संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत दल-बदल विरोधी कानून की मौजूदा व्याख्या की समीक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट सहमत हो गया है। अदालत उस याचिका पर सुनवाई कर रही है जिसमें राजनीतिक दलों के विलय के आधार पर सांसदों और विधायकों को अयोग्यता से बचाने वाले प्रावधानों पर फिर से विचार करने की मांग की गई है।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर उसका जवाब मांगा है। यह याचिका वरिष्ठ अधिवक्ता और स्वतंत्र राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने व्यक्तिगत क्षमता में दायर की है।
संसदीय संरचना और राजनीतिक व्यवस्था पर प्रभाव
कपिल सिब्बल ने अदालत से 10वीं अनुसूची के पैराग्राफ 4 की व्याख्या पर फिर से विचार करने का अनुरोध किया है। उन्होंने 22 जुलाई को इस याचिका को जल्द सूचीबद्ध करने का आग्रह करते हुए कहा था कि देश में जिस तरह से संसद और विधानसभाओं का स्वरूप बदला जा रहा है, उस पर कानूनी मूल्यांकन आवश्यक है।
सिब्बल ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि विलय से जुड़े इस प्रावधान का देश की राजनीति पर व्यापक असर पड़ रहा है। वर्तमान लागू व्यवस्था के कारण विधायी सदनों में अल्पमत वाले दल बहुमत में बदल जाते हैं, जबकि बहुमत प्राप्त राजनीतिक दल अल्पमत में आ जाते हैं।
संसद के अधिकार क्षेत्र पर पीठ की टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने टिप्पणी की कि इस मुद्दे से जुड़े कई व्यापक पहलू हैं, जिन पर संसद को विचार करने की आवश्यकता है। पीठ ने कहा कि 10वीं अनुसूची को जनप्रतिनिधियों को नियंत्रित करने के लिए स्वयं संसद ने ही पारित किया था, इसलिए इसके क्रियान्वयन का उचित ढांचा तय करना भी विधायिका का ही काम है।
गोवा मामले के साथ सम्बद्ध हुई याचिका
सुनवाई के दौरान जब सिब्बल ने जानकारी दी कि गोवा के विधायकों के दल-बदल से जुड़ा ऐसा ही एक मामला पहले से अदालत के समक्ष लंबित है, तो पीठ ने इस नई याचिका को भी उसी गोवा मामले के साथ सम्बद्ध कर दिया।
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब हाल के दिनों में आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) के कई सांसद 10वीं अनुसूची के विलय प्रावधानों का हवाला देकर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और अन्य राजनीतिक संगठनों में शामिल हुए हैं।

