आरोप तय करने से पहले धारा 227 सीआरपीसी के तहत डिस्चार्ज पर विचार करना अनिवार्य शर्त: इलाहाबाद हाईकोर्ट

आपराधिक मुकदमे के संचालन की अनिवार्य प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 228 के तहत आरोप (चार्ज) तय करने से पहले धारा 227 सीआरपीसी के तहत आरोपी के डिस्चार्ज (उन्मोचन) पर निष्कर्ष दर्ज करना एक अनिवार्य पूर्व-शर्त है। विशेष न्यायाधीश, एससी/एसटी एक्ट, लखनऊ के आदेश को खारिज करते हुए जस्टिस मनीष माथुर ने आपराधिक अपील स्वीकार कर ली। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पूर्व में तय किए गए आरोपों को निरस्त कर नए सिरे से आरोप तय करने के लिए मामला वापस भेजा गया हो, तब भी ट्रायल कोर्ट डिस्चार्ज पर विचार करने की वैधानिक अनिवार्यता को नजरअंदाज नहीं कर सकता—चाहे आरोपी ने इसके लिए अर्जी दी हो या कोर्ट को खुद इस पर विचार करना हो।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला सतीश शर्मा के खिलाफ दर्ज केस क्राइम संख्या 423/2018 की प्राथमिकी से जुड़ा है। पुलिस जांच के बाद 15 जुलाई 2018 को चार्जशीट दाखिल की गई और ट्रायल कोर्ट ने 28 जुलाई 2018 को समनिंग आदेश जारी किया। आरोपी ने चार्जशीट और समनिंग आदेश को धारा 482 सीआरपीसी के तहत चुनौती दी थी, जिसे हाईकोर्ट ने 4 दिसंबर 2019 को खारिज कर दिया था।

इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने 28 मई 2019 को आरोपी के खिलाफ आरोप तय कर दिए और अभियोजन गवाह-1 (पीडब्ल्यू-1) के बयान दर्ज होने लगे। आरोपी ने आरोप तय करने के इस आदेश को आपराधिक अपील संख्या 1084/2019 के जरिए हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 27 फरवरी 2020 को अपील स्वीकार करते हुए 28 मई 2019 के आरोप तय करने के आदेश को रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट को धारा 212 सीआरपीसी के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए नए सिरे से आरोप तय करने का निर्देश दिया।

इस निर्देश के अनुपालन में मामला विशेष सत्र परीक्षण संख्या 301/2018 के तहत विशेष न्यायाधीश, एससी/एसटी एक्ट, लखनऊ के समक्ष सूचीबद्ध हुआ। इस दौरान आरोपी ने धारा 91 सीआरपीसी के तहत दस्तावेज तलब करने के लिए पूर्व में खारिज हो चुकी अर्जी पर दोबारा विचार करने और धारा 227 सीआरपीसी के तहत डिस्चार्ज पर विचार करने की मांग की। ट्रायल कोर्ट ने 29 जून 2026 को इस मांग को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि हाईकोर्ट के 27 फरवरी 2020 के आदेश में केवल धारा 212 सीआरपीसी के तहत नए सिरे से आरोप तय करने का क्षेत्राधिकार दिया गया था, इसलिए कोर्ट उस निर्देश से आगे नहीं जा सकती। इस आदेश के खिलाफ अपीलार्थी ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 14-ए(1) के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलार्थी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनुराग शुक्ला ने पैरवी की, जिनके सहयोग में अधिवक्ता नांदेश वर्मा, शाश्वत वाजपेयी, नितीश शुक्ला और प्रांशु अग्रवाल उपस्थित रहे। उन्होंने दलील दी कि सीआरपीसी की योजना के तहत धारा 228 के तहत आरोप तय करने से पहले ट्रायल कोर्ट के लिए धारा 227 सीआरपीसी के तहत डिस्चार्ज पर निष्कर्ष दर्ज करना कानूनी रूप से अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने इस संबंध में कोई संतुष्टि दर्ज नहीं की है, इसलिए सीधे धारा 228 की कार्यवाही शुरू करने से पूरा ट्रायल दूषित हो जाएगा। अपने तर्क के समर्थन में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—अमित कपूर बनाम रमेश चंदर, पी. विजयन बनाम केरल राज्य और सज्जन कुमार बनाम सीबीआई का हवाला दिया। उन्होंने यह भी कहा कि चूंकि पुराने आरोप रद्द होने के बाद मुकदमा आरोप तय करने के पूर्व चरण पर लौट चुका है, इसलिए धारा 91 सीआरपीसी की अर्जी पर भी नए सिरे से सुनवाई होनी चाहिए।

