उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (UPSLSA) ने स्कूली बच्चों को POCSO कानून, बाल संरक्षण और 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति के साथ संबंधों से जुड़े कानूनी परिणामों के बारे में जागरूक करने के लिए राज्यव्यापी विशेष अभियान शुरू किया है।
यह अभियान सुप्रीम कोर्ट के जज और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के कार्यकारी अध्यक्ष जस्टिस विक्रम नाथ के नेतृत्व में, इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और UPSLSA के मुख्य संरक्षक चीफ जस्टिस अरुण भंसाली तथा इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ जज और UPSLSA के कार्यकारी अध्यक्ष जस्टिस अरिंदम सिन्हा के मार्गदर्शन में शुरू किया गया है।

इस विशेष अभियान की शुरुआत 25 सितंबर 2026 को पूरे उत्तर प्रदेश में की गई। पहले चरण में राज्य के सभी जिलों में न्यायिक अधिकारियों ने स्कूलों का दौरा किया और मॉर्निंग असेंबली में छात्रों को POCSO अधिनियम, 2012 के प्रावधानों और इसके उल्लंघन के कानूनी परिणामों के बारे में बताया। अधिकारियों ने छात्रों से सीधे संवाद किया, बाल संरक्षण कानून के महत्वपूर्ण पहलुओं को समझाया और उनके सवालों के जवाब भी दिए।

सहमति, प्रेम या शादी का इरादा कानूनी बचाव नहीं
प्राधिकरण के अनुसार, इस अभियान को शुरू करने के पीछे एक बड़ी वजह ऐसे मामलों की बढ़ती संख्या है, जिनमें किशोर और युवा पुरुष POCSO कानून के तहत आरोपी बन रहे हैं। कई मामलों में कानून की जानकारी का अभाव और यह गलत धारणा सामने आती है कि नाबालिग की सहमति, प्रेम, दोस्ती या शादी करने का इरादा कानूनी बचाव बन सकता है।

अभियान का उद्देश्य इसी भ्रम को दूर करना है। छात्रों और युवाओं को बताया जा रहा है कि कानून की नजर में नाबालिग की सहमति की कोई वैधता नहीं है और ऐसे मामलों में गंभीर दंडात्मक परिणाम हो सकते हैं। खास तौर पर किशोर लड़कों और युवा पुरुषों को 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति के साथ संबंधों के कानूनी नतीजों के बारे में संवेदनशील बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
हिंदी प्रेस नोट के अनुसार, अभियान के अंतिम चरण में गांधी जयंती के अवसर पर छात्रों द्वारा प्रभात फेरी, नुक्कड़ नाटक, ड्राइंग और पेंटिंग प्रतियोगिता जैसे कार्यक्रम भी प्रस्तावित हैं।

चीफ जस्टिस अरुण भंसाली ने कानूनी जानकारी पर दिया जोर
चीफ जस्टिस अरुण भंसाली ने कहा कि बड़ी संख्या में युवा इस बात से अनजान रहते हैं कि कानून 18 वर्ष से कम उम्र के प्रत्येक व्यक्ति को विशेष संरक्षण देता है।
उन्होंने कहा कि कुछ कृत्य युवाओं को भले ही सामान्य, सहमति से किए गए या मामूली लगें, लेकिन यदि उनमें कोई बच्चा शामिल है तो उनके गंभीर कानूनी परिणाम हो सकते हैं।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि POCSO कानून के प्रावधानों की जानकारी बच्चों को यौन शोषण और उत्पीड़न से बचाने के साथ-साथ युवाओं को कानून की जानकारी न होने के कारण आपराधिक कार्यवाही में फंसने से रोकने के लिए भी जरूरी है।

जस्टिस अरिंदम सिन्हा बोले, जागरूकता सबसे मजबूत सुरक्षा
उत्तर प्रदेश के बच्चों के लिए अपने संदेश में जस्टिस अरिंदम सिन्हा ने कहा कि जागरूकता शोषण और कानून के उल्लंघन से बचाव का मजबूत माध्यम है।
उन्होंने बताया कि कानून के तहत 18 वर्ष से कम उम्र का प्रत्येक व्यक्ति बच्चा माना जाता है और POCSO कानून की जानकारी का अभाव बच्चों, किशोरों और उनके परिवारों के लिए गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।
उन्होंने छात्रों से अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों को समझने, व्यक्तिगत सीमाओं का सम्मान करने और जरूरत पड़ने पर विधिक सहायता प्रणाली तथा बाल संरक्षण तंत्र के माध्यम से मदद लेने की अपील की।
हर जिले में मॉनिटरिंग कमेटी
यह अभियान जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों के माध्यम से शैक्षणिक संस्थानों, जिला प्रशासन, पुलिस, बाल संरक्षण एजेंसियों और अन्य संबंधित संस्थाओं के समन्वय से चलाया जा रहा है।
राज्यभर में कार्यक्रम की निगरानी और समन्वय के लिए जिला स्तर पर समितियां बनाई गई हैं। इनमें जिला जज या DLSA के अध्यक्ष, जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक शामिल हैं।
अभियान को केवल एक बार की गतिविधि तक सीमित न रखकर लगातार चलने वाली जागरूकता पहल बनाने के लिए स्कूलों में नोडल अधिकारी भी नामित किए जा रहे हैं। इन अधिकारियों को अभियान के उद्देश्यों और POCSO कानून के प्रमुख प्रावधानों के बारे में जरूरी मार्गदर्शन दिया जा रहा है।
लाखों छात्रों तक पहुंचने का लक्ष्य
UPSLSA को उम्मीद है कि यह पहल उत्तर प्रदेश के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के लाखों छात्रों तक पहुंचेगी। इसके जरिए बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों, शिक्षकों और समाज के अन्य वर्गों में भी बाल संरक्षण कानूनों को लेकर जागरूकता बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।
प्राधिकरण ने साफ किया है कि अभियान का मुख्य उद्देश्य रोकथाम और शिक्षा है। बच्चों और युवाओं को कानून के बारे में सरल, स्पष्ट और सही जानकारी देकर एक ओर उन्हें शोषण से बचाने और दूसरी ओर कानून की जानकारी के अभाव में युवाओं के आपराधिक कार्यवाही में फंसने की आशंका को कम करने की कोशिश की जा रही है।

