दिल्ली हाईकोर्ट की पुलिस को कड़ी फटकार: ‘आतंकवाद की जांच हो या कुछ भी, कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य’

दिल्ली हाईकोर्ट ने कार्यकर्ताओं की कथित अवैध हिरासत और प्रताड़ना के मामले में दिल्ली पुलिस को सख्त चेतावनी दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोप चाहे कितने भी गंभीर क्यों न हों, कानून प्रवर्तन एजेंसियों को संविधान द्वारा निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना ही होगा।

जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंद्र डुडेजा की पीठ ने इस मामले में पुलिस द्वारा सीलबंद लिफाफे में सौंपी गई स्टेटस रिपोर्ट पर असंतोष व्यक्त किया। हाईकोर्ट ने जांच एजेंसी को निर्देश दिया कि वे या तो आंतरिक रूप से उचित कार्रवाई करें, अन्यथा इस मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दी जाएगी।

अदालत उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें 12 से 14 मार्च के बीच 10 लोगों को अवैध रूप से हिरासत में लेने का आरोप लगाया गया है। इनमें छह छात्र, दो श्रमिक अधिकार कार्यकर्ता और दो विस्थापन विरोधी कार्यकर्ता शामिल हैं।

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि उन्हें दयाल सिंह कॉलेज और विजय नगर के बाहर से “उठाया” गया और न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी की एक अचिह्नित इमारत में ले जाया गया। कार्यकर्ता लक्षिता राजौरा की बहन द्वारा दायर एक याचिका में हिरासत के दौरान प्रताड़ना और अवैध रूप से कैद रखने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

सुनवाई के दौरान पीठ ने जोर देकर कहा कि भले ही मामला आतंकवाद या माओवादी संबंधों जैसे गंभीर आरोपों से जुड़ा हो, पुलिस कानून को ताक पर नहीं रख सकती।

READ ALSO  समयपूर्व रिहाई के संबंध में नीति को पारदर्शी तरीके से लागू किया जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश जारी किए

हाईकोर्ट ने मौखिक रूप से टिप्पणी करते हुए कहा:

“जब कोई किसी पर आरोप लगाता है, तो क्या आप उसे बस उठा लेंगे? हम इसकी अनुमति नहीं देंगे। यदि आपके पास उन पर संदेह करने के लिए कोई सामग्री थी, तो कानून में एक निर्धारित प्रक्रिया है… हमें इससे सरोकार नहीं है कि आरोप कितना गंभीर है, हमें प्रक्रिया से सरोकार है। संविधान कहता है कि कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन होना चाहिए।”

हिरासत में मारपीट के आरोपों पर अदालत ने कहा कि प्रताड़ना पूछताछ का जरिया नहीं हो सकती। पीठ ने आगे कहा, “आप आतंकवादी एंगल की जांच कर रहे होंगे, लेकिन अगर आप किसी को उठाते हैं, तो आपको प्रक्रिया का पालन करना होगा।”

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने अवैध हिरासत और प्रताड़ना के सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया। पुलिस ने अपनी जवाबी रिपोर्ट में इन आरोपों को “मनगढ़ंत और प्रेरित” बताते हुए कहा कि यह चल रही जांच को पटरी से उतारने की कोशिश है।

READ ALSO  हाई कोर्ट ने अभियोजन निदेशक अलका गोयल की नियुक्ति के खिलाफ जनहित याचिका पर दिल्ली सरकार, यूपीएससी से रुख मांगा

पुलिस के अनुसार, कार्यकर्ताओं को केवल जुलाई 2025 में दर्ज एक एफआईआर के संबंध में “वैध पूछताछ” के लिए बुलाया गया था। यह मामला एक ऐसी महिला की गुमशुदगी से जुड़ा है, जिसका कथित तौर पर माओवादी विचारधारा वाले व्यक्तियों द्वारा ‘ब्रेनवॉश’ किया गया था।

पुलिस ने यह भी आरोप लगाया कि ये कार्यकर्ता ‘भगत सिंह छात्र एकता मंच’ (BSCEM) जैसे संगठनों से जुड़े हैं, जो कथित तौर पर “देश विरोधी” और “नक्सलवादी” सामग्री के लिए मंच प्रदान करते हैं। पुलिस ने हलफनामे में दावा किया कि पूछताछ महिला कर्मचारियों की मौजूदगी में पेशेवर तरीके से की गई थी।

READ ALSO  पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने आईआईएम रोहतक के निदेशक की जांच पर अस्थायी रूप से रोक लगाई

कार्यकर्ताओं ने मांग की थी कि घटना के समय की CCTV फुटेज सुरक्षित रखी जाए। इस पर पुलिस ने बताया कि न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी स्थित स्पेशल सेल कार्यालय की फुटेज सुरक्षित है, लेकिन विजय नगर और मौरिस नगर जैसे विशिष्ट स्थानों की फुटेज उपलब्ध नहीं है।

साथ ही, पुलिस ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं ने शारीरिक हमले के दावों की पुष्टि के लिए कोई मेडिकल दस्तावेज या मेडिको-लीगल केस (MLC) पेश नहीं किया है।

शुरुआती रिपोर्ट से संतुष्ट न होते हुए हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया है कि अगली सुनवाई पर पूरी केस फाइल अदालत के समक्ष पेश की जाए। इस मामले की अगली सुनवाई 19 मई को होगी।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles