राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए भूमि अधिग्रहण और मुआवजे से जुड़े कानूनों के आपसी संबंध पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 (एनएच एक्ट) के तहत अधिग्रहित भूमि पर सोलेटियम (तुष्टिकरण राशि), ब्याज और सोलेटियम पर ब्याज की पात्रता पूरी तरह इस बात पर निर्भर करती है कि सक्षम प्राधिकारी (कंपीटेंट अथॉरिटी) द्वारा मुआवजे का प्राथमिक अवार्ड 1 जनवरी 2015 से पहले पारित किया गया था या उसके बाद। जमीन मालिक की अपील का आंशिक रूप से निपटारा करते हुए पीठ ने निर्णय दिया कि यदि धारा 3जी(1) के तहत मुआवजे का शुरुआती निर्धारण 1 जनवरी 2015 से पहले हो चुका था, तो इन सभी सांविधिक लाभों की गणना भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के प्रावधानों के तहत होगी, न कि अधिक लाभकारी भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के तहत।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह मामला अपीलकर्ता मानव भनोट की भूमि से जुड़ा है, जिसे भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने एनएच एक्ट, 1956 के तहत अधिग्रहित किया था। अधिग्रहण की शुरुआती अधिसूचना (धारा 3ए) 7 जून 2011 को आधिकारिक राजपत्र में और 1 जुलाई 2011 को समाचार पत्रों में प्रकाशित की गई थी। आपत्तियों पर विचार करने के बाद, 20 जनवरी 2012 को धारा 3डी(1) के तहत अधिग्रहण की घोषणा प्रकाशित हुई और 1 सितंबर 2012 को मुआवजा निर्धारण के लिए नोटिस जारी किया गया।
सक्षम प्राधिकारी (एसडीओ, जबलपुर) ने 11 जुलाई 2014 को आदेश पारित कर 3,47,38,287 रुपये का कुल मुआवजा निर्धारित किया। अपीलकर्ता को इसमें से अपने हिस्से के 49,17,000 रुपये 13 अक्टूबर 2014 को प्राप्त हुए। मुआवजे की राशि से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता ने इसे आर्बिट्रेटर के समक्ष चुनौती दी। आर्बिट्रेटर ने इस मामले में अवार्ड पारित किया। इसके बाद आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 34 और धारा 37 के तहत दाखिल आपत्तियां खारिज होने के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
दोनों पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता-भूमि स्वामी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हरिन पी. रावल ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय यूनियन ऑफ इंडिया बनाम तरसेम सिंह (तरसेम सिंह-II) का हवाला दिया। उन्होंने इस फैसले के पैराग्राफ 19 पर जोर देते हुए तर्क रखा कि अदालत ने पूर्व में तरसेम सिंह-I को केवल भविष्यलक्षी (प्रॉस्पेक्टिव) प्रभाव देने से इसलिए इनकार किया था, ताकि 31 दिसंबर 2014 और 1 जनवरी 2015 को अधिग्रहित जमीनों के स्वामियों के बीच कोई मनमाना भेदभाव न पैदा हो। इसी आधार पर उन्होंने 2013 के कानून के तहत पूर्ण लाभ देने की मांग की। वैकल्पिक तर्क में उन्होंने कहा कि चूंकि आर्बिट्रेटर का अवार्ड 1 जनवरी 2015 के बाद आया है, इसलिए गणना 2013 के कानून से होनी चाहिए। साथ ही, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के एक सर्कुलर के खंड 4.6(सी) का हवाला देकर कहा गया कि यदि 31 दिसंबर 2014 तक अधिकांश भूस्वामियों को भुगतान नहीं हुआ, तो 2013 का कानून लागू होना चाहिए।
दूसरी ओर, एनएचएआई की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अंकुर मित्तल ने दलील दी कि यह निर्विवाद है कि एनएच एक्ट के तहत भूस्वामियों को सोलेटियम, ब्याज और सोलेटियम पर ब्याज पाने का अधिकार है। हालांकि, मुख्य विवाद इस बात का है कि इसकी दर 1894 के कानून से तय होगी या 2013 के कानून से। उन्होंने स्पष्ट किया कि एनएच एक्ट के तहत अधिग्रहणों पर 2013 का कानून अध्यादेश के जरिए 1 जनवरी 2015 से लागू किया गया था, जबकि इस मामले में सक्षम प्राधिकारी ने अवार्ड 11 जुलाई 2014 को ही पारित कर दिया था। लिहाजा, लाभों की गणना 1894 के कानून के अनुसार ही होनी चाहिए। उन्होंने एनएचएआई बनाम तरसेम सिंह (तरसेम सिंह-III) पर भरोसा जताया और यह भी रेखांकित किया कि कुल 3.080 हेक्टेयर अधिग्रहित भूमि में से 1.700 हेक्टेयर का मुआवजा 2014 में ही वितरित हो चुका था, जिससे मंत्रालय के सर्कुलर की शर्त भी पूरी नहीं होती।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी व्याख्या
