राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (सीपीसी) के आदेश XXIII नियम 3A के तहत राजीनामा डिक्री के विरुद्ध अलग से वाद दायर करने पर लगाई गई वैधानिक रोक केवल वाद या समझौते के पक्षकारों पर लागू होती है, और यह रोक स्वतंत्र अधिकार का दावा करने वाले किसी तीसरे पक्ष (स्ट्रेंजर) को नया दीवानी मुकदमा दायर करने से वंचित नहीं करती। जस्टिस सुदेश बंसल की एकलपीठ ने माना कि यदि वाद का कोई मूल पक्षकार समझौते पर विवाद उठाता है, तो उसे सीपीसी के आदेश XXIII नियम 3 के परंतुक के तहत उसी ट्रायल कोर्ट का दरवाजा खटखटाना होता है। इसके विपरीत, जिस तीसरे पक्ष के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, उसके पास स्वतंत्र सिविल वाद दायर करने, अदालत की अनुमति लेकर धारा 96 के तहत पहली अपील दाखिल करने, या धारा 151 के तहत ट्रायल कोर्ट के समक्ष आवेदन देने का विकल्प खुला रहता है। हाईकोर्ट ने यह भी निर्धारित किया कि धारा 151 सीपीसी के तहत संक्षिप्त प्रक्रिया में ट्रायल कोर्ट वैवाहिक स्थिति और उत्तराधिकार से जुड़े जटिल व विवादित तथ्यों का फैसला नहीं कर सकता, और ऐसे निष्कर्षों को क्षेत्राधिकार से परे व त्रुटिपूर्ण करार देते हुए निरस्त कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद एक व्यक्ति की स्व-अर्जित अचल संपत्तियों से जुड़ा है, जिनका 21 अगस्त 2024 को बिना वसीयत किए निधन हो गया था। उनके निधन के बाद, उनकी बहन (प्रतिवादी संख्या 1) ने अपने जीवित भाई (प्रतिवादी संख्या 2) और एक अन्य दिवंगत भाई के विधिक वारिसों (प्रतिवादी संख्या 3 से 5) के विरुद्ध विभाजन और स्थायी निषेधाज्ञा का सिविल वाद दायर किया। वाद में कहा गया कि मृतक का हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत कोई वर्ग-1 का वारिस नहीं है, और पक्षकार वर्ग-2 के वारिस होने के नाते संपत्ति में एक-तिहाई के समान हिस्सेदार हैं।
विभाजन वाद के लंबित रहने के दौरान, प्रतिवादीगण ने 19 अक्टूबर 2024 को एक लिखित समझौता कर लिया। इस समझौते के आधार पर अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश संख्या 6, जयपुर महानगर-द्वितीय ने 25 नवंबर 2024 को वाद डिक्री कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने राजीनामा दर्ज करते समय अपने आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि यह समझौता केवल वाद के पक्षों और उनके कानूनी प्रतिनिधियों पर ही बाध्यकारी होगा तथा किसी तीसरे पक्ष के कानूनी अधिकारों को प्रभावित नहीं करेगा।
इसके पश्चात, याचिकाकर्ता महिला ने 20 दिसंबर 2024 को सीपीसी की धारा 151 के तहत ट्रायल कोर्ट में आवेदन देकर राजीनामा डिक्री को निरस्त करने की मांग की। उसका दावा था कि वह मृतक की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी और एकमात्र जीवित वर्ग-1 की वारिस है, इसलिए पूरी संपत्ति पर केवल उसी का अधिकार बनता है। उसका आरोप था कि प्रतिवादीगण ने उसे पक्षकार बनाए बिना उसकी पीठ पीछे मिलीभगत से संपत्ति बांटने का समझौता किया है।
