आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस में अवैध तस्करी की रोकथाम अधिनियम, 1988 (पीआईटी एनडीपीएस एक्ट) के तहत जारी किया गया निरोध (हिरासत) आदेश यदि एक आधार पर कानूनन पोषणीय नहीं भी पाया जाता है, तब भी अन्य पृथक (अलग किए जाने योग्य) आधारों के बल पर वैध बना रहेगा। नशे के कई मामलों में आरोपी व्यक्ति की हिरासत के खिलाफ दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) रिट याचिका को खारिज करते हुए न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहारी और न्यायमूर्ति सुभेंदु सामंत की डिवीजन बेंच ने माना कि पीआईटी एनडीपीएस एक्ट की धारा 6 के तहत निरोध के आधार पृथक करने योग्य हैं। लिहाजा, केवल एक आधार के अमान्य होने से पूरा निरोध आदेश निष्प्रभावी नहीं होता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह याचिका डूंगा कुमारी द्वारा संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने पति डूंगा माणिक्यम (निरुद्ध व्यक्ति) की रिहाई की मांग करते हुए दाखिल की गई थी।
आंध्र प्रदेश सरकार के राजस्व (आबकारी-II) विभाग के प्रमुख सचिव (एफएसी) ने 9 जुलाई 2025 को पीआईटी एनडीपीएस एक्ट, 1988 की धारा 3(1) के तहत निरोध आदेश जारी किया था। सक्षम प्राधिकारी का निष्कर्ष था कि निरुद्ध व्यक्ति अधिनियम की धारा 2(ई)(iii) के तहत “अवैध तस्करी” में लिप्त था और उसकी गतिविधियां जनव्यवस्था के रखरखाव के प्रतिकूल थीं।
इसके बाद मामला सलाहकार बोर्ड (एडवाइजरी बोर्ड) के समक्ष रखा गया, जिसने 7 अगस्त 2025 को अपनी रिपोर्ट में कहा कि निरोध के लिए पर्याप्त कारण मौजूद हैं। इसके परिणामस्वरूप, राज्य सरकार ने 26 अगस्त 2025 को निरोध आदेश की पुष्टि करते हुए इसे हिरासत की तिथि से 12 महीने की अवधि के लिए लागू कर दिया।
यह निरोध आदेश आरोपी के खिलाफ दर्ज छह अलग-अलग आपराधिक मामलों पर आधारित था:
- अपराध संख्या 128/2017 (नक्कपल्ली पुलिस स्टेशन) – पीआईटी एनडीपीएस एक्ट की धारा 25, 8सी और 20(बी) के तहत, जिसमें 40 किलोग्राम गांजा और एक ऑटो शामिल था।
- अपराध संख्या 11/2018 (रोलुगुंटा पुलिस स्टेशन) – धारा 8सी, 20(बी)(ii)(सी) और 25 के तहत, जिसमें 30 किलोग्राम गांजा, एक कार और एक ऑटो शामिल था।
- अपराध संख्या 28/2018 (रोलुगुंटा पुलिस स्टेशन) – धारा 8सी, 20(बी)(ii)(सी) और 25 के तहत, जिसमें 60 किलोग्राम गांजा, दो कारें और एक पल्सर बाइक शामिल थी।
- अपराध संख्या 66/2018 (पिथापुरम पुलिस स्टेशन) – धारा 8सी और 20(बी)(ii)(सी) के तहत, जिसमें 29 किलोग्राम गांजा और एक ऑटो शामिल था।
- अपराध संख्या 344/2019 (पायाकरावपेटा पुलिस स्टेशन) – धारा 8सी, 20(बी)(i), 20(बी)(ii)(सी) और 25 के तहत, जिसमें 175 किलोग्राम गांजा और एक ऑटो शामिल था।
- अपराध संख्या 42/2025 (पायाकरावपेटा पुलिस स्टेशन) – धारा 20(बी)(ii)(सी) और 25 सहपठित 8(सी) के तहत, जिसमें 600 किलोग्राम गांजा और एक बोलेरो वाहन शामिल था।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील श्री डी. पूर्णचंद्र रेड्डी ने तर्क दिया कि कानून की नजर में निरोध आदेश पोषणीय नहीं है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि यद्यपि याचिकाकर्ता को छह में से पांच मामलों में जमानत मिल चुकी थी, लेकिन निरोध आदेश जारी होने की तिथि पर वह छठे मामले (अपराध संख्या 42/2025) में न्यायिक हिरासत में था। याचिकाकर्ता का कहना था कि निरुद्ध करने वाले प्राधिकारी ने यह दर्ज नहीं किया कि जब व्यक्ति पहले से ही न्यायिक हिरासत में था, तो निरोध आदेश जारी करने की क्या आवश्यकता थी या उस विशिष्ट मामले में उसके जमानत पर रिहा होने की कोई आसन्न संभावना थी या नहीं।
