सुप्रीम कोर्ट ने शादी के झांसे में शारीरिक शोषण के आरोप से जुड़े एक आपराधिक मामले को रद्द करते हुए स्पष्ट किया है कि जब दो पक्ष लंबे समय तक आपसी सहमति से रिश्ते में रहे हों, तो उनमें से किसी एक पर आपराधिक दायित्व नहीं थोपा जा सकता। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने बिलासपुर की एक अदालत में लंबित आपराधिक कार्यवाही को खारिज करते हुए टिप्पणी की कि वर्षों के प्रेम संबंध के बाद शादी का प्रस्ताव टूट जाना सहमति को दूषित नहीं करता, और आपराधिक मुकदमेबाजी को दबाव बनाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के सिरगिट्टी थाने में दर्ज एफआईआर संख्या 191/2025 से जुड़ा है, जो दूसरी प्रतिवादी के बयान पर दर्ज कराई गई थी। शिकायतकर्ता एक इंजीनियरिंग ग्रेजुएट है और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही थी। उसकी मुलाकात एक कोचिंग अकादमी में अपीलकर्ता से हुई थी, जहां दोनों पढ़ाई कर रहे थे।
दोनों के बीच प्रेम संबंध बन गया और आगे चलकर दोनों के परिवारों के बीच शादी को लेकर बातचीत भी हुई। इस सहमति पर कि दोनों शादी करेंगे, अपीलकर्ता शिकायतकर्ता के घर आने-जाने लगा, जहां वह अपनी मां और भाई के साथ रहती थी। जब घर पर कोई नहीं होता था, तब दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने और यह सिलसिला करीब तीन साल तक चलता रहा। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि जब भी उसकी मां शहर से बाहर होती थी, अपीलकर्ता उसके घर आता था। इस पर कोर्ट ने गौर किया कि मां के बाहर जाने की जानकारी निश्चित रूप से शिकायतकर्ता ने खुद ही दी होगी, क्योंकि यह नहीं माना जा सकता कि अपीलकर्ता उसके घर पर लगातार नजर रख रहा था।
समय बीतने के साथ दोनों का रिश्ता खत्म हो गया और दोनों परिवारों के बीच चल रही शादी की बातचीत भी टूट गई। इसके बाद शिकायतकर्ता ने आपराधिक मामला दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि अपीलकर्ता ने शादी का झांसा देकर उसका शारीरिक शोषण किया और बाद में शादी करने से इनकार कर दिया। उसने यह भी कहा कि बिलासपुर के महिला थाना काउंसिलिंग सेंटर में अपीलकर्ता ने उससे शादी करने की सहमति दी थी, लेकिन बाद में उसने इसका पालन नहीं किया।
अदालत में दलीलें
सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता की ओर से वकील डॉ. राजेश पांडे पेश हुए, जबकि राज्य सरकार की ओर से स्टैंडिंग काउंसिल विनायक शर्मा ने पक्ष रखा। सिरगिट्टी थाने के सहायक उप-निरीक्षक के जरिए नोटिस तामील होने के बावजूद दूसरी प्रतिवादी की ओर से कोई भी अदालत में उपस्थित नहीं हुआ।
पूर्व के फैसलों का हवाला
अपीलकर्ता पर आपराधिक दायित्व तय करने के कानूनी पहलू की समीक्षा करते हुए पीठ ने दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य (2013) 7 एससीसी 675 के फैसले का उल्लेख किया और उसके पैरा 24 को उद्धृत किया:
“24. इसलिए, यह स्पष्ट है कि इस बात के पर्याप्त साक्ष्य होने चाहिए कि संबंधित समय पर, यानी शुरुआत में ही, आरोपी का पीड़िता से शादी का वादा निभाने का कोई इरादा नहीं था। बेशक, ऐसी परिस्थितियां हो सकती हैं जब कोई व्यक्ति नेक इरादे के बावजूद विभिन्न अपरिहार्य कारणों से पीड़िता से शादी करने में असमर्थ हो। किसी भविष्य की अनिश्चित तारीख के लिए किए गए वादे को पूरा न कर पाना, जिसके कारण उपलब्ध साक्ष्यों से बहुत स्पष्ट नहीं हैं, हमेशा तथ्य की गलतफहमी नहीं माना जा सकता। ‘तथ्य की गलतफहमी’ के दायरे में आने के लिए, उस तथ्य की तत्काल प्रासंगिकता होनी चाहिए। ऐसी स्थिति में लड़की के कृत्य को पूरी तरह से माफ करने और दूसरे पक्ष पर आपराधिक दायित्व थोपने के लिए आईपीसी की धारा 90 का सहारा नहीं लिया जा सकता, जब तक कि अदालत इस बात से संतुष्ट न हो जाए कि आरोपी का शुरू से ही उससे शादी करने का कोई इरादा नहीं था।”