प्रतिवादीगण ने इस आवेदन का विरोध करते हुए कहा कि मृतक का विवाह वर्ष 1984 में एक अन्य महिला से हुआ था, जिसे पारिवारिक न्यायालय ने 12 सितंबर 2019 को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत आपसी सहमति से भंग कर दिया था। उन्होंने याचिकाकर्ता के विवाह और पत्नी के दर्जे को सिरे से नकारते हुए कहा कि नगर निगम द्वारा जारी मृत्यु प्रमाण पत्र में भी मृतक की पत्नी के रूप में पूर्व पत्नी का ही नाम दर्ज था।
ट्रायल कोर्ट ने 31 मई 2025 को याचिकाकर्ता का आवेदन खारिज कर दिया और निष्कर्ष दिया कि वह 12 सितंबर 2019 को पूर्व विवाह विच्छेद के बाद मृतक के साथ अपना वैध विवाह साबित करने में असफल रही। इस आदेश से क्षुब्ध होकर याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।
पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि राजीनामा डिक्री से याचिकाकर्ता के संपत्ति अधिकारों पर सीधा असर पड़ा है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले त्रिलोकी नाथ सिंह बनाम अनिरुद्ध सिंह का हवाला देते हुए दलील दी गई कि चूंकि आदेश XXIII नियम 3A और धारा 96(3) सीपीसी के तहत स्वतंत्र वाद या अपील पर रोक है, इसलिए धारा 151 सीपीसी के तहत डिक्री पारित करने वाली अदालत में आवेदन ही एकमात्र कानूनी उपाय था। यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता ने 1996 में विवाह किया था और सितंबर 2019 में तलाक की डिक्री के बाद पुनः विवाह संपन्न हुआ था, जिसके समर्थन में राशन कार्ड, आधार कार्ड, 2009 का विक्रय पत्र और पुलिस बयान प्रस्तुत किए गए।
दूसरी ओर, प्रतिवादीगण की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता और अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता 12 सितंबर 2019 के बाद हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुए किसी वैध विवाह को सिद्ध नहीं कर सकी। पुनर्विवाह की दलील को बाद में गढ़ा गया विचार बताया गया। इसके अतिरिक्त, यह भी कहा गया कि चूंकि याचिकाकर्ता मूल विभाजन वाद या समझौते की पक्षकार नहीं थी, इसलिए धारा 151 सीपीसी के तहत उसका आवेदन विचारणीय ही नहीं था। प्रतिवादीगण का तर्क था कि यदि उसका कोई स्वतंत्र अधिकार था, तो उसे नियमित दीवानी वाद लाना चाहिए था, न कि आपसी समझौते को चुनौती देनी चाहिए थी, जिसमें पहले से ही तीसरे पक्ष के अधिकार सुरक्षित रखे गए थे।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने पाया कि मृतक ने बिना वसीयत किए स्व-अर्जित संपत्ति छोड़ी थी, जिसका उत्तराधिकार हिंदू कानून से तय होता है। अदालत ने रेखांकित किया कि 12 सितंबर 2019 को पहले विवाह के औपचारिक विच्छेद के कारण याचिकाकर्ता के लिए सबसे पहले यह साबित करना अनिवार्य था कि उसने उक्त तिथि के बाद मृतक से वैध विवाह किया था, तभी वह वर्ग-1 के वारिस का दर्जा पा सकती थी।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि विवाह का तथ्य निर्विवाद होता, तो धारा 151 सीपीसी के तहत समझौते को अवैध बताते हुए दिया गया आवेदन पोषणीय हो सकता था। परंतु जब वैवाहिक दर्जा ही तथ्यों का एक अत्यंत विवादित प्रश्न बन गया, तो इससे एक स्वतंत्र वाद-कारण (कॉज ऑफ एक्शन) उत्पन्न हुआ, जिसका निपटारा साक्ष्य के आधार पर नियमित सिविल वाद में ही संभव है। कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने धारा 151 के संक्षिप्त दायरे में ऐसे जटिल साक्ष्यों और तथ्यों का निर्णय करके अपने क्षेत्राधिकार का उल्लंघन किया।
