पंजाब के होशियारपुर जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक पुरानी कार के कानूनी विवाद में फंसे होने और ब्लैकलिस्ट किए जाने के मामले में वाहन डीलर को खरीदार के पैसे लौटाने का आदेश दिया है। आयोग ने कहा कि सेकंड हैंड वाहन बेचने वाले डीलर की जिम्मेदारी है कि वह बिक्री से पहले उसके रजिस्ट्रेशन दस्तावेजों और कानूनी स्थिति की उचित जांच करे।
आयोग के अध्यक्ष नवीन पुरी और सदस्य हरविमल डोगरा तथा प्रेम सिंह सलारिया ने 21 अक्टूबर के आदेश में डीलर की ओर से जरूरी सावधानी नहीं बरतने को सेवा में कमी माना।
आयोग ने डीलर को कार की खरीद कीमत 2.51 लाख रुपये लौटाने और मुकदमे के खर्च के रूप में 7,500 रुपये देने का निर्देश दिया। यह भुगतान 45 दिनों के भीतर करना होगा। हालांकि, खरीद राशि की वापसी इस पुष्टि पर निर्भर करेगी कि वाहन अब भी डीलर के कब्जे में है।
सिर्फ बिचौलिया होने का दावा करके जिम्मेदारी से नहीं बच सकता डीलर
आयोग ने डीलर की इस दलील को खारिज कर दिया कि उसने केवल वाहन की खरीद-बिक्री में बिचौलिये की भूमिका निभाई थी।
आयोग ने कहा कि पुरानी गाड़ियों की खरीद-बिक्री करने वाले व्यवसायी से अपेक्षा की जाती है कि वह वाहन के दस्तावेजों और रजिस्ट्रेशन संबंधी जानकारी की उचित जांच करे। किसी कार के दस्तावेज सही होने का भरोसा दिलाने से पहले उसकी कानूनी स्थिति की पुष्टि करना भी जरूरी है।
आयोग ने पाया कि कार से जुड़ा विवाद जुलाई 2022 में हुई बिक्री से पहले की परिस्थितियों से संबंधित था। हालांकि, खरीदार को इस संबंध में दिसंबर 2022 में जानकारी मिली।
आयोग के अनुसार, वाहन के ब्लैकलिस्ट होने से खरीदार के लिए उसका इस्तेमाल करना मुश्किल हो गया था। हाईकोर्ट या संबंधित परिवहन प्राधिकरण से उसकी कानूनी स्थिति स्पष्ट होने तक वह बिना आशंका के कार नहीं चला सकता था।
आयोग ने माना कि वाहन की पिछली कानूनी स्थिति की उचित जांच नहीं करना और खरीदार को इस समस्या से मुक्त वाहन उपलब्ध नहीं कराना सेवा में कमी है।
कार खरीदने के पांच महीने बाद मिला ब्लैकलिस्ट होने का नोटिस
मामले में 42 वर्षीय शिकायतकर्ता ने जुलाई 2022 में एक अधिकृत डीलर से लगभग 2.51 लाख रुपये में पुरानी कार खरीदी थी। डीलर ने भरोसा दिलाया था कि कार अच्छी स्थिति में है और उसके सभी दस्तावेज सही हैं। वाहन का पिछला मालिक लुधियाना का निवासी था।
लेकिन 6 दिसंबर 2022 को वाहन पंजीकरण प्राधिकरण, अहमदगढ़ से शिकायतकर्ता को एक पत्र मिला। इसमें बताया गया कि पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश के तहत कार को ब्लैकलिस्ट किया गया है। हाईकोर्ट में लंबित मामले के संबंध में वाहन को जांच और सत्यापन के लिए पेश करने को कहा गया था।
शिकायतकर्ता ने डीलर से संपर्क किया, जिसने कथित तौर पर एक महीने में समस्या सुलझाने का आश्वासन दिया। हालांकि, मामला लगातार टलता रहा।
मार्च 2023 में डीलर के प्रतिनिधियों ने शिकायतकर्ता से कार अपने परिसर में लाने को कहा, क्योंकि उसे हाईकोर्ट में पेश किया जाना था। इसके बाद शिकायतकर्ता ने वाहन डीलर को सौंप दिया।
30 सितंबर 2023 को डीलर ने कानूनी नोटिस भेजकर कार को 2,51,700 रुपये में वापस खरीदने की पेशकश की।
शिकायतकर्ता ने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। उसका कहना था कि कार पर उसका कुल खर्च 3.20 लाख रुपये से अधिक हो चुका था। इसके बाद उसने आयोग में शिकायत दाखिल कर ब्याज और मुआवजे सहित 3.20 लाख रुपये की मांग की।
शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता ए एस मिन्हास ने पैरवी की।
डीलर ने कहा, रजिस्ट्रेशन ट्रांसफर के समय कोई आपत्ति नहीं थी
डीलर की ओर से अधिवक्ता डी डी एस नैय्यर ने आरोपों का विरोध किया। उनका तर्क था कि कार का रजिस्ट्रेशन शिकायतकर्ता के नाम सफलतापूर्वक ट्रांसफर हुआ था और नया रजिस्ट्रेशन प्रमाणपत्र भी जारी किया गया था।
इससे स्पष्ट होता है कि स्वामित्व हस्तांतरण के समय परिवहन विभाग की ओर से कोई आपत्ति नहीं थी। ऐसे में बाद की परिस्थितियों के लिए डीलर को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
डीलर ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता कार उसके परिसर में छोड़ने के बाद दोबारा संपर्क में नहीं आया।
डीलर के वकील ने दलील दी कि वाहन एक वर्ष से अधिक समय तक इस्तेमाल हो चुका था। इसके बावजूद सद्भावना के तौर पर कार वापस खरीदने की पेशकश की गई, लेकिन शिकायतकर्ता ने उसे ठुकरा दिया।
डीलर ने सेवा में कमी, लापरवाही और अनुचित व्यापार व्यवहार के आरोपों से इनकार किया।
अतिरिक्त खर्च का पूरा प्रमाण नहीं दे सका शिकायतकर्ता
आयोग ने पाया कि डीलर यह साबित नहीं कर सका कि शिकायतकर्ता कार को उसके परिसर में छोड़ने के बाद दोबारा निजी इस्तेमाल के लिए ले गया था।
हालांकि, आयोग ने यह भी पाया कि शिकायतकर्ता ने खरीद कीमत के अतिरिक्त खर्च की पूरी जानकारी और उसके समर्थन में रसीदें पेश नहीं की थीं।
इसी आधार पर आयोग ने शिकायतकर्ता की 3.20 लाख रुपये की पूरी मांग स्वीकार करने के बजाय कार की खरीद कीमत 2.51 लाख रुपये लौटाने का आदेश दिया।
साथ ही डीलर को मुकदमे के खर्च के रूप में 7,500 रुपये देने का निर्देश दिया गया। खरीद कीमत की वापसी के लिए यह पुष्टि आवश्यक होगी कि कार अब भी डीलर के कब्जे में है।
