कलकत्ता हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जमानत मिलने के बाद किसी व्यक्ति को हिरासत में रखना कानून सम्मत नहीं है। जस्टिस देबांगसु बसाक और जस्टिस आर्यक दत्त की खंडपीठ ने एक चाय बागान मजदूर को 60 दिनों तक गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखने के मामले में पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया कि वह पीड़ित को रोजगार के नुकसान, मानसिक प्रताड़ना और अवैध हिरासत की पीड़ा के लिए 5,36,000 रुपये का मुआवजा दे।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता जॉय कृष्ण नाग (उर्फ जॉय कुमार नाग और रोहित) ने अपनी कथित अवैध हिरासत को लेकर संविधान के तहत हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता को कुमारग्राम थाने में दर्ज तीन आपराधिक मामलों (मामला संख्या 101/18, 103/18 और 141/18) में फंसाया गया था।
इन तीनों आपराधिक मामलों में याचिकाकर्ता को जमानत मिल गई थी और उसने आदेशों के अनुसार जरूरी मुचलके (श्योरिटी) भी जमा कर दिए थे। इसके बावजूद उसे 6 अगस्त 2018 को रिहा नहीं किया गया और उसकी हिरासत 5 अक्टूबर 2018 तक जारी रही। इस प्रकार, याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसे 6 अगस्त 2018 से 5 अक्टूबर 2018 तक कुल 60 दिनों के लिए गैरकानूनी हिरासत में रखा गया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि तीनों आपराधिक मामलों में जमानत मिलने के बाद याचिकाकर्ता को 6 अगस्त 2018 को ही रिहा किया जाना चाहिए था। वकील ने अदालत को बताया कि उस दौरान याचिकाकर्ता एक चाय बागान में मजदूर के रूप में काम करता था और प्रतिदिन लगभग 600 रुपये कमाता था। वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता को न केवल रोजगार के नुकसान के लिए, बल्कि अवैध हिरासत, मानसिक उत्पीड़न और प्रताड़ना के लिए भी मुआवजा मिलना चाहिए। उन्होंने अदालत से 20 लाख रुपये के मुआवजे की प्रार्थना की और अंतिम राशि का निर्धारण अदालत के विवेक पर छोड़ दिया।
राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सरकारी वकील (एजीपी) ने निर्देशानुसार स्वीकार किया कि इस अवधि के दौरान हिरासत में रखे जाने को लेकर उनके पास बमुश्किल कोई स्पष्टीकरण है। हालांकि, उन्होंने दलील दी कि 14 अगस्त 2018 को एक एमआर केस शुरू किया गया था, जिसमें याचिकाकर्ता की कस्टडी की आवश्यकता थी, इसलिए उसे 5 अक्टूबर 2018 तक हिरासत में रखा गया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
खंडपीठ ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि याचिकाकर्ता को तीनों पुलिस मामलों में जमानत मिल चुकी थी और उसने जमानत की शर्तों के तहत मुचलका भी दाखिल कर दिया था। अदालत ने पाया कि इलाके में शांति भंग न करने के लिए निष्पादित बांड के उल्लंघन के आरोप में एमआर केस संख्या 780/2018 दर्ज किया गया था। इस मामले में 6 अगस्त 2018 और 14 अगस्त 2018 को आदेश पारित किए गए थे।
उन दोनों आदेशों की समीक्षा के बाद खंडपीठ ने राज्य की दलीलों को खारिज करते हुए टिप्पणी की:
“एमआर केस के उन दोनों आदेशों के अवलोकन से, हम इस निष्कर्ष पर पहुंचने की स्थिति में नहीं हैं कि रिट याचिकाकर्ता द्वारा तीनों पुलिस मामलों में अपनी जमानत मुचलका पेश करने की अवधि के बाद भी उसे हिरासत में रखने की आवश्यकता थी।”
अदालत ने माना कि एमआर केस की कार्यवाही में पेश करने के नाम पर याचिकाकर्ता को हिरासत में रखने का कोई कानूनी आधार नहीं था:
“राज्य की यह दलील संतोषजनक नहीं पाई गई कि एमआर केस संख्या 780/2018 के संबंध में रिट याचिकाकर्ता को पेश करने के उद्देश्य से उसकी कस्टडी आवश्यक थी। उसमें पारित आदेशों में रिट याचिकाकर्ता को हिरासत में रखे जाने की कोई आवश्यकता नहीं थी।”
हिरासत को पूरी तरह गैरकानूनी ठहराते हुए खंडपीठ ने कहा:
“ऐसी परिस्थितियों में, हमारा मानना है कि 6 अगस्त 2018 से 5 अक्टूबर 2018 के बीच रिट याचिकाकर्ता को हिरासत में रखना कानून सम्मत नहीं था। इसलिए, रिट याचिकाकर्ता इस अवधि के लिए मुआवजे का हकदार है।”
अदालत का निर्णय और मुआवजे का निर्धारण
मुआवजे की राशि तय करते हुए अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने 20 लाख रुपये की मांग की थी, लेकिन वह इस दावे को पुष्ट करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज या सामग्री पेश करने में असमर्थ रहा।
अदालत ने दर्ज किया कि याचिकाकर्ता एक चाय बागान मजदूर था और प्रतिदिन लगभग 600 रुपये कमाता था। इस आधार पर 60 दिनों की अवैध हिरासत के दौरान रोजगार के प्रत्यक्ष नुकसान के रूप में 36,000 रुपये निर्धारित किए गए। इसके अतिरिक्त, खंडपीठ ने अवैध हिरासत की पीड़ा और मानसिक प्रताड़ना के लिए 5 लाख रुपये का मुआवजा तय किया।
हाईकोर्ट ने कुल 5,36,000 रुपये का मुआवजा मंजूर करते हुए राज्य सरकार को आदेश की तिथि से चार सप्ताह के भीतर यह राशि याचिकाकर्ता को भुगतान करने का निर्देश दिया और याचिका का निपटारा कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: जॉय कृष्ण नाग उर्फ जॉय कुमार नाग उर्फ रोहित बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: डब्ल्यूपीए 20950 / 2018
पीठ: जस्टिस देबांगसु बसाक और जस्टिस आर्यक दत्त
निर्णय की तिथि: 5 अक्टूबर 2026