अदालत ने राजीनामा डिक्री के विरुद्ध उपलब्ध कानूनी उपचारों को दो श्रेणियों में विस्तार से स्पष्ट किया।
समझौते के पक्षकार के लिए उपलब्ध दीवानी उपचार
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1976 के सीपीसी संशोधन के बाद:
- समझौते के किसी पक्षकार द्वारा राजीनामा डिक्री के विरुद्ध अलग से स्वतंत्र वाद दायर करना आदेश XXIII नियम 3A सीपीसी के तहत पूरी तरह वर्जित है।
- यदि कोई पक्षकार समझौते की वैधता, शून्यता, धोखाधड़ी या प्राधिकार के अभाव को चुनौती देता है, तो उसे आदेश XXIII नियम 3 के परंतुक के तहत उसी ट्रायल कोर्ट के समक्ष जाना होगा।
- धारा 96(1) और आदेश XLIII नियम 1A के तहत अपील का उपाय क्रमिक है, जो ट्रायल कोर्ट द्वारा समझौते की वैधता पर निष्कर्ष दर्ज करने के बाद ही उपयोग किया जा सकता है। जहां समझौते के तथ्य पर कोई विवाद न हो, वहां धारा 96(3) की पूर्ण रोक लागू रहती है।
तीसरे पक्ष (गैर-पक्षकार) के लिए उपलब्ध दीवानी उपचार
अदालत की कार्यवाही से बाहर रहे तीसरे पक्ष के अधिकारों को रेखांकित करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“अतः, यह निर्विवाद रूप से माना जा सकता है कि जो व्यक्ति वाद या राजीनामा डिक्री का पक्षकार नहीं है, और न ही वाद या राजीनामा डिक्री के किसी पक्षकार के माध्यम से संपत्ति में कोई अधिकार, हक या हित प्राप्त करता है, बल्कि स्वतंत्र रूप से संपत्ति में अधिकार, हक या हित का दावा करता है, और फिर भी राजीनामा डिक्री से व्यथित है, वह राजीनामा डिक्री के विरुद्ध सिविल उपचार प्राप्त कर सकता है— (i) या तो एक स्वतंत्र वाद दायर करके, और/या (ii) अदालत की अनुमति प्राप्त करने के बाद धारा 96 सीपीसी के तहत अपील दायर करके, या (iii) अपने विवेक और मामले के तथ्यों व परिस्थितियों के अनुसार, आदेश XXIII नियम 3 सीपीसी के परंतुक के दायरे को लागू करते हुए धारा 151 सीपीसी के तहत उसी अदालत में आवेदन दायर कर सकता है जिसने राजीनामा दर्ज किया और राजीनामा डिक्री पारित की।”
अदालत ने कहा कि आदेश XXIII नियम 3A अथवा धारा 96(3) सीपीसी की रोक किसी तीसरे पक्ष के कानूनी रास्ते बंद नहीं करती।
इस कानूनी सिद्धांत के समर्थन में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय सकीना सुल्तानाली सुनेसरा (मोमिन) बनाम शिया इमामी इस्माइली मोमिन जमात समाज व अन्य (2025) का संदर्भ लिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि 1976 के बाद सीपीसी दो अलग-अलग मार्गों का निर्माण करती है: वाद के मूल पक्षकार को आदेश XXIII नियम 3 के परंतुक के तहत ट्रायल कोर्ट में लौटना होगा, जबकि गैर-पक्षकार अनुमति लेकर धारा 96 के तहत प्रथम अपील या अन्य दीवानी उपचार अपना सकता है।
हाईकोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले सुशीला बनाम विजय कुमार (2020) के निष्कर्षों से पूर्ण सहमति व्यक्त की, जिसमें कहा गया था:
