सुप्रीम कोर्ट ने एक अपीलकर्ता-पति की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ib) के तहत विवाह विच्छेद (तलाक) की डिक्री मंजूर कर दी है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी जीवनसाथी का आचरण वैवाहिक रिश्ते को छोड़ देने का स्पष्ट विकल्प दर्शाता हो, तो केवल मौखिक रूप से वैवाहिक दायित्वों को निभाने की तत्परता जताना परित्याग (डेजर्शन) के आधार को खारिज करने के लिए पर्याप्त नहीं है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें पति की ओर से परित्याग के आधार पर मांगी गई तलाक की अर्जी खारिज कर दी गई थी। निचली अदालतों के इस समवर्ती निष्कर्ष को बरकरार रखते हुए कि मानसिक क्रूरता साबित नहीं हुई है, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता-पति ने परित्याग का आधार सफलतापूर्वक सिद्ध कर दिया है, क्योंकि दोनों पक्ष 15 दिसंबर 2005 से बिना किसी सहवास के लगातार अलग रह रहे हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
दोनों पक्षों का विवाह 23 जून 2003 को संपन्न हुआ था। अपीलकर्ता-पति का कहना था कि विवाह के तुरंत बाद ही पत्नी उसकी शैक्षणिक योग्यता को लेकर उससे दूरी बनाने लगी और उसे “अनपढ़” तथा “गंवार” कहकर लगातार अपमानित करती थी। पति का आरोप था कि शादी के दो वर्षों के दौरान बहुत मान-मनौव्वल के बाद पत्नी केवल चार या पांच बार ही उसके साथ रही और उसके आचरण के कारण विवाह में दांपत्य संबंध भी स्थापित नहीं हो सके।
30 नवंबर 2005 को पत्नी अपने मायके लौट गई। इसके बाद 15 दिसंबर 2005 को जब पति उसे वापस लाने उसके मायके गया, तो उसने साथ लौटने और सहवास बहाल करने से इनकार कर दिया। उस तारीख के बाद से ही दोनों पक्ष वैवाहिक संबंधों को बहाल किए बिना अलग-अलग रह रहे हैं और इस विवाह से कोई संतान नहीं है। इसके बाद पति ने 20 जून 2007 को हिंदू विवाह अधिनियम (एचएमए) की धारा 13 के तहत मानसिक क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की याचिका दायर की।
ट्रायल कोर्ट ने तलाक की यह याचिका खारिज कर दी थी। क्रूरता के बिंदु पर कोर्ट ने पाया कि शारीरिक संबंधों से इनकार करने, पति व उसके परिवार को अपमानित करने और अपशब्दों के प्रयोग के आरोप संतोषजनक ढंग से साबित नहीं हुए। वहीं परित्याग के मुद्दे पर ट्रायल कोर्ट ने यह तो माना कि पत्नी 15 दिसंबर 2005 से अलग रह रही है, लेकिन निष्कर्ष निकाला कि केवल यह परिस्थिति ही पति को तलाक की डिक्री का हकदार बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
पति ने इस फैसले को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 28 के तहत हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए निर्णय दिया कि पति क्रूरता या परित्याग में से कोई भी आधार सिद्ध करने में विफल रहा। क्रूरता के संबंध में हाईकोर्ट ने गवाहों और पति के बयानों को अविश्वसनीय माना। वहीं परित्याग पर हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि धारा 13(1)(ib) के तहत केवल शारीरिक दूरी अपने आप में परित्याग नहीं मानी जा सकती। हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा था:
“प्रतिवादी-पत्नी के बयान को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि उसने अपने वैवाहिक दायित्वों को समाप्त करने का निर्णय ले लिया था। हमारे सुविचारित मत में अपीलकर्ता परित्याग के आवश्यक तत्व यानी ‘एनिमस डेजरेडी’ (परित्याग की मंशा) को साबित करने में असफल रहा है। इसलिए अपीलकर्ता के वकील का यह तर्क आधारहीन है कि ट्रायल कोर्ट के पैरा 6 के निष्कर्ष के आधार पर वह परित्याग के आधार पर तलाक का हकदार है।”
हाईकोर्ट के इस आदेश से क्षुब्ध होकर पति ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अपील लंबित रहने के दौरान मामले को सुप्रीम कोर्ट मध्यस्थता केंद्र भी भेजा गया था, ताकि सौहार्दपूर्ण समाधान की संभावना तलाशी जा सके, लेकिन 28 अप्रैल 2014 को मध्यस्थ ने विफलता रिपोर्ट पेश की।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता-पति के वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में यह निष्कर्ष दर्ज किया था कि पत्नी ने 15 दिसंबर 2005 से पति का परित्याग किया था। चूंकि पत्नी ने इस विशिष्ट निष्कर्ष को न तो चुनौती दी और न ही कोई क्रॉस-ऑब्जेक्शन दायर किया, इसलिए यह निष्कर्ष अंतिम और बाध्यकारी हो चुका था। वकील ने कहा कि धारा 13(1)(ib) के तहत कम से कम दो वर्षों का निरंतर परित्याग एक पूर्ण वैधानिक आधार है, और ऐसे निष्कर्ष के बावजूद तलाक की डिक्री देने से इनकार करना रिकॉर्ड पर मौजूद कानून की स्पष्ट भूल है।
हाईकोर्ट के प्रतिकूल निष्कर्ष पर उन्होंने तर्क दिया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ib) किसी परित्यक्त जीवनसाथी के लिए तलाक मांगने से पहले दांपत्य अधिकारों की बहाली (रेस्टिट्यूशन) की अर्जी लगाना अनिवार्य नहीं बनाती, क्योंकि ये दोनों अलग और स्वतंत्र कानूनी उपचार हैं। उन्होंने आगे कहा कि दोनों के अलग रहने का तथ्य निर्विवाद है और पत्नी के लगातार ससुराल लौटने से इनकार करने से परित्याग की मंशा (एनिमस डेजरेडी) भी स्पष्ट रूप से सिद्ध हो चुकी थी।
दूसरी ओर प्रतिवादी-पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सभी साक्ष्यों का स्वतंत्र मूल्यांकन किया और लछमन उतमचंद कृपलानी बनाम मीना उर्फ मोटा मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांतों को लागू करते हुए ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष को सही तरीके से पलटा था। उन्होंने कहा कि पति धारा 13(1)(ib) के तहत परित्याग के अनिवार्य वैधानिक तत्वों को साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या हाईकोर्ट का यह निष्कर्ष उचित था कि धारा 13(1)(ib) के तहत परित्याग के आवश्यक तत्व स्थापित नहीं हुए थे, जिसके कारण अपीलकर्ता तलाक की डिक्री पाने से वंचित रह गया।
पीठ ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष दर्ज साक्ष्यों की पड़ताल की और रेखांकित किया कि ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष के अनुसार एक स्वतंत्र गवाह (एडब्ल्यू-4) ने गवाही दी थी कि वह पत्नी को वापस लाने पति के साथ गया था, लेकिन उसने बिना किसी उचित कारण के साथ लौटने से मना कर दिया था। इस स्वतंत्र गवाह के बयान पर जिरह में कोई चुनौती नहीं दी गई थी।
परित्याग के कानूनी सिद्धांत पर चर्चा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सावित्री पांडे बनाम प्रेम चंद्र पांडे मामले का हवाला दिया, जिसमें बिपिनचंद्र और लछमन उतमचंद कृपलानी बनाम मीना मामलों के सिद्धांतों को दोहराते हुए स्पष्ट किया गया था:
“अधिनियम के तहत तलाक मांगने के उद्देश्य से ‘परित्याग’ का अर्थ है एक जीवनसाथी द्वारा दूसरे की सहमति के बिना और बिना किसी उचित कारण के जानबूझकर स्थायी रूप से उसे छोड़ देना या त्याग देना। दूसरे शब्दों में, यह विवाह के दायित्वों का पूर्ण तिरस्कार है। परित्याग किसी स्थान से हटना नहीं बल्कि एक स्थिति से खुद को अलग करना है। इसलिए परित्याग का अर्थ वैवाहिक दायित्वों से पीछे हटना है, यानी दोनों पक्षों के बीच सहवास की अनुमति न देना और उसमें सहयोग न करना।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि परित्याग साबित करने के लिए परित्याग करने वाले पक्ष की ओर से दो शर्तों का एक साथ होना अनिवार्य है: पहला, वास्तविक अलगाव (फैक्टम ऑफ सेपरेशन) और दूसरा, सहवास को स्थायी रूप से समाप्त करने का इरादा (एनिमस डेजरेडी)। इसी तरह परित्यक्त पक्ष की ओर से सहमति का अभाव और ऐसा आचरण न होना आवश्यक है जो दूसरे पक्ष को अलग रहने का उचित कारण दे सके। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि परित्याग एक ही छत के नीचे रहते हुए भी हो सकता है और यह परिस्थितियों से निकाला जाने वाला निष्कर्ष है।
लंबे अलगाव की वास्तविकता पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नवीन कोहली बनाम नीलू कोहली मामले के ऐतिहासिक फैसले का उद्धरण दिया:
“जहां एक लंबी अवधि का निरंतर अलगाव रहा हो, वहां यह उचित रूप से माना जा सकता है कि वैवाहिक संबंध अब सुधरने की स्थिति से परे हो चुका है। ऐसा विवाह केवल एक कानूनी बंधन के सहारे टिका हुआ भ्रम बन जाता है। ऐसी स्थिति में उस कानूनी बंधन को तोड़ने से इनकार करके कानून विवाह की पवित्रता की रक्षा नहीं करता; बल्कि यह पक्षों की भावनाओं और संवेगों के प्रति उदासीनता दिखाता है।”
“लोकहित की यह मांग जरूर है कि जहां तक संभव हो, जब तक संभव हो और जब भी संभव हो वैवाहिक स्थिति को बनाए रखा जाए, लेकिन जहां कोई विवाह पूरी तरह टूट चुका हो और उसे बचाने की कोई उम्मीद न बची हो, वहां लोकहित इसी बात में है कि इस वास्तविकता को स्वीकार कर लिया जाए।”
पीठ ने शिल्पा शैलेश बनाम वरुण श्रीनिवासन मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि लंबा अलगाव यह तय करने में एक महत्वपूर्ण कारक है कि क्या वैवाहिक बंधन व्यावहारिक रूप से समाप्त हो चुका है। हालांकि पीठ ने स्पष्ट किया कि वर्तमान अपील संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत तय नहीं की जा रही है, फिर भी ये टिप्पणियां यह समझने के लिए प्रासंगिक हैं कि वैवाहिक रिश्ता वास्तव में समाप्त हो चुका है।
इन कानूनी सिद्धांतों को मामले के तथ्यों पर लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट का यह निष्कर्ष गलत था कि पत्नी का परित्याग करने का कोई इरादा नहीं था:
“हमारे समक्ष वर्तमान मामले में सच्चाई यह है कि दोनों पक्ष अलग-अलग रह रहे हैं और यद्यपि प्रतिवादी-पत्नी ने अपनी गवाही में कहा है कि वह अपने वैवाहिक दायित्वों को निभाने के लिए तैयार थी, लेकिन जब आचरण इसके विपरीत दिखाई दे रहा हो तो केवल ऐसा दावा करना पर्याप्त नहीं हो सकता। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि ट्रायल कोर्ट के समक्ष यह साबित हो चुका था कि दोनों पक्षों ने दिसंबर 2005 के बाद से एक साथ सहवास नहीं किया है, हमारी राय में हाईकोर्ट का यह निष्कर्ष निकालना गलत था कि अपीलकर्ता का परित्याग करने का प्रतिवादी-पत्नी का कोई इरादा नहीं था।”
सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि रिकॉर्ड से साबित होता है कि जब पति स्वतंत्र गवाह के साथ पत्नी को लेने गया तो उसने बिना किसी उचित कारण के लौटने से मना कर दिया, जिससे साफ है कि उसने सक्रिय रूप से पति का साथ छोड़ने का विकल्प चुना था। विवाह से कोई संतान नहीं है और सुलह के सभी प्रयास विफल हो चुके हैं, ऐसे में पक्षों को वैवाहिक बंधन में बने रहने के लिए बाध्य करना न्याय के उद्देश्यों के विपरीत होगा। वहीं क्रूरता के मुद्दे पर दोनों निचली अदालतों के समवर्ती निष्कर्षों में पीठ ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया।
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए परित्याग पर हाईकोर्ट के निष्कर्ष को रद्द कर दिया और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ib) के तहत तलाक की डिक्री पारित कर दोनों पक्षों का विवाह समाप्त कर दिया। क्रूरता के आधार पर निचली अदालतों के निष्कर्षों को बरकरार रखा गया।
स्थायी गुजारा भत्ते (परमानेंट एलिमनी) के मुद्दे पर सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता-पति ने 5,00,000 रुपये देने की सहमति जताई थी, लेकिन मामले के तथ्यों को देखते हुए कोर्ट ने उसे आदेश की तिथि से तीन महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में 7,00,000 रुपये जमा कर पत्नी को स्थायी गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि तीन माह के भीतर यह राशि जमा नहीं की जाती है, तो पत्नी वसूली के लिए निष्पादन की प्रक्रिया शुरू करने की हकदार होगी और इस राशि पर 9 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज देय होगा। मामले में अदालती खर्च को लेकर कोई आदेश पारित नहीं किया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: बिजेंद्र बनाम रेखा
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 10249/2014
पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा, जस्टिस श्री चंद्रशेखर
निर्णय की तिथि: 2 सितंबर 2026