अपनी दलीलों के समर्थन में याचिकाकर्ता के वकील ने सैयद मोहीउद्दीन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, चैंपियन आर. संगमा बनाम मेघालय राज्य, वी. आदि लक्ष्मी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, चीमपार्थी परवीन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, लक्ष्मी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, और चीमपार्थी सलमा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य जैसे फैसलों पर भरोसा जताया।
राज्य की ओर से पेश सरकारी वकील श्री कीर्ति तेजा ने स्वीकार किया कि आरोपी अपराध संख्या 42/2025 में न्यायिक हिरासत में था और निरोध आदेश में जमानत पर रिहा होने की संभावना से जुड़ा संतुष्टि रिकॉर्ड दर्ज नहीं किया गया था। हालांकि, उन्होंने तर्क दिया कि केवल इस आधार पर पूरा आदेश रद्द नहीं होगा। पीआईटी एनडीपीएस एक्ट, 1988 की धारा 6 का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि निरोध आदेश प्रत्येक आधार पर अलग से बनाया गया माना जाता है और बाकी पांच आपराधिक मामलों (आधार संख्या 1 से 5) के बल पर पूरी तरह से कायम रह सकता है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी निष्कर्ष
दोनों पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का परीक्षण करते हुए न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहारी और न्यायमूर्ति सुभेंदु सामंत की पीठ ने पहले से जेल में बंद व्यक्ति के खिलाफ निवारक निरोध आदेश जारी करते समय आवश्यक ट्रिपल टेस्ट (तीन-स्तरीय परीक्षण) के आलोक में आधार संख्या 6 का मूल्यांकन किया। हाईकोर्ट ने चैंपियन आर. संगमा बनाम मेघालय राज्य में दोहराए गए सिद्धांतों को रेखांकित किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के कमरुन्निसा बनाम भारत संघ मामले का संदर्भ दिया गया था:
“ऊपर संदर्भित फैसलों की श्रृंखला से यह स्पष्ट होता है कि हिरासत में मौजूद व्यक्ति के खिलाफ भी निरोध आदेश वैध रूप से पारित किया जा सकता है (1) यदि आदेश पारित करने वाला प्राधिकारी इस बात से अवगत है कि वह वास्तव में हिरासत में है; (2) यदि उसके पास अपने समक्ष रखी गई विश्वसनीय सामग्री के आधार पर यह विश्वास करने का कारण है (क) कि उसकी जमानत पर रिहा होने की वास्तविक संभावना है, और (ख) कि इस प्रकार रिहा होने पर वह पूरी संभावना के साथ प्रतिकूल/अवैध गतिविधियों में लिप्त होगा; और (3) यदि उसे ऐसा करने से रोकने के लिए हिरासत में रखना आवश्यक महसूस होता है। यदि प्राधिकारी इस संबंध में अपनी संतुष्टि दर्ज करने के बाद आदेश पारित करता है, तो ऐसे आदेश को इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता कि प्राधिकारी के लिए उचित मार्ग जमानत का विरोध करना था और यदि विरोध के बावजूद जमानत दी जाती है, तो उच्च अदालत में उसे चुनौती देना था। रमेश यादव मामले में इस अदालत ने जो कहा था वह यह था कि सामान्यतः केवल आपराधिक प्रकृति के मामलों में जमानत मिलने से रोकने या रोकने के उद्देश्य से निरोध आदेश पारित नहीं किया जाना चाहिए, जिन्हें साधारण कानून के तहत निपटाया जा सकता है। यह अच्छी तरह से स्थापित है कि उस स्थिति में भी जहां कोई व्यक्ति हिरासत में है, यदि मामले के तथ्य और परिस्थितियां ऐसी मांग करती हैं, तो निवारक निरोध के कानून का सहारा लिया जा सकता है।”
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि यद्यपि निरोध प्राधिकारी ने अपराध संख्या 42/2025 में आरोपी की कस्टडी से अवगत होकर पहले टेस्ट को पूरा कर लिया था, लेकिन वह जमानत पर रिहाई की वास्तविक संभावना और आगे प्रतिकूल कृत्यों को रोकने के लिए निरोध की आवश्यकता से जुड़े दूसरे और तीसरे टेस्ट पर अपनी संतुष्टि दर्ज करने में विफल रहा। परिणामस्वरूप, निरोध आदेश केवल आधार संख्या 6 के बल पर नहीं टिक सकता था।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कुछ मिसालों में शामिल राज्य निवारक निरोध कानूनों के विपरीत, पीआईटी एनडीपीएस एक्ट, 1988 की धारा 6 में आधारों की पृथकनीयता (severability) से संबंधित एक विशिष्ट प्रावधान शामिल है।
पीआईटी एनडीपीएस एक्ट की धारा 6 का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“जहां किसी व्यक्ति को धारा 3 की उप-धारा (1) के तहत निरोध आदेश के तहत निरुद्ध किया गया है, जो दो या अधिक आधारों पर बनाया गया है, ऐसे निरोध आदेश को इनमें से प्रत्येक आधार पर अलग-अलग बनाया गया माना जाएगा और तदनुसार— (क) ऐसा आदेश केवल इसलिए अमान्य या निष्प्रभावी नहीं माना जाएगा क्योंकि इसमें से एक या कुछ आधार— (i) अस्पष्ट हैं, (ii) गैर-मौजूद हैं, (iii) प्रासंगिक नहीं हैं, (iv) ऐसे व्यक्ति से जुड़े या निकटतम रूप से जुड़े नहीं हैं, या (v) किसी अन्य कारण से अमान्य हैं, और इसलिए यह hold करना संभव नहीं है कि आदेश देने वाली सरकार या अधिकारी धारा 3 की उप-धारा (1) में दिए अनुसार शेष आधार या आधारों के संदर्भ में संतुष्ट हुए होंगे और निरोध का आदेश दिया होगा; (ख) निरोध का आदेश देने वाली सरकार या अधिकारी को शेष आधार या आधारों के संदर्भ में उक्त उप-धारा (1) में दिए अनुसार संतुष्ट होने के बाद निरोध का आदेश दिया हुआ माना जाएगा।”
बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के मोर्तुजा हुसैन चौधरी बनाम नागालैंड राज्य, प्रकाश चंद्र मेहता बनाम आयुक्त एवं सचिव, केरल सरकार, और वशिष्ठ नारायण करवारिया बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसलों का हवाला दिया, जिन्होंने पुष्टि की थी कि वैधानिक पृथकनीयता खंड यह सुनिश्चित करते हैं कि केवल एक आधार अमान्य या अग्राह्य होने के कारण पूरा आदेश विफल न हो।
इन वैधानिक सिद्धांतों को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि चूकि निरोध आदेश छह आधारों पर बनाया गया था, इसलिए कानूनी रूप से इसे प्रत्येक आधार पर अलग से पारित किया गया माना जाता है। इसलिए, भले ही आदेश को आधार संख्या 6 पर कायम न रखा जा सके, यह आधार संख्या 1 से 5 के तहत वैध और प्रवर्तनीय बना रहता है।
फैसला
हाईकोर्ट ने आधार संख्या 1 से 5 पर निरोध आदेश को बरकरार रखा और माना कि निरुद्ध व्यक्ति रिहाई का हकदार नहीं है। चुनौती में कोई मेरिट न पाते हुए डिवीज़न बेंच ने रिट याचिका को बिना किसी खर्च के आदेश के खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: डूंगा कुमारी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य व अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 23639/2025
पीठ: न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहारी और न्यायमूर्ति सुभेंदु सामंत
निर्णय की तिथि: 08.07.2026

