छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत प्रदत्त असाधारण और विवेकाधीन क्षेत्राधिकार उन वादियों के लिए नहीं है जो दशकों तक अपने अधिकारों पर सोते रहते हैं और बाद में निष्प्रभावी हो चुके पुराने दावों को पुनर्जीवित करने का प्रयास करते हैं। अत्यधिक विलंब और शिथिलता (डिले एंड लैचेस) के आधार पर रिट याचिका को खारिज करते हुए एकल पीठ के जस्टिस बिभु दत्त गुरु ने कहा कि यद्यपि रिट याचिका दायर करने के लिए कोई निश्चित समय-सीमा (लिमिटेशन पीरियड) निर्धारित नहीं है, फिर भी अदालत का दरवाजा एक उचित समय के भीतर ही खटखटाया जाना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता राजेंद्र कुमार महंत ने खुद को स्वर्गीय रामलाल महंत का पुत्र बताते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। याचिका के अनुसार, उसके पिता सहायक शिक्षक (असिस्टेंट टीचर) के पद पर कार्यरत थे और 30 अप्रैल 2002 को सेवा से सेवानिवृत्त हुए थे। याचिका में यह भी स्वीकार किया गया कि सेवानिवृत्ति के समय मिलने वाले सभी परिलाभों (रिटायरल ड्यूज) का पूर्ण भुगतान कर दिया गया था और बाद में वर्ष 2015 में उसके पिता का देहांत हो गया।
इस रिट याचिका के जरिए याचिकाकर्ता ने साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) और उसके वरिष्ठ अधिकारियों को यह निर्देश देने की मांग की थी कि वे उसके पिता द्वारा 2 जनवरी 1996 को दिए गए कथित अभ्यावेदन (रिप्रेजेंटेशन) पर निर्णय लें, जिसमें वर्ष 1989 से 1994 की अवधि के एरियर (बकाया वेतन) के भुगतान की मांग की गई थी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विनोद कुमार देवांगन ने अदालत से लंबित अभ्यावेदन पर विचार करने का निर्देश देने का आग्रह किया। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका के पैरा 7 में यह दावा भी किया कि अदालत आने में कोई देरी नहीं हुई है।
वहीं, एसईसीएल की ओर से उपस्थित अधिवक्ता राहुल मिश्रा ने याचिका का विरोध करते हुए याचिकाकर्ता के कथनों में गंभीर विरोधाभास उजागर किए। उन्होंने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि उसके पिता सहायक शिक्षक थे, जबकि कथित अभ्यावेदन में यह दर्ज है कि वे चपरासी (कैटेगरी-II) के पद पर नियुक्त थे। प्रतिवादी पक्ष ने दलील दी कि पिता वर्ष 2002 में सेवानिवृत्त हुए और 2015 में उनका निधन हो गया, इसके बावजूद याचिकाकर्ता 1989-1994 की अवधि से जुड़े एक पुराने और निष्प्रभावी दावे को इतने लंबे समय बाद उठाने की कोशिश कर रहा है।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां और कानूनी विश्लेषण
मामले के रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद जस्टिस बिभु दत्त गुरु ने रेखांकित किया कि यह दावा 1989 से 1994 के बकाए से संबंधित है, जिसे तीन दशकों से अधिक के अत्यधिक और अस्पष्टीकृत विलंब के बाद अदालत के समक्ष लाया गया है। हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसी कोई पावती या रसीद नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि 2 जनवरी 1996 का अभ्यावेदन कभी सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत भी किया गया था। साथ ही, इस अत्यधिक देरी को सही ठहराने के लिए कोई असाधारण परिस्थिति या उचित कारण भी नहीं बताया गया।
अनुच्छेद 226 के तहत अदालत के विवेकाधीन अधिकारों के मूल सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:
“यह सुस्थापित है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत इस न्यायालय के असाधारण और विवेकाधीन क्षेत्राधिकार का सहारा लेने वाले व्यक्ति को उचित तत्परता और उचित समय के भीतर न्यायालय का दरवाजा खटखटाना चाहिए। रिट क्षेत्राधिकार ऐसे वादी को राहत देने के लिए नहीं है जो अत्यधिक लंबी अवधि तक निष्क्रिय बैठा रहा और बाद में किसी पुराने एवं निष्प्रभावी दावे को दोबारा जीवित करने की कोशिश करता है।”
हाईकोर्ट ने आगे माना कि बिना किसी ठोस और संतोषजनक कारण के इतने बड़े विलंब को नजरअंदाज करने से अन्य पक्षों के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और जो मामले अंतिम रूप ले चुके हैं, उनमें अनिश्चितता पैदा हो सकती है:
“विलंब और शिथिलता (डिले एंड लैचेस) के सिद्धांत शांति, निश्चितता और अंतिमता के आधार पर टिके हैं। जो वादी अपने कथित अधिकारों को लेकर लंबे समय तक सोता रहता है, वह विलंबित चरण में इस न्यायालय के विवेकाधीन रिट क्षेत्राधिकार की मांग अपने अधिकार के तौर पर नहीं कर सकता।”
पिता और पुत्र दोनों की लंबी निष्क्रियता पर सख्त रुख अपनाते हुए पीठ ने कहा:
“मौजूदा मामले में, याचिकाकर्ता ने अपने दिवंगत पिता के बकाए का दावा करते हुए तीन दशकों के बाद यह रिट याचिका दायर की है, जिसके संबंध में मृतक कर्मचारी ने अपने जीवनकाल में वर्ष 1996 में एक अभ्यावेदन दिया था। इसके बाद, मृतक कर्मचारी 2002 में सेवानिवृत्त हुआ और बाद में 2015 में उसकी मृत्यु हो गई, और इस पूरी अवधि के दौरान उसने अपने लंबित अभ्यावेदन को लेकर कोई प्रयास नहीं किया। याचिकाकर्ता (मृतक कर्मचारी का पुत्र) भी सोता रहा और अपनी सुविधानुसार तब जागा, जब उसे ठीक लगा—जिसका कारण केवल वही समझ सकता है। लेकिन कानून में अपने हिसाब से कारणों को तय करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। जो अपने अधिकारों पर सोता है, उसे नुकसान उठाना ही पड़ता है।”
अदालत का निर्णय
तीस वर्षों से अधिक की लंबी निष्क्रियता का कोई उचित या संतोषजनक कारण न मिलने पर हाईकोर्ट ने अपने असाधारण रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने से इनकार कर दिया और याचिका को विलंब एवं शिथिलता के आधार पर सीधे तौर पर खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: राजेंद्र कुमार महंत बनाम साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड और अन्य
वाद संख्या: डब्ल्यूपीएस संख्या 7294/2026
पीठ: जस्टिस बिभु दत्त गुरु
निर्णय की तिथि: 06/10/2026