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
इस कानूनी सिद्धांत को वर्तमान मामले के तथ्यों पर लागू करते हुए पीठ ने माना कि काउंसिलिंग सेंटर के सामने दिया गया कथित वचन “आपराधिक मुकदमे के डर से दिया गया होगा, जो वैसे भी कानूनी रूप से लागू करने योग्य नहीं है।” अदालत ने आगे कहा कि इस तरह के वचन को “शादी का वादा नहीं माना जा सकता, क्योंकि तब तक दोनों के बीच तीन साल का प्रेम संबंध था, जिसके दौरान दूसरी प्रतिवादी ने स्वेच्छा से शारीरिक संबंध बनाने की अनुमति दी थी। स्पष्ट रूप से यह सहमति किसी दबाव या गलतबयानी के कारण नहीं थी।”
आपराधिक कानून के तहत सहमति के मानक पर जोर देते हुए पीठ ने कहा:
“हम उपरोक्त उद्धरण में तय सिद्धांत को दोहराते हैं कि जब दोनों पक्ष आपसी सहमति से रिश्ते में थे और दूसरे पक्ष ने स्वेच्छा से शारीरिक संबंध की अनुमति दी थी, तब किसी एक पक्ष पर आपराधिक दायित्व थोपने के लिए डर या गलतफहमी में दी गई सहमति का ढीले ढंग से निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।”
शिकायत की समीक्षा करते हुए अदालत ने पाया कि शुरुआत में शादी का झूठा वादा करने का कोई साक्ष्य नहीं है और यह आरोप बाद की सोच प्रतीत होता है:
“शिकायत को सरसरी तौर पर पढ़ने से भी शादी का कोई स्पष्ट आश्वासन या वादा नजर नहीं आता, क्योंकि विशिष्ट आरोप यह है कि उन्होंने प्रेम प्रसंग के बाद सभी परिणामों को जानते हुए शारीरिक संबंध बनाए, जिसे अब शादी के बहाने का नाम दिया जा रहा है; जो स्पष्ट रूप से बाद की सोच है।”
अदालत ने शिकायतकर्ता की शैक्षिक पृष्ठभूमि और उसके आचरण का भी संज्ञान लिया, जिसमें उसने कहा था कि यदि अपीलकर्ता उससे शादी कर ले तो वह केस वापस ले लेगी। इस तरह के दबाव को खारिज करते हुए पीठ ने कहा:
“दूसरी प्रतिवादी एक पढ़ी-लिखी महिला है, जिसने सहमति से रिश्ता बनाया और इसे तीन साल तक जारी रखा, जो कथित तौर पर शादी के बहाने था और कभी सफल नहीं हुआ। वह स्पष्ट रूप से कहती है कि यदि वह उससे शादी कर लेता है तो वह आरोप वापस ले लेगी। एक आपराधिक मुकदमे को अनुचित दबाव बनाने का हथियार नहीं बनाया जा सकता।”
अपीलकर्ता के दायित्व पर निष्कर्ष देते हुए पीठ ने कहा:
“हम अपीलकर्ता पर कोई आपराधिक दायित्व नहीं पाते, जिसने दूसरी प्रतिवादी के साथ सहमति से संबंध बनाए थे, और इस सहमति को किसी दबाव या गलतबयानी से हासिल की गई नहीं कहा जा सकता।”
अदालत का निर्णय
आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने का कोई औचित्य न पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली।
अदालत ने न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, बिलासपुर के समक्ष दाखिल चार्जशीट संख्या 199/2025 (दिनांक 17 जून 2025) को रद्द कर दिया, जो बाद में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट), बिलासपुर के समक्ष सत्र वाद संख्या 216/2025 के रूप में लंबित थी। पीठ ने निर्देश दिया कि सत्र वाद संख्या 216/2025 की सभी कार्यवाही बंद मानी जाएगी और सभी लंबित अर्जियों को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मार्तण्ड सिंह बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 4722 वर्ष 2026
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 01 अक्टूबर 2026

