बिक्री समझौते पर साझा निष्कर्षों को बिना किसी विसंगति के नहीं बदला जा सकता; सुप्रीम कोर्ट ने विशिष्ट निष्पादन डिक्री बहाल की

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 100 के तहत अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए कोई भी हाईकोर्ट तब तक सबूतों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता और स्थापित तथ्यों को नहीं पलट सकता, जब तक कि वे निष्कर्ष पूरी तरह से अनुचित, साक्ष्यों के बिना या गंभीर कानूनी अवैधताओं से घिरे न हों। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के आदेशों को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को बहाल कर दिया है, जिसमें कुल बिक्री राशि का लगभग 93 प्रतिशत भुगतान कर चुके खरीदार के पक्ष में विशिष्ट निष्पादन (स्पेसिफिक परफॉर्मेंस) की डिक्री दी गई थी。

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद 19 मार्च 2010 को हुए एक बिक्री समझौते से शुरू हुआ था, जिसमें याचिकाकर्ता (क्रेता) ए. शाहुल हमीद ने प्रतिवादियों (विक्रेताओं) से सर्वे नंबर 75/1 के तहत आने वाली संपत्ति को कुल 9,30,000 रुपये में खरीदने पर सहमति जताई थी। याचिकाकर्ता ने अग्रिम राशि के रूप में 9,00,000 रुपये का एक बड़ा हिस्सा चुका दिया था और केवल 30,000 रुपये की मामूली राशि बची थी, जिसका भुगतान चार महीने के भीतर बिक्री विलेख (सेल डीड) के पंजीकरण के समय किया जाना था。

याचिकाकर्ता के अनुसार, उन्होंने सौदा पूरा करने के लिए जुलाई 2010 में विक्रेताओं से संपर्क किया, लेकिन विक्रेताओं ने कुछ और समय मांग लिया। दिसंबर 2010 तक प्रतिवादी इस मामले को टालने लगे, अधिक पैसों की मांग करने लगे और संपत्ति को किसी तीसरे पक्ष को बेचने की धमकी देने लगे। इसके बाद याचिकाकर्ता ने 1 फरवरी 2011 को एक औपचारिक कानूनी नोटिस जारी किया और बाद में होसुर के सबऑर्डिनेट जज की अदालत (ट्रायल कोर्ट) में विशिष्ट निष्पादन के लिए मुकदमा दायर कर दिया。

प्रतिवादियों ने इस मुकदमे का विरोध करते हुए दावा किया कि यह समझौता महज एक नाममात्र का “सुरक्षा दस्तावेज” (सिक्योरिटी डॉक्यूमेंट) था, जो कुछ “बेंगलुरु खरीदारों” के साथ 2009 के पिछले भूमि सौदे से जुड़ा हुआ था। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि उस पिछले सौदे की जमीन के एक हिस्से के मालिकाना हक में खामियां थीं, इसलिए वर्तमान समझौता उन खरीदारों के रिश्तेदार—याचिकाकर्ता—के पक्ष में पूरी तरह से वित्तीय सुरक्षा के तौर पर तैयार किया गया था। उन्होंने 9,00,000 रुपये प्राप्त करने की बात से इनकार किया और अनुबंध को पूरा करने के लिए याचिकाकर्ता की तत्परता और इच्छा पर भी सवाल उठाए。

ट्रायल कोर्ट ने 21 दिसंबर 2012 को याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए इस समझौते को वास्तविक माना और सुरक्षा के तर्क को पूरी तरह से असंभव खारिज कर दिया। हालांकि, 28 अगस्त 2014 को प्रथम अपीलीय अदालत ने इस डिक्री में संशोधन कर दिया; उसने समझौते को तो सही माना, लेकिन विशिष्ट निष्पादन की राहत देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि याचिकाकर्ता विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 की धारा 16(c) के तहत अपनी “तत्परता और इच्छा” साबित करने में विफल रहा, क्योंकि उसने चार महीने की संविदात्मक अवधि समाप्त होने के तुरंत बाद कानूनी नोटिस जारी नहीं किया था। अदालत ने केवल 6% ब्याज के साथ अग्रिम राशि वापस करने का आदेश दिया。

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25 जून 2025 को मद्रास हाईकोर्ट ने दूसरी अपील में एक कदम और आगे बढ़ते हुए ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के साझा निष्कर्षों को ही पलट दिया और कहा कि यह बिक्री समझौता वास्तव में केवल एक सुरक्षा व्यवस्था के रूप में किया गया था। हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों को 12% की बढ़ी हुई ब्याज दर के साथ 9,30,000 रुपये वापस करने का निर्देश दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया。

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत दोनों ने समझौते की प्रामाणिकता स्थापित करने के लिए मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया था। याचिकाकर्ता ने इस बात पर जोर दिया कि शुरुआत में ही कुल रकम का 93% हिस्सा चुका देना खरीदारी पूरी करने की उसकी निरंतर इच्छा का स्पष्ट प्रमाण था, और कानूनी सीमा अवधि (लिमिटेशन पीरियड) के भीतर कानूनी नोटिस भेजने में हुई मामूली देरी को उसके खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता。