सुप्रीम कोर्ट ने 1997 के संशोधनों, एनएच एक्ट और दोनों अधिग्रहण कानूनों के ऐतिहासिक व कानूनी तालमेल का विस्तार से विश्लेषण किया। अदालत ने बताया कि 1997 में एनएच एक्ट में जोड़ी गई धारा 3जे ने 1894 के कानून के अनुप्रयोग को रोक दिया था, जिसे बाद में तरसेम सिंह-I में संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन मानते हुए असंवैधानिक घोषित कर दिया गया था।
2013 के कानून के लागू होने के समयक्रम को स्पष्ट करते हुए पीठ ने बताया कि धारा 105 के तहत चौथी अनुसूची में शामिल कानूनों (जिसमें एनएच एक्ट भी शामिल है) को शुरुआत में एक वर्ष के लिए छूट दी गई थी। इसके बाद अध्यादेश 9 (2014), अध्यादेश 5 (2015) और बाद की अधिसूचना के जरिए 1 जनवरी 2015 से 2013 के कानून के मुआवजा व पुनर्वास प्रावधानों को एनएच एक्ट पर लागू किया गया।
पूर्व फैसलों के संदर्भ में कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी की:
“तरसेम सिंह-II यह सिद्धांत प्रतिपादित नहीं करता कि 01.01.2015 से पहले के मामलों में सोलेटियम और ब्याज की गणना 2013 के कानून के तहत की जाएगी, यहाँ तक कि इसके प्रभावी होने की तारीख यानी 01.01.2014 से भी नहीं; क्योंकि राष्ट्रीय राजमार्ग कानून के तहत होने वाले अधिग्रहणों के लिए 2013 का कानून 01.01.2015 से ही लागू हुआ था। यह बात निर्विवाद है कि 01.01.2015 को या उससे पहले अधिग्रहित भूमि के मालिकों को भी सोलेटियम और ब्याज का लाभ मिलना तय है, लेकिन उनकी यह पात्रता इस बात से तय होगी कि क्या ‘अवार्ड’ 01.01.2015 से पहले पारित किया गया था या बाद में; यदि पहले पारित हुआ था तो पात्रता 1894 के कानून के तहत होगी और यदि बाद में हुआ तो 2013 के कानून के तहत होगी।”
पीठ ने आगे यह व्याख्या की कि एनएच एक्ट के तहत ‘अवार्ड’ किसे माना जाए। इंदौर डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम मनोहरलाल के संविधान पीठ के फैसले का उल्लेख करते हुए अदालत ने रेखांकित किया:
“सक्षम प्राधिकारी द्वारा धारा 3जी(1) के तहत किया गया मुआवजे का निर्धारण और विवाद उठने पर धारा 3जी(5) के तहत आर्बिट्रेटर द्वारा किया गया निर्णय, क्रमशः 1894 के कानून की धारा 11 के तहत पारित अवार्ड और धारा 18 के तहत किए गए रेफरेंस पर सिविल कोर्ट द्वारा किए जाने वाले निर्धारण के समान हैं।”
अदालत ने इस कानूनी स्थिति को संक्षेप में स्पष्ट करते हुए कहा:
“यदि मुआवजे का निर्धारण 01.01.2015 से पहले नहीं किया गया है, तो अनिवार्य रूप से 2013 का कानून लागू होगा। लेकिन यदि राष्ट्रीय राजमार्ग कानून के तहत सक्षम प्राधिकारी द्वारा मुआवजे का निर्धारण 01.01.2015 से पहले कर दिया गया है, भले ही वह 01.01.2014 के बाद हुआ हो, तो सोलेटियम, ब्याज और सोलेटियम पर ब्याज का भुगतान 1894 के कानून के तहत ही देय होगा।”
मंत्रालय के सर्कुलर पर अपीलकर्ता की दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि सर्कुलर में बहुसंख्यक ‘भूमि स्वामियों’ (लैंडओनर्स) नहीं, बल्कि बहुसंख्यक ‘भूमि जोतों’ (लैंड होल्डिंग्स) का जिक्र है। चूंकि एनएचएआई ने साबित किया कि 3.080 हेक्टेयर में से 1.700 हेक्टेयर भूमि का भुगतान 2014 में ही हो गया था, इसलिए अपीलकर्ता को इस सर्कुलर का कोई लाभ नहीं मिल सकता।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि अपीलकर्ता आर्बिट्रेशन अवार्ड द्वारा निर्धारित मुआवजे पर सोलेटियम, ब्याज और सोलेटियम पर ब्याज पाने का हकदार है, लेकिन इसकी गणना 1894 के कानून के तहत की जाएगी क्योंकि सक्षम प्राधिकारी द्वारा प्राथमिक अवार्ड 11 जुलाई 2014 को पारित किया गया था। अदालत ने इस गणना और सरकार द्वारा भुगतान की प्रक्रिया पूरी करने के लिए मामले को सक्षम प्राधिकारी के पास वापस भेज दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मानव भनोट बनाम भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या … 2026 (एसएलपी (सी) संख्या 27541/2024 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 8 सितंबर 2026