“इस प्रकार, नियम 3ए के तहत लागू रोक केवल उन्हीं व्यक्तियों पर लागू होगी जो राजीनामे के पक्षकार थे, जिसका अर्थ है वाद के पक्षकार, और यह उन व्यक्तियों पर लागू नहीं होगी जो वाद के पक्षकार नहीं हैं।”
“यदि विद्वान अधिवक्ता के तर्कों को स्वीकार कर लिया जाए, तो किसी वाद के दो पक्षों के बीच हुआ राजीनामा न केवल राजीनामे के पक्षों पर बाध्यकारी होगा, बल्कि उन सभी अन्य व्यक्तियों पर भी बाध्यकारी होगा जो उस संपत्ति पर स्वतंत्र और विशिष्ट अधिकार रखते हैं जो राजीनामे का विषय थी, भले ही वे राजीनामे के पक्षकार न हों। इसका परिणाम विसंगतिपूर्ण होगा और उन व्यक्तियों के अधिकारों को निष्प्रभावी कर देगा जिनका उस संपत्ति पर स्वतंत्र अधिकार है जो राजीनामे का विषय थी, और कानून का यह उद्देश्य कभी नहीं हो सकता।”
याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत त्रिलोकी नाथ सिंह बनाम अनिरुद्ध सिंह (2020) के संबंध में हाईकोर्ट ने समझाया कि उस मामले में अपीलकर्ता ने वाद के एक निर्णय-ऋणी पक्षकार से अधिकार खरीदे थे, इसलिए वहां नया वाद वर्जित था। सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्र अधिकार रखने वाले अजनबियों पर वाद दायर करने का प्रतिबंध नहीं लगाया था। हाईकोर्ट ने बनवारी लाल बनाम श्रीमती चन्दो देवी (1993), पुष्पा देवी भगत बनाम राजिंदर सिंह (2006), आर. राजन्ना बनाम एस.आर. वेंकटस्वामी (2014), आर. जानकीअम्माल बनाम एस.के. कुमारसामी (2021) और मैसर्स श्री सूर्या डेवलपर्स एंड प्रमोटर्स बनाम एन. शैलेश प्रसाद (2022) का भी उल्लेख किया, जिनमें दोहराया गया है कि स्वतंत्र वाद की रोक केवल समझौते के पक्षकारों तक सीमित है।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता का धारा 151 सीपीसी के तहत दिया गया आवेदन विचारणीय नहीं था, क्योंकि वैध पत्नी के रूप में अपना दर्जा साबित किए बिना वह डिक्री को चुनौती नहीं दे सकती थी, और यह जांच आदेश XXIII नियम 3 सीपीसी के परंतुक के दायरे से बाहर थी।
आवेदन खारिज करने के अंतिम परिणाम को बरकरार रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता की वैवाहिक स्थिति पर निर्णय देकर गंभीर क्षेत्राधिकार संबंधी भूल और विधिक त्रुटि की थी। हाईकोर्ट ने वैवाहिक स्थिति पर ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए निष्कर्षों को अधिकार क्षेत्र से बाहर और विकृत घोषित करते हुए याचिकाकर्ता के विधिक दर्जे के प्रश्न को पूरी तरह खुला छोड़ दिया।
अदालत ने निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता अपनी वैवाहिक स्थिति और संपत्ति अधिकारों के संबंध में उचित कानूनी प्रक्रिया शुरू करती है, तो प्रतिवादीगण अपनी सभी कानूनी आपत्तियां उठाने के लिए स्वतंत्र होंगे, और उस कार्यवाही का फैसला ट्रायल कोर्ट या हाईकोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना पूरी तरह गुण-दोष के आधार पर किया जाएगा।
इन निर्देशों के साथ रिट याचिका का निस्तारण कर दिया गया और 16 सितंबर 2025 का अंतरिम स्थगन आदेश समाप्त कर दिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: कुसुम शर्मा बनाम सुशीला महर्षि एवं अन्य
वाद संख्या: एस.बी. सिविल रिट याचिका संख्या 13175/2025
पीठ: जस्टिस सुदेश बंसल
निर्णय की तिथि: 31/08/2026

