बॉम्बे हाईकोर्ट ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के एक प्रोफेसर की अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश रद्द कर दिया है। प्रोफेसर पर करियर और प्लेसमेंट से जुड़ी जानकारी साझा करने के लिए व्हाट्सऐप ग्रुप बनाने और संस्थान के लोगो का इस्तेमाल करने का आरोप था। हाईकोर्ट ने कहा कि निजी आर्थिक लाभ का कोई निष्कर्ष सामने आए बिना केवल व्हाट्सऐप ग्रुप बनाना या उसका सदस्य होना इतनी कठोर सजा का आधार नहीं बन सकता।
जस्टिस एम एस कार्णिक और जस्टिस संदेश डी पाटिल की बेंच ने 57 वर्षीय डॉ. स्वपन गरैन की याचिका स्वीकार करते हुए TISS को उनकी सेवा समाप्ति की तारीख से सेवानिवृत्ति की तारीख तक 50 प्रतिशत पिछला वेतन देने का निर्देश दिया। उन्हें सेवा की निरंतरता और उससे जुड़े सभी परिणामी लाभ भी मिलेंगे।
हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्ति लाभों की दोबारा गणना करने और यदि कोई बकाया राशि बनती है तो आदेश अपलोड होने की तारीख से तीन महीने के भीतर उसका भुगतान करने का भी निर्देश दिया।
निजी आर्थिक लाभ का कोई सबूत नहीं मिला
गरैन पर संस्थान की अनुमति के बिना “TISSians Career Impact2” नाम से व्हाट्सऐप ग्रुप बनाने और उसमें TISS के आधिकारिक लोगो का इस्तेमाल करने का आरोप था। संस्थान का कहना था कि यह ग्रुप वास्तव में एक समानांतर प्लेसमेंट सेवा की तरह काम कर रहा था, जिसके जरिए छात्रों और पूर्व छात्रों से निजी लाभ के लिए संपर्क किया जा रहा था।
हाईकोर्ट को, हालांकि, ऐसा कोई आधार नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि गरैन प्लेसमेंट सेवाओं के लिए पैसे ले रहे थे या ग्रुप के जरिए कथित रूप से जुटाई गई कोई रकम उनके निजी फायदे के लिए इस्तेमाल हुई।
बेंच ने कहा कि व्हाट्सऐप एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है और केवल व्हाट्सऐप ग्रुप शुरू करना या उसका सदस्य होना, जब याचिकाकर्ता को निजी लाभ मिलने का कोई निष्कर्ष न हो, अनिवार्य सेवानिवृत्ति जैसी सजा को उचित नहीं ठहरा सकता। कोर्ट ने इस सजा को अत्यधिक असंगत माना।
हाईकोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि गरैन ने शुरुआत में TISS के लोगो का इस्तेमाल किया था, लेकिन बाद में उसे हटा दिया था।
व्हाट्सऐप चैट से समानांतर प्लेसमेंट कारोबार साबित नहीं हुआ
अनुशासनात्मक कार्रवाई में जिन व्हाट्सऐप बातचीत पर भरोसा किया गया था, उनकी जांच के बाद बेंच ने पाया कि ग्रुप बनाया जाना सामान्य गतिविधि का हिस्सा था और इससे यह साबित नहीं होता कि गरैन पैसे लेकर प्लेसमेंट सेवा चला रहे थे।
कोर्ट ने विशेष रूप से 23 फरवरी 2016 की एक चैट का उल्लेख किया, जो मुंबई में कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) से जुड़े अवसर के बारे में थी। बेंच ने पाया कि संदेश ऐसे लोगों के लिए था जो इस अवसर में रुचि रखते हों। संदेश भेजने वाला व्यक्ति स्वयं आवेदन नहीं करना चाहता था, लेकिन उसने यह जानकारी ग्रुप के दूसरे सदस्यों के लिए उपयोगी मानते हुए साझा की थी।
ग्रुप में भारत सरकार की ऑनलाइन सेवाओं से संबंधित जानकारी भी साझा की गई थी और यह विभिन्न स्ट्रीम के “TISSians” के लिए था।
हाईकोर्ट ने माना कि गरैन ने ग्रुप बनाने से पहले TISS की अनुमति नहीं ली थी, लेकिन केवल इस प्रक्रियागत चूक के आधार पर इतनी कठोर और असंगत सजा नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने समानांतर प्लेसमेंट सेवा चलाए जाने संबंधी निष्कर्ष को “पूरी तरह विकृत” बताया।
TISS ने सेवा नियमों के उल्लंघन का लगाया था आरोप
TISS का कहना था कि गरैन का आचरण संस्थान के कर्मचारियों पर लागू आचार संहिता का उल्लंघन था। संस्थान के मुताबिक बिना अनुमति आधिकारिक लोगो का इस्तेमाल उसके बौद्धिक संपदा अधिकारों का उल्लंघन था। साथ ही, प्लेसमेंट से जुड़ी सेवा चलाना पूर्णकालिक स्थायी फैकल्टी सदस्य के लिए सेवा नियमों के तहत प्रतिबंधित व्यवसाय में शामिल होने के समान था।
संस्थान ने यह भी आरोप लगाया था कि गरैन ने अपनी सेवा शर्तों का उल्लंघन करते हुए TISS के संसाधनों, ज्ञान और सूचनाओं का इस्तेमाल किया और उनका आचरण सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत आपराधिक अपराध भी बनता है।
TISS के डायरेक्टर और अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने गरैन को 29 मार्च 2016 को निलंबित कर दिया था। अनुशासनात्मक कार्यवाही के बाद 6 सितंबर 2017 को उन्हें अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त कर दिया गया।
प्रोफेसर ने जांच और सजा दोनों को दी थी चुनौती
गरैन की ओर से पेश एडवोकेट जयप्रकाश सावंत ने अनुशासनात्मक जांच और सजा दोनों को चुनौती दी। उन्होंने दलील दी कि जांच निष्पक्ष नहीं थी और उसके निष्कर्ष भी विकृत थे। उनके मुताबिक पूरा मामला मुख्य रूप से करियर के अवसरों से संबंधित कुछ व्हाट्सऐप पोस्ट से जुड़ा था।
सावंत ने यह भी कहा कि गरैन पीएचडी छात्रों के गाइड रहे थे और उनके खिलाफ की गई कार्रवाई से उनका करियर बर्बाद हो गया।
TISS और अन्य संबंधित पक्षों की ओर से पेश एडवोकेट ध्रुव गांधी ने कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि गरैन को दी गई सजा साबित आरोपों के अनुरूप थी। उन्होंने दलील दी कि व्हाट्सऐप बातचीत में ग्रुप के सदस्यों से धन जुटाने की अपील दिखाई देती है। नौकरी के अवसर साझा किए जा रहे थे और सदस्यों या नौकरी चाहने वालों को आमंत्रित किया जा रहा था। उन्होंने यह भी कहा कि प्रोफेसर यह साबित नहीं कर सके कि उन्होंने ऐसा ग्रुप बनाने के लिए TISS से अनुमति ली थी।
हाईकोर्ट ने अंततः पाया कि गरैन ने बिना पूर्व अनुमति के ग्रुप जरूर बनाया था, लेकिन ऐसा कोई निष्कर्ष नहीं था कि कथित रूप से जुटाई गई धनराशि का इस्तेमाल उन्होंने अपने निजी लाभ के लिए किया। इसी आधार पर कोर्ट ने उनकी अनिवार्य सेवानिवृत्ति रद्द करते हुए 50 प्रतिशत पिछला वेतन, सेवा की निरंतरता और सभी परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया।

