इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि आर्बिट्रेटर (मध्यस्थ) की नियुक्ति के लिए पक्षकार द्वारा दी गई महज सहमति, मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 12(5) के तहत अयोग्यता को समाप्त करने वाली ‘स्पष्ट छूट’ (Express Waiver) नहीं मानी जा सकती। मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि एक इच्छुक पक्ष (Interested Party) द्वारा एकतरफा तरीके से की गई आर्बिट्रेटर की नियुक्ति समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है और क्षेत्राधिकार की ऐसी मौलिक कमी को अपील के स्तर पर भी उठाया जा सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता लक्ष्मी कांत पांडेय, जिला बांदा में हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) के ‘पांडे फिलिंग स्टेशन’ के डीलर थे। 14 जून 2017 को एक औचक निरीक्षण के दौरान एक नोजल की सील टूटी हुई पाई गई। अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि उन्होंने नोजल की खराबी के बारे में पहले ही शिकायत की थी और ईंधन की कोई चोरी या कमी नहीं पाई गई थी, फिर भी HPCL ने 24 जुलाई 2017 को डीलर समझौता रद्द कर दिया।
अपीलकर्ता ने समझौते की धारा 66 (आर्बिट्रेशन क्लॉज) के तहत मध्यस्थता की मांग की। समझौते के अनुसार, HPCL के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक (CMD) को स्वयं आर्बिट्रेटर बनने या किसी अन्य को नियुक्त करने का अधिकार था। पत्रों के आदान-प्रदान के बाद, जब कॉर्पोरेशन ने अपीलकर्ता को चेतावनी दी कि उसे उनके कर्मचारी की नियुक्ति पर सहमति देनी होगी या अदालत जाना होगा, तब अपीलकर्ता ने सहमति दे दी। इसके बाद नियुक्त किए गए एकल मध्यस्थ श्री संजय वर्गीस ने 26 अप्रैल 2019 को अपीलकर्ता के दावों को खारिज कर दिया। वाणिज्यिक न्यायालय (Commercial Court), लखनऊ ने भी इस अवार्ड को सही ठहराया, जिसके खिलाफ अपीलकर्ता ने धारा 37 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षकारों के तर्क
अपीलकर्ता के तर्क: वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव मेहरोत्रा ने तर्क दिया कि आर्बिट्रेटर की नियुक्ति धारा 12(1) और 12(5) के तहत अधिनियम की पांचवीं और सातवीं अनुसूची में दिए गए कानूनी प्रतिबंधों का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि:
- CMD स्वयं आर्बिट्रेटर बनने के लिए अयोग्य थे, इसलिए वे किसी अन्य को नामित करने के लिए भी सक्षम नहीं थे।
- धारा 12(5) के तहत ‘स्पष्ट छूट’ के लिए विवाद होने के बाद लिखित समझौता होना अनिवार्य है, जो इस मामले में नहीं हुआ।
- पूरी कार्यवाही क्षेत्राधिकार के अभाव में शून्य थी और इसे किसी भी स्तर पर चुनौती दी जा सकती है।
प्रतिवादी (HPCL) के तर्क: कॉर्पोरेशन की ओर से अधिवक्ता अपराजिता बंसल ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता ने 7 मार्च 2018 को पत्र लिखकर अपनी लिखित सहमति दी थी, जो ‘स्पष्ट छूट’ के समान है। उन्होंने जोर दिया कि:
- अपीलकर्ता ने बिना किसी विरोध के कार्यवाही में भाग लिया।
- कॉर्पोरेशन ने अपीलकर्ता को 2015 के संशोधन के बारे में स्पष्ट रूप से सूचित किया था और उनकी सहमति प्राप्त की थी।