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दूसरी तरफ, राज्य सरकार (प्रतिवादी संख्या 1) की ओर से उपस्थित अपर शासकीय अधिवक्ता (एजीए) और प्रतिवादी संख्या 2 की अधिवक्ता श्रीमती सुनीति सचान ने अपील का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि धारा 91 सीआरपीसी की अर्जी 1 मई 2019 को पहले ही खारिज हो चुकी थी और उस आदेश को धारा 482 की कार्यवाही में चुनौती न दिए जाने के कारण वह अंतिम रूप ले चुका था। उन्होंने 16 मार्च 2026 की अपनी आपत्तियों का हवाला देते हुए कहा कि जब डिस्चार्ज की अर्जी पहले ही निस्तारित हो चुकी है, तो सिर्फ नए सिरे से आरोप तय होने के आधार पर उस मुद्दे को दोबारा नहीं खोला जा सकता।

प्रत्युत्तर में अपीलार्थी के वकील ने स्पष्ट किया कि अपीलार्थी द्वारा पूर्व में धारा 227 सीआरपीसी के तहत डिस्चार्ज की कोई अर्जी दाखिल नहीं की गई थी और न ही अदालत ने स्वतः संज्ञान लेकर इस शक्ति का इस्तेमाल किया था। उन्होंने ट्रायल कोर्ट की आर्डर-शीट की प्रमाणित प्रतियों के आधार पर अपनी बात की पुष्टि की।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

धारा 227 और धारा 228 सीआरपीसी के वैधानिक ढांचे का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 227 के तहत जज को केस डायरी और दस्तावेजों पर विचार करना होता है, दोनों पक्षों की दलीलें सुननी होती हैं और यदि आगे बढ़ने का पर्याप्त आधार न हो, तो कारण दर्ज करते हुए आरोपी को डिस्चार्ज करना होता है। अदालत ने टिप्पणी की:

“इस अदालत की सुविचारित राय में, धारा 228 सीआरपीसी के चरण में आगे बढ़ने या न बढ़ने के लिए आरोपी के डिस्चार्ज पर विचार करने का धारा 227 सीआरपीसी का चरण एक अनिवार्य शर्त (sine qua non) है। धारा 227 सीआरपीसी का प्रावधान यह भी प्रकट नहीं करता कि इस पर ट्रायल कोर्ट द्वारा केवल आरोपी द्वारा प्रस्तुत अर्जी पर ही विचार किया जाना आवश्यक है। इसके विपरीत, यह प्रावधान दर्शाता है कि ट्रायल कोर्ट को धारा 228 सीआरपीसी के तहत आगे बढ़ने से पहले स्वयं भी डिस्चार्ज के पहलू पर विचार करना आवश्यक है।”

हाईकोर्ट ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के तीन प्रमुख निर्णयों पर विस्तार से चर्चा की:

  1. अमित कपूर बनाम रमेश चंदर (2012) 9 SCC 460: सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अपराध के घटकों की मौजूदगी पर अदालत की संतुष्टि एक पूर्व-शर्त है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी थी: “धारा 227 और धारा 228 की भाषा के बीच एक सूक्ष्म अंतर है। धारा 227 अदालत की एक निश्चित राय और निर्णय की अभिव्यक्ति है, जबकि धारा 228 अनंतिम (टेंटेटिव) है। इस प्रकार, आरोप तय करने के चरण में यह कहना कि अदालत को ऐसी राय बनानी चाहिए कि आरोपी अपराध करने का निश्चित रूप से दोषी है, एक ऐसा दृष्टिकोण है जो संहिता की धारा 228 के तहत अनुचित है।”
  2. पी. विजयन बनाम केरल राज्य (2010) 2 SCC 398: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि धारा 227 कोर्ट को शुरुआती स्तर पर ही आरोपी को डिस्चार्ज करने की विशेष शक्ति देती है यदि कार्यवाही का पर्याप्त आधार न हो: “यह प्रावधान संहिता में इसलिए शामिल किया गया था ताकि प्रथम दृष्ट्या मामला न बनने की स्थिति में जनता के समय की बर्बादी को रोका जा सके और आरोपी को अनावश्यक उत्पीड़न तथा खर्च से बचाया जा सके।”
  3. सज्जन कुमार बनाम सीबीआई (2010) 9 SCC 368: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट सिद्धांत तय किए थे कि ट्रायल कोर्ट प्रथम दृष्ट्या मामले की जांच के लिए साक्ष्यों को परख सकता है। कोर्ट ने कहा था: “अदालत केवल अभियोजन पक्ष के पोस्ट ऑफिस या मुखपत्र के रूप में कार्य नहीं कर सकती, बल्कि उसे मामले की व्यापक संभावनाओं, साक्ष्यों और अदालत के समक्ष पेश किए गए दस्तावेजों के कुल प्रभाव तथा किसी भी बुनियादी कमी आदि पर विचार करना होगा।” साथ ही, यदि दो दृष्टिकोण संभव हों और उनमें से एक केवल सामान्य संदेह पैदा करता हो (गंभीर संदेह नहीं), तो कोर्ट आरोपी को डिस्चार्ज कर सकती है।
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इन नजीरों को लागू करते हुए जस्टिस माथुर ने ट्रायल कोर्ट के इस दृष्टिकोण को खारिज कर दिया कि वह पूर्व रिमांड आदेश से बंधी थी:

“आक्षेपित आदेश में दर्ज यह निष्कर्ष कि डिस्चार्ज से जुड़ी दलील पर विचार नहीं किया जा सकता क्योंकि केवल धारा 212 सीआरपीसी के तहत आरोप तय करने के निर्देश दिए गए थे, इस अदालत को उचित नहीं लगता। 27.02.2020 के आदेश में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं दर्शाया गया है कि ट्रायल कोर्ट धारा 227 सीआरपीसी का पालन न करे। इसके अलावा, जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस प्रावधान को अनिवार्य माना जा चुका है, तो विबंध (एस्तोपेल), अधित्याग (वेवर) या मौन सहमति (एक्विसेन्स) का कोई सवाल ही नहीं उठता, और इसलिए यदि आवश्यक हो तो ट्रायल कोर्ट धारा 228 सीआरपीसी के तहत आगे बढ़ने से पहले धारा 227 सीआरपीसी के तहत संतुष्टि दर्ज करने के लिए बाध्य था।”

धारा 91 सीआरपीसी के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान दस्तावेज तलब करने का अधिकार ट्रायल कोर्ट के विवेक पर छोड़ता है और इसके लिए कोई तय चरण निर्धारित नहीं है। चूंकि पुराने आरोप पहले ही रद्द हो चुके थे, इसलिए मुकदमा आरोप तय करने से पहले के चरण में वापस आ गया था और पिछली अर्जी की अस्वीकृति निष्प्रभावी हो चुकी थी। इसलिए ट्रायल कोर्ट का यह मानना गलत था कि हाईकोर्ट से स्पष्ट अनुमति न होने के कारण अर्जी पर विचार नहीं हो सकता।

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अदालत का निर्णय

ट्रायल कोर्ट के दृष्टिकोण को कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण ठहराते हुए हाईकोर्ट ने आपराधिक अपील स्वीकार कर ली और 29 जून 2026 के आक्षेपित आदेश को रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह अगली निर्धारित तिथि पर या उसके बाद 15 दिनों के भीतर धारा 227 सीआरपीसी के तहत अपीलार्थी के डिस्चार्ज के पहलू पर विचार करे। यदि कोर्ट निर्धारित समय में निर्णय न ले पाए, तो उसे इसके कारण दर्ज करने होंगे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोप तय करने की कार्यवाही धारा 227 सीआरपीसी के तहत पारित होने वाले आदेश के बाद और पूरी तरह उसी पर निर्भर होगी।

इसके साथ ही ट्रायल कोर्ट को धारा 91 सीआरपीसी की अर्जी पर स्वतंत्र न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करते हुए गुण-दोष के आधार पर नए सिरे से निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी गई।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: सतीश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, गृह सचिव के माध्यम से, लखनऊ व अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1814/2026
पीठ: जस्टिस मनीष माथुर
निर्णय की तिथि: 29 सितंबर 2026

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