कलकत्ता हाईकोर्ट ने एंड-स्टेज रीनल डिजीज से जूझ रहे एक मरीज को गैर-रिश्तेदार महिला द्वारा किडनी दान करने की याचिका खारिज करने के फैसले को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने राज्य ऑर्गन ट्रांसप्लांटेशन ऑथराइजेशन बोर्ड को निर्देश दिया है कि वह एक हफ्ते के भीतर इस मामले पर नए सिरे से विचार कर फैसला ले।
बिना सबूत संदेह करने पर आपत्ति
जस्टिस कृष्णा राव की पीठ ने 30 जुलाई को दिए आदेश में कहा कि दाता और मरीज के बीच किसी भी तरह का वित्तीय लेन-देन नहीं हुआ है। दाता केवल मानवीय आधार पर और स्नेहवश अपनी एक किडनी दान करने के लिए तैयार हुई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक अवैध वित्तीय लेन-देन का कोई ठोस सबूत न हो, तब तक दाता की निस्वार्थ भावना पर बिना किसी कारण संदेह नहीं किया जाना चाहिए।
इलाज और आवेदन की प्रक्रिया
यह मामला तब शुरू हुआ जब रवींद्रनाथ टैगोर इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डिएक साइंसेज के डॉक्टरों ने मरीज की जांच के बाद पाया कि वह किडनी की गंभीर बीमारी (एंड-स्टेज रीनल डिजीज) से पीड़ित है और बिस्तर पर पड़ा है। डॉक्टरों ने प्रमाणित किया था कि मरीज की जान बचाने के लिए किडनी प्रत्यारोपण ही एकमात्र स्थायी इलाज है। इसके बाद मरीज की एक पारिवारिक दोस्त ने स्वेच्छा से अपनी एक किडनी दान करने की पेशकश की थी।
इस संबंध में 29 अक्टूबर 2025 को राज्य प्राधिकरण समिति के समक्ष औपचारिक प्रस्ताव जमा किया गया था। मैजिस्ट्रेट अदालत में आवश्यक हलफनामा और संरक्षक का सहमति पत्र भी जमा कराया गया था।
मौखिक इनकार और समिति का रुख
पुलिस जांच और सत्यापन समिति की प्रक्रिया के बाद 15 मई को एक रिपोर्ट जारी की गई, जिसमें गैर-रिश्तेदार से अंगदान का कोई “विशेष कारण” नहीं मिलने की बात कही गई थी। इसके बाद 9 जून को ऑर्गन ट्रांसप्लांटेशन ऑथराइजेशन बोर्ड के समक्ष दाता और उनके पिता उपस्थित हुए। हालांकि, बोर्ड ने मरीज की पत्नी को केवल मौखिक रूप से सूचित कर दिया कि आवेदन को सिफारिश नहीं मिली है, लेकिन इसका कोई लिखित कारण उपलब्ध नहीं कराया गया।
दोनों पक्षों की दलीलें और कोर्ट का अंतिम निर्देश
अदालत में मरीज की पत्नी के वकील अरित्र बसु ने तर्क दिया कि सभी कानूनी औपचारिकताएं पूरी की गई थीं और अधिकारियों के पास बिना वित्तीय लेन-देन के सबूत के अनुमति रोकने का कोई आधार नहीं था। वहीं राज्य सरकार के वकील फाल्गुनी बंद्योपाध्याय ने कहा कि समिति ने जांच और पुलिस रिपोर्ट के आधार पर ही अंगदान की सिफारिश न करने का निर्णय लिया था।
जस्टिस राव ने पाया कि सत्यापन समिति ने दाता द्वारा जमा किए गए दस्तावेजों की अनदेखी की और केवल पूछताछ के दौरान दिए गए बयानों पर ध्यान केंद्रित किया। कोर्ट ने 15 मई की रिपोर्ट और समिति के पुराने फैसले को निरस्त करते हुए बोर्ड को निर्देश दिया कि वह पुलिस रिपोर्ट, दाता और उनके पिता के बयानों का पुनः मूल्यांकन करे और सात दिनों के भीतर नया निर्णय जारी करे।