- अवार्ड पक्ष में न आने पर सहमति से मुकरना ‘सार्वजनिक नीति’ के विरुद्ध है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने 2015 के संशोधन अधिनियम के उद्देश्यों पर ध्यान केंद्रित किया, जिसका लक्ष्य आर्बिट्रेटर की निष्पक्षता सुनिश्चित करना है। कोर्ट ने सातवीं अनुसूची का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें शामिल श्रेणियों से संबंधित व्यक्ति आर्बिट्रेटर बनने के लिए “अयोग्य” होते हैं।
एकतरफा नियुक्ति पर: कोर्ट ने पाया कि धारा 66 के तहत नामित CMD कॉर्पोरेशन के अधिकारी हैं। TRF Ltd. और CORE-II मामलों में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा:
“चूंकि कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक स्वयं मध्यस्थ के रूप में कार्य करने के लिए अयोग्य थे, इसलिए वे मध्यस्थता के लिए किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त करने के लिए भी सक्षम नहीं थे।”
धारा 12(5) के तहत ‘स्पष्ट छूट’ पर: पक्षकारों के बीच हुए पत्राचार का विश्लेषण करते हुए कोर्ट ने पाया कि यह “लिखित में स्पष्ट समझौते” की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। Bhadra International मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का संदर्भ देते हुए बेंच ने कहा:
“लिखित समझौते के रूप में स्पष्ट रूप से छूट देने की आवश्यकता यह सुनिश्चित करती है कि पक्षकारों को अनजाने में उनके आपत्ति करने के अधिकार से वंचित न किया जाए।”
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता का 7 मार्च का पत्र केवल कॉर्पोरेशन को आर्बिट्रेटर नियुक्त करने की अनुमति देने वाली सहमति थी, न कि कानूनी रूप से अपने अधिकारों का त्याग (Waiver)।
अपील में आपत्ति उठाने पर: हाईकोर्ट ने HPCL के इस तर्क को खारिज कर दिया कि यह मुद्दा उठाने में देरी हुई है। कोर्ट ने कहा कि चूंकि अयोग्यता कानून के संचालन से उत्पन्न होती है, इसलिए आर्बिट्रेटर के पास “निहित क्षेत्राधिकार” (Inherent Jurisdiction) की कमी थी।
“आर्बिट्रेटर की अयोग्यता को किसी भी स्तर पर चुनौती दी जा सकती है क्योंकि ऐसी परिस्थिति में पारित अवार्ड कानून की दृष्टि में अस्तित्वहीन (Non-est) होता है।”
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए वाणिज्यिक न्यायालय के फैसले और 26 अप्रैल 2019 के मध्यस्थता अवार्ड को रद्द कर दिया। कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:
- नियुक्ति ने पक्षकारों के बीच ‘समान व्यवहार’ (Equal Treatment) के सिद्धांत का उल्लंघन किया।
- CMD स्वयं मध्यस्थ के रूप में कार्य करने या किसी को नामित करने के लिए अयोग्य थे।
- कानून के अनुसार लिखित में कोई ‘स्पष्ट छूट’ मौजूद नहीं थी।
- क्षेत्राधिकार की कमी का मुद्दा धारा 37 की अपील में भी उठाया जा सकता है।
अब दोनों पक्ष विवाद के समाधान के लिए कानून के अनुसार नए मध्यस्थ की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करने के लिए स्वतंत्र हैं।
केस विवरण
- केस का शीर्षक: लक्ष्मी कांत पांडेय बनाम हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड
- केस संख्या: आर्बिट्रेशन अपील संख्या – 53 ऑफ 2023 (Arbitration Appeal No. – 53 of 2023)
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली एवं न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह
- तारीख: 23 अप्रैल, 2026
- अपीलकर्ता के वकील: गौरव मेहरोत्रा (वरिष्ठ अधिवक्ता), अनुपम मिश्रा और मधुर झावर द्वारा सहायता प्राप्त।
- प्रतिवादी के वकील: अपराजिता बंसल, अनिलेश तिवारी, सुश्री गुरसिमरन कौर और सुश्री श्रेया पाहवा।

