सिंह बनाम गुरबचन सिंह मामले में निर्धारित सिद्धांतों पर भी चर्चा की और माना कि निषेधात्मक आदेशों (जैसे यथास्थिति बनाए रखने का आदेश) के मामले में यदि आदेश की सूचना किसी अन्य माध्यम से साबित हो जाती है, तो अवमानना की कार्रवाई के लिए औपचारिक तामील अनिवार्य नहीं है।

बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों सलाउद्दीन अहमद बनाम समता आंदोलन और अशोक पेपर कामगार यूनियन बनाम धरम गोधा का भी मूल्यांकन किया। सलाउद्दीन अहमद मामले में तय दो-स्तरीय परीक्षण—आदेश की जानकारी होना और उसका जानबूझकर उल्लंघन करना—को लागू करते हुए बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में दोनों शर्तें पूरी होती हैं।

अपीलकर्ता के इस बचाव पर कि उसने बाद में संपत्ति का पुनर्निर्माण कराया और लागत का भुगतान किया, अदालत ने स्पष्ट किया कि पुनर्निर्माण के उपाय पूरे कर लेने से अवमानना का अपराध समाप्त नहीं होता और न ही यह कारावास की सजा का विकल्प बन सकता है। अमित कुमार दास बनाम श्रीमती हठीसिंह टैगोर चैरिटेबल ट्रस्ट और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम डॉ. विजय माल्या का उल्लेख करते हुए अदालत ने जोर दिया:

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“अपने आदेशों की अवज्ञा के लिए अवमाननाकर्ता को दंडित करने के अलावा, अदालत यह भी सुनिश्चित कर सकती है कि ऐसा अवमाननाकर्ता केवल उसे मिली सजा को भुगतकर अपनी अवज्ञा का लाभ उठाना जारी न रखे।”

डिवीजन बेंच ने यह भी नोट किया कि अपीलकर्ता ने कार्यवाही के दौरान बार-बार अपना रुख बदलने का प्रयास किया। बेंच ने एकल पीठ की इस टिप्पणी का समर्थन किया:

“एकमात्र प्रतिवादी/अवमाननाकर्ता ने क्षमाप्रार्थी होने और पछतावा दिखाने के बजाय, गलत तारीखें दिखाकर इस अदालत को गुमराह करने के उद्देश्य से इस अवमानना कार्यवाही में कई असंगत और निराधार तर्क देने का व्यर्थ प्रयास किया है।”

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने अवमानना अपील को खारिज करते हुए 16 अक्टूबर 2025 के एकल पीठ के फैसले को बरकरार रखा। बेंच ने अपीलकर्ता को सजा के क्रियान्वयन के लिए इस निर्णय की तारीख से एक सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार (न्यायिक) के समक्ष आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: वी. सीनाया बनाम नेल्लोर सुधाकर और अन्य
वाद संख्या: अवमानना अपील संख्या 4/2025
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस शुभेंदु सामंत
निर्णय की तिथि: 16.07.2026

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