सत्य निकेतन बिल्डिंग हादसा: दिल्ली हाईकोर्ट में पक्षकार बनने पहुंचीं किरण बेदी, कोर्ट ने कहा- उनके लंबे प्रशासनिक अनुभव का लिया जा सकता है लाभ

दिल्ली के सत्य निकेतन में बिल्डिंग गिरने से सात लोगों की मौत के मामले में रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी और पुडुचेरी की पूर्व उपराज्यपाल किरण बेदी ने गुरुवार को दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। उन्होंने मामले में हस्तक्षेप करते हुए पक्षकार बनाए जाने की मांग की है।

चीफ जस्टिस डी के उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने कहा कि बेदी इस मामले में केवल कोर्ट की सहायता करना चाहती हैं और उनके लंबे प्रशासनिक अनुभव का लाभ लिया जा सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि मामला व्यापक जनहित से जुड़ा है।

केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) की ओर से पेश अपर सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने बेदी की अर्जी का विरोध किया और इस पर आपत्ति दाखिल करने के लिए समय मांगा।

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इस पर बेंच ने सवाल किया कि अधिकारी क्या जवाब दाखिल करेंगे। कोर्ट ने कहा कि बेदी देश की एक जागरूक नागरिक हैं और उनके पास प्रशासनिक अनुभव है। मामला व्यापक जनहित से जुड़ा है और वह केवल कोर्ट की सहायता के उद्देश्य से हस्तक्षेप करना चाहती हैं।

अपर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि वह किरण बेदी का बहुत सम्मान करते हैं, लेकिन उनकी हस्तक्षेप अर्जी से ऐसा प्रतीत होता है कि वह मामले को पहले ही तय मानकर चल रही हैं, जबकि संबंधित अधिकारियों की स्टेटस रिपोर्ट अभी दाखिल होनी बाकी है।

कोर्ट ने अधिकारियों से कहा कि वे बेदी की अर्जी को विरोधात्मक नजरिए से न देखें। बेंच ने उन्हें जवाब दाखिल करने के लिए तीन दिन का समय दिया और बेदी की अर्जी को मुख्य मामले के साथ 25 सितंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया।

सत्य निकेतन हादसे में सात लोगों की मौत

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दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के पास सत्य निकेतन स्थित यह बिल्डिंग 6 सितंबर को मरम्मत का काम चलने के दौरान गिर गई थी। यहां लड़कों के लिए पेइंग गेस्ट (पीजी) आवास संचालित किया जा रहा था।

हादसे में सात लोगों की मौत हो गई थी, जबकि कई अन्य घायल हुए थे।

हाईकोर्ट ने एमसीडी को दिया था उच्चस्तरीय जांच का निर्देश

दिल्ली हाईकोर्ट ने 7 सितंबर को इस हादसे का संज्ञान लेते हुए एमसीडी को बिल्डिंग गिरने की घटना की उच्चस्तरीय जांच कराने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।

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हाईकोर्ट ने घटना पर गंभीर चिंता जताते हुए दिल्ली यूनिवर्सिटी या सरकार द्वारा संचालित हॉस्टलों सहित अपर्याप्त आवास सुविधाओं और छात्रों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को उठाया था।

कोर्ट ने पीजी सुविधाओं को नियंत्रित करने के लिए एमसीडी और अन्य संबंधित अधिकारियों द्वारा अपनाए जा रहे उपायों को भी पर्याप्त नहीं माना था।

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