पंजाब के एक उपभोक्ता आयोग ने एक निजी बीमा कंपनी को 76 वर्षीय व्यक्ति को घुटना बदलने की सर्जरी के बीमा दावे के रूप में ₹1.81 लाख का भुगतान करने का निर्देश दिया है। बीमा कंपनी ने यह कहते हुए क्लेम खारिज कर दिया था कि घुटनों की बीमारी पहले से मौजूद थी और पॉलिसी लेते समय इसकी जानकारी नहीं दी गई थी।
जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, मोगा ने कहा कि बीमा कंपनी ऐसा कोई मेडिकल रिकॉर्ड पेश नहीं कर सकी जिससे यह साबित हो कि शिकायतकर्ता को पॉलिसी लेने से पहले इस बीमारी का पता था या उसका इलाज चल रहा था।
आयोग की अध्यक्ष अपर्णा कुंडी और सदस्य मोहिंदर सिंह बराड़ तथा प्रीति मल्होत्रा की बेंच ने वरिष्ठ नागरिक को हुई परेशानी के लिए ₹8,000 मुआवजा और मुकदमे का खर्च देने का भी निर्देश दिया।
पुरानी बीमारी साबित करने वाला रिकॉर्ड नहीं
बीमा कंपनी ने एक्स-रे रिपोर्ट के आधार पर बीमारी को पुरानी और लंबे समय से चली आ रही बताते हुए क्लेम खारिज किया था। आयोग ने 1 सितंबर के आदेश में कहा कि केवल इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि बीमारी पॉलिसी शुरू होने से पहले मौजूद थी या बीमित व्यक्ति ने जानबूझकर इसकी जानकारी छिपाई थी।
आयोग ने पाया कि बीमा कंपनी ने ऐसी कोई पुरानी मेडिकल रिपोर्ट, डॉक्टर की पर्ची, जांच रिपोर्ट या इलाज से जुड़ा रिकॉर्ड पेश नहीं किया, जिससे यह साबित हो सके कि शिकायतकर्ता को पहले से इस बीमारी की जानकारी थी।
आयोग ने कहा कि केवल एक्स-रे रिपोर्ट में बीमारी को पुरानी या लंबे समय से मौजूद बताने के आधार पर बीमा दावा खारिज नहीं किया जा सकता।
घुटना बदलने की सर्जरी पर खर्च हुए ₹2.63 लाख
मोगा निवासी 76 वर्षीय शिकायतकर्ता ने बीमा कंपनी की Senior Citizen Red Carpet Health Insurance Policy ले रखी थी।
24 नवंबर 2024 को वह दोनों घुटनों की समस्या के इलाज के लिए जालंधर के Sud Hospital पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने सर्जरी की सलाह दी। उन्हें 12 दिसंबर 2024 को अस्पताल में भर्ती किया गया और 13 दिसंबर को दोनों घुटनों की रिप्लेसमेंट सर्जरी की गई। 17 दिसंबर को उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
इलाज पर कुल ₹2.63 लाख खर्च हुए, जिसके बाद उन्होंने बीमा कंपनी के समक्ष भुगतान के लिए दावा पेश किया।
बीमा कंपनी ने अपनी मेडिकल जांच और एक्स-रे रिपोर्ट के आधार पर दावा खारिज कर दिया। कंपनी का कहना था कि घुटनों की बीमारी लंबे समय से थी और पॉलिसी शुरू होने से पहले से मौजूद थी, लेकिन प्रस्ताव फॉर्म में इसकी जानकारी नहीं दी गई थी।
बीमा कंपनी ने बीमारी छिपाने का आरोप लगाया
उपभोक्ता आयोग के सामने बीमा कंपनी ने दलील दी कि शिकायतकर्ता ने पॉलिसी लेते समय अपनी स्वास्थ्य स्थिति से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई थी, इसलिए वह बीमा राशि पाने का हकदार नहीं था।
कंपनी ने कहा कि Senior Citizen Red Carpet Policy में केवल उन्हीं पहले से मौजूद बीमारियों को कवर किया जाता है जिनकी जानकारी पॉलिसी लेते समय स्पष्ट रूप से दी गई हो।
बीमा कंपनी ने पॉलिसी की 30 प्रतिशत को-पेमेंट शर्त और अन्य नियमों का भी हवाला दिया।
कंपनी ने यह भी कहा कि विवाद में जटिल प्रश्न शामिल हैं, जिन्हें उपभोक्ता कार्यवाही में तय नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर शिकायत खारिज करने की मांग की गई।
शिकायतकर्ता ने आयोग से ₹2.63 लाख की मेडिकल राशि, मानसिक उत्पीड़न और सेवा में कमी के लिए ₹1 लाख मुआवजा तथा ₹50,000 मुकदमे के खर्च के रूप में दिलाने की मांग की थी।
24 महीने की वेटिंग पीरियड भी हो चुकी थी पूरी
आयोग ने पाया कि बीमा पॉलिसी लगातार रिन्यू हो रही थी और विवादित क्लेम पॉलिसी के तीसरे वर्ष में आया था।
आयोग ने यह भी नोट किया कि संबंधित बीमारी और प्रक्रिया के लिए पॉलिसी में 24 महीने की वेटिंग पीरियड थी, जो क्लेम आने तक पूरी हो चुकी थी।
आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि शिकायतकर्ता द्वारा कराया गया इलाज पॉलिसी के दायरे में आता था और वह पॉलिसी की शर्तों के अनुसार स्वीकार्य मेडिकल खर्च के भुगतान का हकदार था।
इसके बाद आयोग ने बीमा कंपनी को ₹1.81 लाख का भुगतान करने के साथ वरिष्ठ नागरिक को हुई परेशानी के लिए ₹8,000 मुआवजा और मुकदमे का खर्च देने का निर्देश दिया।

