सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया: हर कुत्ते को सड़क से हटाने का आदेश नहीं दिया, सिर्फ ABC नियमों के पालन की बात कही

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को यह स्पष्ट किया कि उसने सभी आवारा कुत्तों को सड़कों से हटाने का कोई आदेश नहीं दिया है, बल्कि सिर्फ Animal Birth Control (ABC) Rules के तहत उनके इलाज और प्रबंधन की बात कही है।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ देश भर में आवारा कुत्तों से जुड़े मुद्दों पर दायर कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इनमें कुछ याचिकाएं पहले दिए गए आदेशों में बदलाव की मांग कर रही थीं, जबकि कुछ याचिकाओं में सख्त अनुपालन की मांग की गई है।

“हमने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया कि हर कुत्ते को सड़क से हटा दिया जाए। हमारा निर्देश सिर्फ इतना है कि उन्हें नियमों के अनुसार ट्रीट किया जाए,” जस्टिस मेहता ने कहा।

ABC नियमों के तहत आवारा कुत्तों का नसबंदी, टीकाकरण और उसी क्षेत्र में पुनः रिहाई अनिवार्य है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई कि देश के कई राज्यों और नगर निगमों ने इन नियमों का पालन नहीं किया है, जबकि इस संबंध में स्पष्ट न्यायिक आदेश पहले से मौजूद हैं।

एमिकस क्यूरी के रूप में अदालत की मदद कर रहे सीनियर एडवोकेट गौरव अग्रवाल ने जानकारी दी कि बुधवार तक सिर्फ चार राज्यों ने अनुपालन हलफनामा दाखिल किया है।

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सीनियर वकील सी. यू. सिंह, कृष्णन वेणुगोपाल, ध्रुव मेहता, गोपाल शंकरनारायणन, श्याम दीवान, सिद्धार्थ लूथरा और करुणा नंदी सहित कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अदालत में दलीलें रखीं।

सी. यू. सिंह ने तर्क दिया कि दिल्ली जैसे शहरों में आवारा कुत्तों को अचानक हटाना चूहे के प्रकोप को बढ़ा सकता है।

“जब चूहों की संख्या बढ़ती है, तो उसके गंभीर परिणाम होते हैं,” उन्होंने कहा।

इस पर जस्टिस मेहता ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहा, “कुत्ते और बिल्लियाँ दुश्मन होते हैं। बिल्लियाँ चूहों को मारती हैं। तो हमें ज़्यादा बिल्लियों को बढ़ावा देना चाहिए।”

सिंह ने यह भी कहा कि नसबंदी, टीकाकरण और पुनः रिहाई ही एकमात्र प्रभावी तरीका है, और कोर्ट के आदेशों को उसी अनुरूप संशोधित किया जाए।

पीठ ने अस्पतालों जैसे संवेदनशील इलाकों में आवारा कुत्तों की उपस्थिति पर गंभीर सवाल उठाए।

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“हमें बताइए कि हर अस्पताल में कितने कुत्ते वार्डों, गलियारों और मरीज़ों के बेड के पास घूमते रहने चाहिए?” — जस्टिस मेहता ने पूछा।

कृष्णन वेणुगोपाल ने सहमति जताई कि कुत्तों को अस्पतालों में नहीं होना चाहिए और बताया कि नियमों के क्रियान्वयन के लिए बजट आवंटन ही नहीं है।

एक अधिवक्ता ने आरोप लगाया कि कोर्ट पर कुछ दबाव है, जिस पर जस्टिस नाथ ने स्पष्ट किया:

“हम किसी दबाव में नहीं हैं। आप गलतफहमी में हैं।”

कुछ वकीलों ने बताया कि आवासीय परिसरों में आक्रामक कुत्तों के कारण आमजन को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अन्य वकीलों ने पालतू कुत्तों की माइक्रोचिपिंग, आंकड़ों का संग्रह, और शेल्टर की आवश्यकता जैसे समाधान सुझाए।

एक हालिया घटना का जिक्र करते हुए, जिसमें एक पालतू कुत्ता किसी पर छोड़ दिया गया था, पीठ ने कहा,

“अगर अनजाने में भी कोई पालतू कुत्ता किसी पड़ोसी पर हमला कर दे, तो वह अपराध है।”

यह मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा जुलाई 2023 में एक सुओ मोटो जनहित याचिका के रूप में शुरू किया गया था, जब मीडिया रिपोर्ट्स में बच्चों को काटने वाले कुत्तों की घटनाओं के कारण रैबीज़ से मौत की खबरें सामने आई थीं।

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7 नवंबर 2025 को, शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया था कि अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों और रेलवे स्टेशनों जैसे संस्थागत क्षेत्रों से आवारा कुत्तों को नसबंदी और टीकाकरण के बाद शेल्टर होम्स में भेजा जाए और उन्हें वापस उसी स्थान पर न छोड़ा जाए।

कोर्ट ने यह भी कहा था कि राष्ट्रीय और राज्यीय राजमार्गों तथा एक्सप्रेसवे से सभी आवारा पशुओं को हटाया जाए ताकि दुर्घटनाओं को रोका जा सके।

गुरुवार की सुनवाई के अंत में, जस्टिस मेहता ने टाइम्स ऑफ इंडिया की 29 दिसंबर 2025 की रिपोर्ट “On the roof of the world, feral dogs hunt down Ladakh’s rare species” का हवाला देते हुए कहा कि वकील शुक्रवार को इस पर चर्चा के लिए तैयार रहें। सुनवाई शुक्रवार को जारी रहेगी।

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