इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि सरकारी विभागों द्वारा व्यावसायिक स्वीकृतियों और अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) में बेवजह और अनिश्चितकालीन देरी करना नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन है। जस्टिस जे जे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने फतेहपुर में पेट्रोल पंप स्थापित करने के लिए दो साल तक एनओसी अटकाए रखने को अफसरशाही का तानाशाही रवैया और ‘कानूनी दुर्भावना’ (मैलिस इन लॉ) करार दिया। अदालत ने 30 जुलाई को दिए अपने निर्णय में साफ किया कि किसी नागरिक को वैध कारोबार करने से रोकना संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(जी) और 21 के तहत दिए गए अधिकारों का उल्लंघन है।
दो साल से अटका था एनओसी का मामला
यह मामला फतेहपुर निवासी राकेश कुमार गुप्ता की याचिका से जुड़ा है। उन्हें रिलायंस बीपी मोबिलिटी लिमिटेड ने 29 मार्च 2024 को पेट्रोल पंप खोलने के लिए लेटर ऑफ इंटेंट जारी किया था। इसके बाद आवेदक ने सभी आवश्यक वैधानिक अनुमतियां प्राप्त कर ली थीं। तेल कंपनी की ओर से 1 जुलाई 2024 को जिलाधिकारी फतेहपुर के समक्ष एनओसी के लिए आवेदन किया गया था। हालांकि, राज्य सरकार द्वारा 30 जनवरी 2023 और 18 दिसंबर 2025 को जारी शासनादेशों के जरिए प्रक्रिया को सरल बनाए जाने के बावजूद, स्थानीय प्रशासन ने दो साल से अधिक समय तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं की।
अदालत की सख्ती के बाद जागा प्रशासन
बार-बार के अनुरोधों के बाद भी कोई सुनवाई न होने पर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने 22 जून 2026 को इस देरी पर जवाब तलब किया। प्रशासनिक स्पष्टीकरण से असंतुष्ट होकर अदालत ने फतेहपुर के जिलाधिकारी को 24 जून को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश जारी कर दिया। इसके बाद बैकफुट पर आए जिला प्रशासन ने 25 जून को दाखिल व्यक्तिगत हलफनामे में एनओसी जारी करने की जानकारी दी।
निचले कर्मचारी पर कार्रवाई पर अदालत की नाराजगी
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने दलील दी कि पुलिस सत्यापन रिपोर्ट में देरी के कारण एनओसी रुक गई थी और इस मामले में एक क्लर्क के खिलाफ परिनिंदा प्रविष्टि (सेंसर एंट्री) की कार्रवाई की गई है। हाईकोर्ट की पीठ ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि एक निचले कर्मचारी को दंडित कर देना और दो साल तक फाइल दबाकर बैठे वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही तय न करना अनुचित है। अदालत ने टिप्पणी की कि कानूनी दुर्भावना साबित करने के लिए व्यक्तिगत द्वेष होना जरूरी नहीं है, बल्कि प्रशासनिक दायित्वों की बिना किसी वैध कारण के अनदेखी करना ही कानूनी दुर्भावना का प्रमाण है।
गोल्डन ट्रायंगल और मौलिक अधिकार
पीठ ने रेखांकित किया कि सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 को एक अटूट ढांचे के रूप में देखा है, जिसे ‘गोल्डन ट्रायंगल’ कहा जाता है। गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार (अनुच्छेद 21) के तहत आजीविका और व्यापार की स्वतंत्रता शामिल है। ऐसे में किसी नागरिक को वैध कारोबार करने से रोकना या उसमें मनमाना विलंब करना समानता और स्वतंत्रता के अधिकारों पर सीधा हमला है। अदालत ने यह भी कहा कि जो काम हाईकोर्ट के दखल के बाद आनन-फानन में किया गया, उसे काफी समय पहले भी किया जा सकता था।
याचिका का निस्तारण और भावी निर्देश
चूंकि मुकदमे की प्रक्रिया के दौरान ही एनओसी जारी कर दी गई थी, इसलिए पीठ ने याचिका का निस्तारण करते हुए रिलायंस बीपी मोबिलिटी लिमिटेड को 29 मार्च 2024 के समझौते के आधार पर पेट्रोल पंप स्थापित करने की प्रक्रिया तेजी से पूरी करने का निर्देश दिया। बिना किसी खर्च के याचिका समाप्त करते हुए अदालत ने उम्मीद जताई कि फतेहपुर जिला प्रशासन भविष्य में नागरिकों के अधिकारों से जुड़े मामलों में अधिक तत्परता और जिम्मेदारी से काम करेगा।

