केरल हाईकोर्ट ने 43 वर्षीय एक विधवा महिला को अपने दिवंगत पति के साथ सुरक्षित रखे गए भ्रूण (एम्ब्रायो) का उपयोग कर संतान सुख पाने की इजाजत दे दी है। अस्पताल ने लिखित सहमति के अभाव का हवाला देकर इन भ्रूणों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी, जिसे अदालत ने अनुचित ठहराया।
जस्टिस हरिशंकर वी. मेनन की पीठ ने मामले का निपटारा करते हुए कहा कि केवल इसलिए किसी विधवा की अर्जी खारिज नहीं की जा सकती क्योंकि अस्पताल ने कानूनी ‘फॉर्म 9’ के बजाय कोई अन्य सहमति पत्र भरवा लिया था। अदालत ने 1 सितंबर को अपने आदेश में स्पष्ट किया कि दिवंगत पति की अनुमानित सहमति और संतान की चाह रखने वाली महिला की इच्छा सर्वोपरि है। पीठ के मुताबिक, उपलब्ध तथ्यों से यह जाहिर होता है कि पति भ्रूण का सार्थक इस्तेमाल चाहते थे, इसलिए याचिकाकर्ता पत्नी की मां बनने की इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने अस्पताल प्रबंधन को निर्देश दिया कि वह महिला को इन संरक्षित भ्रूणों के जरिए असिस्टेड रिप्रोडक्शन (आईवीएफ) प्रक्रिया पूरी करने की अनुमति दे।
अस्पताल का इनकार और केंद्र का विरोध
याचिकाकर्ता महिला और उसके पति ने पहले इस अस्पताल में निःसंतानता का इलाज कराया था और इसी दौरान उनके भ्रूण को क्रायोप्रिजर्वेशन तकनीक से सुरक्षित रखा गया था। बाद में पति का निधन हो गया। इसके बाद जब महिला ने आईवीएफ प्रक्रिया के लिए उन भ्रूणों के उपयोग की मांग की, तो अस्पताल ने स्पष्ट लिखित सहमति न होने की बात कहकर प्रक्रिया आगे बढ़ाने से मना कर दिया।
अदालत में महिला के वकील ने दलील दी कि इलाज और भ्रूण संरक्षण के दौरान अस्पताल द्वारा लिया गया सहमति पत्र ‘असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021’ के नियमों का पर्याप्त रूप से पालन करता है। दूसरी तरफ, केंद्र सरकार के वकील ने इस याचिका का विरोध किया। केंद्र का तर्क था कि अस्पताल के रिकॉर्ड में जो दस्तावेज मौजूद है, उसमें जीवित पत्नी को भ्रूण सौंपने का कोई विकल्प ही नहीं था। इसके बजाय पति ने यह विकल्प चुना था कि भ्रूण का उपयोग ‘अज्ञात दंपतियों’ द्वारा किया जा सकता है। सरकारी वकील का कहना था कि इससे साफ है कि पति अपने निधन के बाद पत्नी द्वारा इन भ्रूणों के उपयोग के पक्ष में नहीं थे।
नियमों के फॉर्म 9 और अस्पताल के दस्तावेज में अंतर
असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेगुलेशन) नियमों के तहत निर्धारित ‘फॉर्म 9’ का प्रावधान है। इसके मुताबिक, पुरुष साथी को यह स्पष्ट करना होता है कि यदि उसकी मृत्यु हो जाती है तो भ्रूण का क्या किया जाए। इस कानूनी प्रारूप में तीन विकल्प दिए जाते हैं—भ्रूण को नष्ट होने दिया जाए, उसे जीवित पत्नी को सौंप दिया जाए, या फिर उसका उपयोग वैज्ञानिक शोध के लिए करने की अनुमति दी जाए। पत्नी के लिए भी यही कानूनी विकल्प उपलब्ध रहते हैं।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि अस्पताल ने यह वैधानिक फॉर्म 9 भरवाया ही नहीं था, बल्कि अपना अलग सहमति पत्र (Ext P3) इस्तेमाल किया था। अदालत ने गौर किया कि अस्पताल के इस दस्तावेज में ऐसा कोई प्रावधान ही नहीं था जिससे पति-पत्नी एक-दूसरे के निधन की स्थिति में जीवित साथी को भ्रूण सौंपने की अनुमति दे सकें। इसमें जीवित साथी के बजाय केवल तीसरे पक्ष यानी अन्य दंपतियों को भ्रूण देने का विकल्प रखा गया था।
अदालत का निष्कर्ष: भ्रूण के वास्तविक उपयोग की थी मंशा
हाईकोर्ट ने अस्पताल के सहमति पत्र का विश्लेषण करते हुए पाया कि उसमें तीन विकल्प दिए गए थे। दिवंगत पति ने भ्रूण को नष्ट करने या शोध के लिए देने के विकल्पों को नकारते हुए उसके उपयोग का पहला विकल्प चुना था।
अदालत ने कहा कि जब अस्पताल के इस दस्तावेज को कानूनी फॉर्म 9 के संदर्भ में देखा जाता है, तो यह स्पष्ट निष्कर्ष निकलता है कि पति अपने निधन के बाद पत्नी द्वारा ही इसके उपयोग के पक्ष में रहे होंगे, क्योंकि वे भ्रूण का वास्तविक और सार्थक उपयोग चाहते थे। जस्टिस मेनन ने रेखांकित किया कि अस्पताल की प्रक्रियागत खामियों या फॉर्म 9 की जगह दूसरा प्रारूप भरवाने की गलती की सजा याचिकाकर्ता महिला को नहीं दी जा सकती। दिवंगत पति की मंशा और जीवित साथी के माता-पिता बनने के अधिकार को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए हाईकोर्ट ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाया।