प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने लेनदेन के अंतर्निहित स्वरूप की जांच करके बिल्कुल सही किया था। उन्होंने अपनी बात पर कायम रखते हुए कहा कि इस दस्तावेज को कभी भी वास्तविक बिक्री समझौते के रूप में लागू करने का इरादा नहीं था और यह पूरी तरह से एक सुरक्षा उपाय था, जिसे साबित करने के लिए उन्होंने एक कमजोर गवाही वाले और बिना लेखक के पुनर्खरीद विलेख (रिकॉन्वेयंस डीड) का हवाला दिया। उन्होंने यह भी दलील दी कि याचिकाकर्ता निर्धारित चार महीनों के भीतर अनुबंध को पूरा करने के लिए कोई सक्रिय कदम उठाने में विफल रहा था。

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने धारा 100 CPC के तहत हाईकोर्ट के अधिकारों की सीमाओं और विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 की धारा 16(c) के तहत तत्परता और इच्छा साबित करने के कानूनी मानकों को ध्यान में रखते हुए इस मामले का विश्लेषण किया。

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धारा 100 CPC के तहत हस्तक्षेप की सीमाएं

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि दूसरी अपील का अधिकार एक वैधानिक अधिकार है, कोई अंतर्निहित अधिकार नहीं, और यह पूरी तरह से कानून के महत्वपूर्ण सवालों तक ही सीमित है। कोर्ट ने नोट किया कि ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत ने गवाहों और लेखक के बयानों सहित सभी साक्ष्यों की बारीकी से जांच की थी और प्रतिवादियों की सुरक्षा वाली दलील को अविश्वसनीय पाया था। प्रतिवादी अपने दावों के समर्थन में उन “बेंगलुरु खरीदारों” को गवाह के तौर पर बुलाने में भी नाकाम रहे थे。

कोंडिबा दगादु कदम बनाम सावित्रीबाई सोपान गुजर मामले का हवाला देते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

“ऐसे मामले में जहां दी गई परिस्थितियों से दो निष्कर्ष निकालना संभव हो, वहां प्रथम अपीलीय अदालत द्वारा निकाला गया निष्कर्ष दूसरी अपील में हाईकोर्ट पर बाध्यकारी होता है। कोई भी दूसरा तरीका अपनाना स्वीकार्य नहीं है।”

हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करके एक पूरी तरह से नई कहानी गढ़ने की कोशिश की, जो कि गलत था, क्योंकि वह के शुरुआती आकलन में कोई अंतर्निहित विसंगति या गंभीर कानूनी अवैधता दिखाने में पूरी तरह असमर्थ रहा。

तत्परता और इच्छा की स्थापना

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता में तत्परता और इच्छा की कमी बताने के लिए प्रथम अपीलीय अदालत और हाईकोर्ट के निष्कर्षों की कड़ी आलोचना की। पीठ ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि याचिकाकर्ता कुल 9,30,000 रुपये की कीमत में से 9,00,000 रुपये पहले ही दे चुका था। इसे सीधे शब्दों में स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने कहा:

“अगर याचिकाकर्ता अनुबंध को पूरा करने का इच्छुक नहीं होता, तो वह बिक्री राशि का लगभग 93% हिस्सा कभी नहीं चुकाता।”

मधुकर निवृत्ति जगताप बनाम प्रमिलाबाई चंदूलाल परंडेकर मामले में दिए गए अपने पिछले फैसले का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कोई मुकदमा वैधानिक रूप से तय सीमा अवधि के भीतर दायर किया जाता है, तो ब्रिटेन के कड़े इक्विटी नियम भारत में लागू नहीं होते। कानूनी नोटिस भेजने में हुई थोड़ी सी देरी को स्वतः ही इच्छा की कमी नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब याचिकाकर्ता ने लगातार यह स्पष्ट किया हो कि प्रतिवादी खुद बार-बार समय मांग रहे थे और बाद में मामले को टालने लगे।

इसके अलावा, प्रतिवादियों ने कानूनी नोटिस मिलने की बात स्वीकार करने के बावजूद उसका कोई जवाब नहीं दिया था, जिससे उनके खिलाफ एक मजबूत प्रतिकूल धारणा बनती है。

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निर्णय

अपील को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के 25 जून 2025 के फैसले और प्रथम अपीलीय अदालत के 28 अगस्त 2014 के संशोधन आदेश को खारिज कर दिया। डिवीजन बेंच ने 21 दिसंबर 2012 के ट्रायल कोर्ट के मूल फैसले और डिक्री को पूरी तरह से बहाल कर दिया, जिसके तहत याचिकाकर्ता के पक्ष में बिक्री विलेख निष्पादित करने का निर्देश दिया गया है। सभी लंबित आवेदनों को भी इसके साथ ही समाप्त कर दिया गया。

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: ए. शाहुल हमीद बनाम एन. मल्लीगार्जुन और अन्य

वाद संख्या: सिविल अपील संख्या ______ 2026 (स्पेशल लीव पिटीशन (सिविल) संख्या 32390/2025)

पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस विपुल एम. पंचोली

निर्णय की तिथि: 27 मई 2026

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